नाम का मतलब
यूनुस अलैहिस्सलाम (एक नबी जिनकी कौम पूरी तरह ईमान लाई)
पृष्ठभूमि
सूरह यूनुस मक्का के दौर में नाज़िल हुई और इसमें तौहीद, रिसालत और आखिरत के मौज़ूअ पर गुफ्तगू है। इसका नाम यूनुस अलैहिस्सलाम के नाम पर है, जिनकी कौम अज़ाब की अलामत देखकर पूरी तरह ईमान ले आई थी। यह सूरह अल्लाह की कुदरत की निशानियों और पिछली कौमों के अंजाम से नसीहत दिलाती है।
फ़ज़ीलत / सार
यूनुस अलैहिस्सलाम की कौम की मिसाल इस सूरह में उम्मीद की एक खास मिसाल है, क्योंकि यह वाहिद कौम है जिसने अज़ाब की अलामत देखकर मुकम्मल तौबा कर ली और अज़ाब टल गया।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓر ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْحَكِيمِ
الٓر ۚ
अलिफ़ लाम रा
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब
ٱلْحَكِيمِ
हिकमत वाली की
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये तत्वदर्शितायुक्त किताब की आयतें हैं
तफ़्सीर:
{अलिफ़, लाम, रा।} इस प्रकार के अक्षरों के बारे में सूरतुल-बक़रा के आरंभ में बात की जा चुकी है। इस सूरत में तिलावत की गई ये आयतें सुदृढ़ एवं मज़बूत क़ुरआन की आयतें हैं, जो हिकमत और अहकाम पर आधारित है।
आयत 2
أَكَانَ لِلنَّاسِ عَجَبًا أَنْ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰ رَجُلٍۢ مِّنْهُمْ أَنْ أَنذِرِ ٱلنَّاسَ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنَّ لَهُمْ قَدَمَ صِدْقٍ عِندَ رَبِّهِمْ ۗ قَالَ ٱلْكَـٰفِرُونَ إِنَّ هَـٰذَا لَسَـٰحِرٌۭ مُّبِينٌ
أَكَانَ
क्या है
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
عَجَبًا
अजीब बात
أَنْ
कि
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَىٰ
to
رَجُلٍۢ
तरफ़ एक शख़्स के
مِّنْهُمْ
उनमें से
أَنْ
कि
أَنذِرِ
डराइए
ٱلنَّاسَ
लोगों को
وَبَشِّرِ
और ख़ुश ख़बरी दे दीजिए
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
أَنَّ
कि बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
قَدَمَ
मर्तबा है
صِدْقٍ
सच्चा
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ ۗ
उनके रब के
قَالَ
कहा
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िरों ने
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَسَـٰحِرٌۭ
अलबत्ता जादूगर है
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
क्या लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि हमने उन्ही में से एक आदमी की ओर प्रकाशना की कि लोगों को सचेत कर दो और जो लोग मान लें, उनको शुभ समाचार दे दो कि उनके लिए रब के पास शाश्वत सच्चा उन्नत स्थान है? इनकार करनेवाले कहने लगे, "निस्संदेह यह एक खुला जादूगर है।"
तफ़्सीर:
क्या लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात है कि हमने उनकी जाति ही के एक व्यक्ति पर, उसे यह आदेश देते हुए, वह़्य (प्रकाशना) उतारी कि लोगों को अल्लाह की यातना से सचेत कर दे?! (ऐ रसूल!) आप अल्लाह पर ईमान लाने वाले लोगों को यह प्रसन्न करने वाली सूचना दे दें कि उन्होंने जो भी अच्छे कर्म आगे भेजे हैं, उसके प्रतिफल के तौर पर उनके लिए उनके पालानहार के पास उच्च स्थान (पद) है। काफिरों ने कहा : निःसंदेह यह आदमी जो इन आयतों को लेकर आया है, एक स्पष्ट जादूगर है।
आयत 3
إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۖ يُدَبِّرُ ٱلْأَمْرَ ۖ مَا مِن شَفِيعٍ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ إِذْنِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ فَٱعْبُدُوهُ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكُمُ
रब तुम्हारा
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छःदिनों में
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰ
वो बुलन्द हुआ
عَلَى
on
ٱلْعَرْشِ ۖ
अर्श पर
يُدَبِّرُ
वो तदबीर करता है
ٱلْأَمْرَ ۖ
तमाम मामलात की
مَا
नहीं
مِن
(is) any intercessor
شَفِيعٍ
कोई सिफ़ारिशी
إِلَّا
मगर
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
إِذْنِهِۦ ۚ
उसके इज़्न के
ذَٰلِكُمُ
यही है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
فَٱعْبُدُوهُ ۚ
पस इबादत करो इसकी
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया, फिर सिंहासन पर विराजमान होकर व्यवस्था चला रहा है। उसकी अनुज्ञा के बिना कोई सिफ़ारिश करनेवाला भी नहीं है। वह अल्लाह है तुम्हारा रब। अतः उसी की बन्दगी करो। तो क्या तुम ध्यान न दोगे?
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ आश्चर्य करने वालो!) तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने भव्य आकाशों तथा विशाल धरती को छह दिनों में बनाया, फिर वह अर्श पर बुलंद हुआ। तो तुम्हें कैसे आश्चर्य होता है कि उसने तुम्हारी ही जाति में से एक आदमी को रसूल बनाकर भेजा?! वह अपने विशाल राज्य में अकेले ही निर्णय लेता है और फ़ैसले करता है। उसके पास उसकी अनुमति तथा अनुशंसा करने वाले से उसकी संतुष्टि के बिना कोई व्यक्ति किसी चीज़ के बारे में अनुशंसा नहीं कर सकता। इन गुणों से विशेषित अल्लाह ही तुम्हारा पालनहार है। अतः निष्ठापूर्वक एकमात्र उसी की उपासना करो। तो क्या तुम उसके एकेश्वरवाद के इन सभी प्रमाणों एवं तर्कों से शिक्षा ग्रहण नहीं करतेॽ जिसके पास थोड़ी-सी भी शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता होगी, वह उसे जान लेगा और उसपर ईमान लाएगा।
आयत 4
إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًۭا ۖ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقًّا ۚ إِنَّهُۥ يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ لِيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ بِٱلْقِسْطِ ۚ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَهُمْ شَرَابٌۭ مِّنْ حَمِيمٍۢ وَعَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
مَرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
جَمِيعًۭا ۖ
सबके सबका
وَعْدَ
वादा है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقًّا ۚ
सच्चा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَبْدَؤُا۟
वो इब्तिदा करता है
ٱلْخَلْقَ
पैदाइश की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ
वो दोबारा लौटाएगा उसे
لِيَجْزِىَ
ताकि वो बदला दे
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
بِٱلْقِسْطِ ۚ
साथ इन्साफ़ के
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَهُمْ
उनके लिए
شَرَابٌۭ
पीना है
مِّنْ
of
حَمِيمٍۢ
सख़्त गर्म पानी की
وَعَذَابٌ
और अज़ाब है
أَلِيمٌۢ
दर्दनाक
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْفُرُونَ
वो कुफ़्र करते
उसी की ओर तुम सबको लौटना है। यह अल्लाह का पक्का वादा है। निस्संदेह वही पहली बार पैदा करता है। फिर दोबारा पैदा करेगा, ताकि जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें न्यायपूर्वक बदला दे। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके लिए खौलता पेय और दुखद यातना है, उस इनकार के बदले में जो वे करते रहे
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन तुम सब को उसी एक अल्लाह की ओर लौटना है, ताकि वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का प्रतिफल प्रदान करे। अल्लाह ने लोगों से इसका सच्चा वादा किया है, जो वह नहीं तोड़ेगा। निःसंदेह वह इसमें सक्षम है। वह किसी पिछले उदाहरण के बिना सृष्टि की रचना का आरंभ करता है और फिर उसकी मृत्यु के पश्चात उसे पुनः जीवित करेगा, ताकि उन लोगों को न्याय के साथ प्रतिफल प्रदान करे, जो अल्लाह पर ईमान लाए और सत्कर्म किए। वह न उनकी नेकियों को घटाएगा और न उनके गुनाहों को बढ़ाएगा। जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार किया, उनके लिए उनके इस इनकार के कारण खौलते हुए जल का पेय होगा, जो उनकी आँतों के टुकड़े-टुकड़े कर देगा तथा उनके लिए दर्दनाक यातना होगी।
आयत 5
هُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ ٱلشَّمْسَ ضِيَآءًۭ وَٱلْقَمَرَ نُورًۭا وَقَدَّرَهُۥ مَنَازِلَ لِتَعْلَمُوا۟ عَدَدَ ٱلسِّنِينَ وَٱلْحِسَابَ ۚ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ ذَٰلِكَ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۚ يُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाया
ٱلشَّمْسَ
सूरज को
ضِيَآءًۭ
रोशन
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
نُورًۭا
मुनव्वर
وَقَدَّرَهُۥ
और उसने मुक़र्रर कीं उसकी
مَنَازِلَ
मन्ज़िलें
لِتَعْلَمُوا۟
ताकि तुम जान लो
عَدَدَ
गिनती
ٱلسِّنِينَ
सालों की
وَٱلْحِسَابَ ۚ
और हिसाब
مَا
नहीं
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ذَٰلِكَ
ये (सब)
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
يُفَصِّلُ
वो खोलकर बयान करता है
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
वही है जिसने सूर्य को सर्वथा दीप्ति और चन्द्रमा का प्रकाश बनाया औऱ उनके लिए मंज़िलें निश्चित की, ताकि तुम वर्षों की गिनती और हिसाब मालूम कर लिया करो। अल्लाह ने यह सब कुछ सोद्देश्य ही पैदा किया है। वह अपनी निशानियों को उन लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, जो जानना चाहें
तफ़्सीर:
वही है, जिसने सूर्य को ज्योति फैलाने वाला बनाया और चाँद को प्रकाशमान बनाया, जिससे रोशनी प्राप्त की जाती है। साथ ही चाँद की अट्ठाईस मंज़िलों के अनुसार उसकी गति निर्धारित की। मंज़िल से अभिप्राय वह दूरी है, जिसे चाँद हर दिन और रात तय करता है। यह सब इसलिए किया, ताकि (ऐ लोगो!) तुम सूरज के द्वारा दिनों की संख्या तथा चाँद के द्वारा महीनों एवं वर्षों की संख्या जान सको। अल्लाह ने आकाशों और धरती तथा उनके बीच की चीज़ों को सत्य के साथ ही पैदा किया है; ताकि लोगों को अपनी शक्ति और महानता के दर्शन कराए। अल्लाह अपने एकेश्वरवाद के इन स्पष्ट प्रमाणों और उज्ज्वल तर्कों को ऐसे लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, जो इनसे उसके एकेश्वरवाद का पता लगाना जानते हैं।
आयत 6
إِنَّ فِى ٱخْتِلَـٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَمَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَتَّقُونَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ٱخْتِلَـٰفِ
इख़्तिलाफ़ में
ٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन के
وَمَا
और जो
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَتَّقُونَ
जो डरते हैं
निस्संदेह रात और दिन के उलट-फेर में और जो कुछ अल्लाह ने आकाशों और धरती में पैदा किया उसमें डर रखनेवाले लोगों के लिए निशानियाँ है
तफ़्सीर:
निःसंदेह बंदों पर रात और दिन के एक-दूसरे के बाद आने में, उसके साथ होने वाले अंधकार और प्रकाश में तथा दोनों में से किसी एक के छोटे और दूसरे के लंबे होने में और आकाशों तथा धरती के अंदर मौजूद सारी सृष्टियों में, निश्चय उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति को दर्शाने वाली निशानियाँ हैं, जो अल्लाह से उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर डरते हैं।
आयत 7
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا وَرَضُوا۟ بِٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَٱطْمَأَنُّوا۟ بِهَا وَٱلَّذِينَ هُمْ عَنْ ءَايَـٰتِنَا غَـٰفِلُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(do) not
يَرْجُونَ
नहीं वो उम्मीद रखते
لِقَآءَنَا
हमारी मुलाक़ात की
وَرَضُوا۟
और वो राज़ी हो गए
بِٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी पर
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَٱطْمَأَنُّوا۟
और वो मुत्मइन हो गए
بِهَا
उस पर
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
عَنْ
(are) of
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात से
غَـٰفِلُونَ
ग़ाफ़िल हैं
रहे वे लोग जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते और सांसारिक जीवन ही पर निहाल हो गए है और उसी पर संतुष्ट हो बैठे, और जो हमारी निशानियों की ओर से असावधान है;
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो काफ़िर लोग अल्लाह से मिलने की आशा नहीं रखते कि उससे डरें या उसकी लालसा करें, तथा वे सदैव रहने वाले परलोक के जीवन के बजाय इस दुनिया के नश्वर जीवन से प्रसन्न हो गए और उनके दिल उसपर खुश होकर उससे संतुष्ट हो गए और वे लोग जो अल्लाह की निशानियों और उसके प्रमाणों से मुँह फेरने वाले और उनसे असावधान हैं।
आयत 8
أُو۟لَـٰٓئِكَ مَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
مَأْوَىٰهُمُ
ठिकाना उनका
ٱلنَّارُ
आग है
بِمَا
बवजह इसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
ऐसे लोगों का ठिकाना आग है, उसके बदले में जो वे कमाते रहे
तफ़्सीर:
इन गुणों से विशेषित लोगों का ठिकाना, जहाँ वे शरण लेंगे, जहन्नम है; इस कारण कि उन्होंने कुफ़्र किया और क़ियामत के दिन को झुठलाया।
आयत 9
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ يَهْدِيهِمْ رَبُّهُم بِإِيمَـٰنِهِمْ ۖ تَجْرِى مِن تَحْتِهِمُ ٱلْأَنْهَـٰرُ فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
يَهْدِيهِمْ
रहनुमाई करेगा उनकी
رَبُّهُم
रब उनका
بِإِيمَـٰنِهِمْ ۖ
बवजह उनके ईमान के
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهِمُ
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
فِى
in
جَنَّـٰتِ
बाग़ात में
ٱلنَّعِيمِ
नेअमतों वाले
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनका रब उनके ईमान के कारण उनका मार्गदर्शन करेगा। उनके नेमत भरी जन्नतों में नहरें बह रही होगी
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, अल्लाह उन्हें उनके ईमान के कारण सुकर्म का मार्ग दिखाएगा, जो उसकी प्रसन्नता की ओर ले जाने वाला है। फिर, क़ियामत के दिन, अल्लाह उन्हें सदैव रहने वाली नेमत भरी जन्नतों में दाख़िल करेगा, जहाँ उनके नीचे से नहरें प्रवाहित होंगी।
आयत 10
دَعْوَىٰهُمْ فِيهَا سُبْحَـٰنَكَ ٱللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَـٰمٌۭ ۚ وَءَاخِرُ دَعْوَىٰهُمْ أَنِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
دَعْوَىٰهُمْ
उनकी दुआ (होगी)
فِيهَا
उसमें
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
ٱللَّهُمَّ
ऐ अल्लाह
وَتَحِيَّتُهُمْ
और दुआ उनकी
فِيهَا
उसमें
سَلَـٰمٌۭ ۚ
सलाम (होगा)
وَءَاخِرُ
और आख़िरी
دَعْوَىٰهُمْ
पुकार उनकी (होगी)
أَنِ
ये कि
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
वहाँ उनकी पुकार यह होगी कि "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह!" और उनका पारस्परिक अभिवादन "सलाम" होगा। और उनकी पुकार का अन्त इसपर होगा कि "प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।"
तफ़्सीर:
जन्नत में उनकी प्रार्थना अल्लाह की तसबीह व तक़दीस (प्रशंसा और पवित्रता) होगी तथा उन्हें अल्लाह का अभिवादन, फ़रिश्तों का अभिवादन और उनका एक-दूसरे का अभिवादन : सलाम (शांति) होगा, तथा उनकी प्रार्थना का अंत सभी प्राणियों के पालनहार की प्रशंसा पर होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वही (कुरआन) और कयामत पर लोगों की हैरत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नबियों का इंसान होना उनकी सच्चाई में रुकावट नहीं, अल्लाह जिसे चाहे रहनुमाई के लिए चुनता है।
आयत 11
۞ وَلَوْ يُعَجِّلُ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ ٱلشَّرَّ ٱسْتِعْجَالَهُم بِٱلْخَيْرِ لَقُضِىَ إِلَيْهِمْ أَجَلُهُمْ ۖ فَنَذَرُ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
۞ وَلَوْ
और अगर
يُعَجِّلُ
जल्दी करता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
ٱلشَّرَّ
बुराई को (देने में)
ٱسْتِعْجَالَهُم
जल्दी माँगना है उनका (जैसे)
بِٱلْخَيْرِ
भलाई को
لَقُضِىَ
अलबत्ता पूरी कर दी जाए
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
أَجَلُهُمْ ۖ
मुद्दत उनकी
فَنَذَرُ
तो हम छोड़ देते हैं
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
لَا
(do) not
يَرْجُونَ
नहीं वो उम्मीद रखते
لِقَآءَنَا
हमारी मुलाक़ात की
فِى
in
طُغْيَـٰنِهِمْ
अपनी सरकशी में
يَعْمَهُونَ
वो भटकते फिरते हैं
यदि अल्लाह लोगों के लिए उनके जल्दी मचाने के कारण भलाई की जगह बुराई को शीघ्र घटित कर दे तो उनकी ओर उनकी अवधि पूरी कर दी जाए, किन्तु हम उन लोगों को जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते उनकी अपनी सरकशी में भटकने के लिए छोड़ देते है
तफ़्सीर:
यदि पवित्र अल्लाह लोगों के क्रोधित होने पर ख़ुद अपने, अपने बच्चों और अपने धन पर बद-दुआ (शाप) को उसी तरह जल्दी क़बूल कर ले, जिस तरह उनकी भलाई की दुआओं को स्वीकार करता है - तो वे नष्ट हो जाएँ। लेकिन अल्लाह उन्हें ढील देता है। अतः वह उन लोगों को, जो उससे मिलने की प्रतीक्षा नहीं करते (क्योंकि उन्हें न किसी दंड का भय होता है और न सवाब की आशा होती है) हिसाब के दिन के बारे में भ्रमित, चकित और शंकित छोड़ देता है।
आयत 12
وَإِذَا مَسَّ ٱلْإِنسَـٰنَ ٱلضُّرُّ دَعَانَا لِجَنۢبِهِۦٓ أَوْ قَاعِدًا أَوْ قَآئِمًۭا فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُ ضُرَّهُۥ مَرَّ كَأَن لَّمْ يَدْعُنَآ إِلَىٰ ضُرٍّۢ مَّسَّهُۥ ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْمُسْرِفِينَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَإِذَا
और जब
مَسَّ
पहुँचती है
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
ٱلضُّرُّ
तकलीफ़
دَعَانَا
वो पुकारता है हमें
لِجَنۢبِهِۦٓ
अपनी करवट पर
أَوْ
या
قَاعِدًا
बैठे हुए
أَوْ
या
قَآئِمًۭا
खड़े हुए
فَلَمَّا
फिर जब
كَشَفْنَا
हम हटा देते हैं
عَنْهُ
उससे
ضُرَّهُۥ
तकलीफ़ उसकी
مَرَّ
वो चल देता है
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
नहीं
يَدْعُنَآ
पुकारा था उसने हमें
إِلَىٰ
for
ضُرٍّۢ
तरफ़ किसी तकलीफ़ के
مَّسَّهُۥ ۚ
जो पहुँची उसे
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिए गए
لِلْمُسْرِفِينَ
हद से बढ़ने वालों के लिए
مَا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
मनुष्य को जब कोई तकलीफ़ पहुँचती है, वह लेटे या बैठे या खड़े हमको पुकारने लग जाता है। किन्तु जब हम उसकी तकलीफ़ उससे दूर कर देते है तो वह इस तरह चल देता है मानो कभी कोई तकलीफ़ पहुँचने पर उसने हमें पुकारा ही न था। इसी प्रकार मर्यादाहीन लोगों के लिए जो कुछ वे कर रहे है सुहावना बना दिया गया है
तफ़्सीर:
जब (पाप करके) अपने ऊपर अत्याचार करने वाले मनुष्य को किसी बीमारी या दुर्दशा का सामना होता है, तो वह अपने पहलू पर लेटा हुआ, या बैठा या खड़ा हुआ पूर्ण विनम्रता और विनय के साथ हमें पुकारता है; इस आशा में कि जो दुःख उसे पहुँचा है, उसे दूर कर दिया जाए। फिर जब हम उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लेते हैं और उसका दुःख दूर कर देते हैं, तो वह अपनी पूर्व स्थिति पर ऐसे चल पड़ता है जैसे उसने हमें कभी अपने किसी दुःख को दूर करने के लिए पुकारा ही नहीं था। जिस प्रकार इस उल्लंघनकारी के लिए अपनी पथभ्रष्टता में निरंतर बने रहना सुंदर बना दिया गया है, उसी प्रकार अपने कुफ़्र के द्वारा सीमाओं का उल्लंघन करने वालों के लिए उस कुफ़्र एवं अवज्ञा को शोभित कर दिया गया है, जो वे किया करते थे। अतः वे उसे नहीं छोड़ेंगें।
आयत 13
وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا ٱلْقُرُونَ مِن قَبْلِكُمْ لَمَّا ظَلَمُوا۟ ۙ وَجَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَمَا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوا۟ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْقَوْمَ ٱلْمُجْرِمِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَهْلَكْنَا
हलाक किया हमने
ٱلْقُرُونَ
उम्मतों को
مِن
before you
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले
لَمَّا
जब
ظَلَمُوا۟ ۙ
उन्होंने ज़ुल्म किया
وَجَآءَتْهُمْ
और आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह निशानियों के
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
لِيُؤْمِنُوا۟ ۚ
कि वो ईमान ले आते
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْمُجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
तुमसे पहले कितनी ही नस्लों को, जब उन्होंने अत्याचार किया, हम विनष्ट कर चुके है, हालाँकि उनके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे। किन्तु वे ऐसे न थे कि उन्हें मानते। अपराधी लोगों को हम इसी प्रकार बदला दिया करते है
तफ़्सीर:
तथा हमने (ऐ बहुदेववादियो!) तुमसे पहले के समुदायों को, अल्लाह के रसूलों को झुठलाने और पाप करने के कारण विनष्ट कर दिया, जबकि उनके पास उनके रसूल आ चुके थे, जिन्हें हमने उनकी ओर स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा था। जो प्रमाण यह सिद्ध करते थे कि वे रसूल अपने रब के पास से जो कुछ लेकर आए हैं, उसमें वे सच्चे हैं। परंतु वे ईमान नहीं लाए; क्योंकि उनके अंदर ईमान लाने की योग्यता ही नहीं थी। सो, अल्लाह ने उन्हें असहाय छोड़ दिया और उन्हें ईमान लाने की तौफ़ीक़ नहीं दी। जिस प्रकार हमने उन अत्याचारी समुदायों को बदला दिया, उसी तरह हम हर समय और जगह में उनके जैसे लोगों को बदला देते रहेंगे।
आयत 14
ثُمَّ جَعَلْنَـٰكُمْ خَلَـٰٓئِفَ فِى ٱلْأَرْضِ مِنۢ بَعْدِهِمْ لِنَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ
ثُمَّ
फिर
جَعَلْنَـٰكُمْ
बनाया हमने तुम्हें
خَلَـٰٓئِفَ
जानशीन
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
لِنَنظُرَ
ताकि हम देखें
كَيْفَ
किस तरह
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
फिर उनके पश्चात हमने धरती में उनकी जगह तुम्हें रखा, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो
तफ़्सीर:
फिर हमने तुम्हें (ऐ लोगो!) उन झुठलाने वाले समुदायों के, जिन्हें हमने विनष्ट कर दिया था, उत्तराधिकारी बनाया; ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो, क्या तुम अच्छे कार्य करते हो कि तुम्हें उसपर सवाब (पुण्य) दिया जाए, अथवा तुम बुरे कार्य करते हो कि उसपर तुम्हें दंडित किया जाए?
आयत 15
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَاتُنَا بَيِّنَـٰتٍۢ ۙ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا ٱئْتِ بِقُرْءَانٍ غَيْرِ هَـٰذَآ أَوْ بَدِّلْهُ ۚ قُلْ مَا يَكُونُ لِىٓ أَنْ أُبَدِّلَهُۥ مِن تِلْقَآئِ نَفْسِىٓ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّى عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
وَإِذَا
और जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَاتُنَا
आयात हमारी
بَيِّنَـٰتٍۢ ۙ
वाज़ेह
قَالَ
कहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يَرْجُونَ
नहीं वो उम्मीद रखते
لِقَآءَنَا
हमारी मुलाक़ात की
ٱئْتِ
ले आओ
بِقُرْءَانٍ
क़ुरआन
غَيْرِ
other (than)
هَـٰذَآ
अलावा इसके
أَوْ
या
بَدِّلْهُ ۚ
बदल दो इसे
قُلْ
कह दीजिए
مَا
नहीं
يَكُونُ
है
لِىٓ
मेरे लिए
أَنْ
कि
أُبَدِّلَهُۥ
मैं बदल दूँ इसे
مِن
of
تِلْقَآئِ
my own accord
نَفْسِىٓ ۖ
अपनी तरफ़ से
إِنْ
नहीं
أَتَّبِعُ
मैं पैरवी करता
إِلَّا
मगर
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ ۖ
मेरी तरफ़
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
إِنْ
अगर
عَصَيْتُ
नाफ़रमानी की मैंने
رَبِّى
अपने रब की
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍۢ
बड़े दिन के
और जब उनके सामने हमारी खुली हुई आयतें पढ़ी जाती है तो वे लोग, जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, कहते है, "इसके सिवा कोई और क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ परिवर्तन करो।" कह दो, "मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं अपनी ओर से इसमें कोई परिवर्तन करूँ। मैं तो बस उसका अनुपालन करता हूँ, जो प्रकाशना मेरी ओर अवतरित की जाती है। यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करँस तो इसमें मुझे एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
तफ़्सीर:
जब उनके सामने अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) को दर्शाने वाली क़ुरआन की स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं, तो दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करने वाले लोग, जो सवाब की आशा नहीं रखते और न सज़ा से डरते हैं, कहते हैं : (ऐ मुहम्मद!) मूर्तिपूजा के अपमान पर आधारित इस क़ुरआन के अलावा दूसरा क़ुरआन ले आओ, अथवा हमारी इच्छाओं के अनुसार इसके कुछ भाग या पूर्ण भाग को निरस्त करके इसे बदल दो। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : इसे बदलना मेरे लिए संभव नहीं है, और इसके सिवा कोई दूसरा क़ुरआन लाने में तो मैं - और भी - सक्षम नहीं हूँ। बल्कि, केवल अल्लाह ही है जो उसमें से जो चाहे बदल सकता है। मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो अल्लाह मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) भेजता है। यदि मैं तुम्हारी माँग का उत्तर देकर अल्लाह की अवज्ञा करूँ, तो मुझे एक महान दिन की सज़ा का डर है और वह क़ियामत का दिन है।
आयत 16
قُل لَّوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا تَلَوْتُهُۥ عَلَيْكُمْ وَلَآ أَدْرَىٰكُم بِهِۦ ۖ فَقَدْ لَبِثْتُ فِيكُمْ عُمُرًۭا مِّن قَبْلِهِۦٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
ना
تَلَوْتُهُۥ
पढ़ता मैं उसे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَلَآ
और ना
أَدْرَىٰكُم
ख़बर देता तुम्हें (अल्लाह)
بِهِۦ ۖ
उसकी
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
لَبِثْتُ
ठहरा रहा मैं
فِيكُمْ
तुम में
عُمُرًۭا
एक उम्र
مِّن
before it
قَبْلِهِۦٓ ۚ
इससे पहले
أَفَلَا
क्या पस नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
कह दो, "यदि अल्लाह चाहता तो मैं तुम्हें यह पढ़कर न सुनाता और न वह तुम्हें इससे अवगत कराता। आख़िर इससे पहले मैं तुम्हारे बीच जीवन की पूरी अवधि व्यतीत कर चुका हूँ। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : यदि अल्लाह चाहता कि मैं तुम्हें क़ुरआन पढ़कर न सुनाऊँ, तो मैं तुम्हें क़ुरआन पढ़कर न सुनाता और इसे तुम तक न पहुँचाता। तथा यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें मेरी ज़ुबानी क़ुरआन से सूचित न करता। फिर मैं तुम्हारे बीच जीवन की एक लंबी अवधि (चालीस वर्ष) व्यतीत कर चुका हूँ। न मैं पढ़ना जानता था और न लिखना। मैं इस तरह की किसी चीज़ की खोज और तलाश में भी नहीं था। तो क्या तुम अपनी बुद्धि से यह नहीं जानते कि जो कुछ मैं तुम्हारे पास लेकर आया हूँ वह अल्लाह की ओर से है, और उसमें मेरा कोई दख़ल नहीं है?!
आयत 17
فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْمُجْرِمُونَ
فَمَنْ
तो कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَوْ
या
كَذَّبَ
वो झुठलाए
بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۚ
उसकी आयात को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाते
ٱلْمُجْرِمُونَ
जो मुजरिम हैं
फिर उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या उसकी आयतों को झुठलाए? निस्संदेह अपराधी कभी सफल नहीं होते
तफ़्सीर:
अतः उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ गढ़े। फिर मेरे लिए यह कैसे संभव है कि मैं अल्लाह पर झूठ गढ़ते हुए क़ुरआन को बदल दूँ? बात यह है कि जो लोग अल्लाह पर झूठ गढ़कर उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं, वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते।
आयत 18
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَـٰٓؤُلَآءِ شُفَعَـٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ ۚ قُلْ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَلَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
وَيَعْبُدُونَ
और वो इबादत करते हैं
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उसकी जो
لَا
(does) not
يَضُرُّهُمْ
नहीं वो नुक़सान देता उन्हें
وَلَا
और ना
يَنفَعُهُمْ
वो नफ़ा देता है उन्हें
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं
شُفَعَـٰٓؤُنَا
सिफ़ारिशी हमारे
عِندَ
with
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के यहाँ
قُلْ
कह दीजिए
أَتُنَبِّـُٔونَ
क्या तुम ख़बर देते हो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
بِمَا
उसकी जो
لَا
not
يَعْلَمُ
नहीं वो जानता
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
وَتَعَـٰلَىٰ
और वो बुलन्दतर है
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
वे लोग अल्लाह से हटकर उनको पूजते हैं, जो न उनका कुछ बिगाड़ सकें और न उनका कुछ भला कर सकें। और वे कहते है, "ये अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी है।" कह दो, "क्या तुम अल्लाह को उसकी ख़बर देनेवाले? हो, जिसका अस्तित्व न उसे आकाशों में ज्ञात है न धरती में" महिमावान है वह और उसकी उच्चता के प्रतिकूल है वह शिर्क, जो वे कर रहे है
तफ़्सीर:
मुश्रिक (बहुदेववादी) लोग अल्लाह के सिवा कथित देवताओं की पूजा करते हैं, जो न लाभ पहुँचाते हैं और न हानि। जबकि सत्य पूज्य तो जब चाहे लाभ और हानि पहुँचा सकता है। तथा वे लोग अपने देवताओं के बारे में कहते हैं : ये मध्यस्थ हैं, जो अल्लाह के यहाँ हमारे लिए सिफारिश करेंगे। अतः वह हमारे पापों के कारण हमें यातना नहीं देगा। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : क्या तुम लोग सब कुछ जानने वाले अल्लाह को सूचना दे रहे हो कि उसका कोई साझी है, हालाँकि वह आकाशों में और धरती में अपना कोई साझी नहीं जानता! मुश्रिक (बहुदेववादी) लोग जो कुछ असत्य एवं झूठ कह रहे हैं, अल्लाह उससे पाक और पवित्र है।
आयत 19
وَمَا كَانَ ٱلنَّاسُ إِلَّآ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَٱخْتَلَفُوا۟ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌۭ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ فِيمَا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
ٱلنَّاسُ
लोग
إِلَّآ
मगर
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
فَٱخْتَلَفُوا۟ ۚ
फिर उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةٌۭ
एक बात
سَبَقَتْ
जो तय हो चुकी
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لَقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
فِيمَا
इस मामले में
فِيهِ
जिस में
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ कर रहे थे
सारे मनुष्य एक ही समुदाय थे। वे तो स्वयं अलग-अलग हो रहे। और यदि तेरे रब की ओर से पहले ही एक बात निश्चित न हो गई होती, तो उनके बीच का फ़ैसला कर दिया जाता जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं
तफ़्सीर:
सारे मनुष्य केवल एक ही एकेश्वरवादी मोमिन समुदाय थे। फिर उन्होंने विभेद किया। अतः उनमें से कुछ लोग विश्वासी (मोमिन) बने रहे और कुछ ने कुफ़्र (अविश्वास) किया। यदि अल्लाह की तरफ से पहले ही यह निर्णय न किया जा चुका होता कि वह लोगों के बीच होने वाले मतभेद के बारे में इस दुनिया में फैसला नहीं करेगा, बल्कि उनके बीच उसके बारे में क़ियामत के दिन फ़ैसला करेगा। यदि यह बात न होती, तो इस संसार ही में उनके बीच उसका फ़ैसला कर दिया जाता, जिसमें वे विभेद कर रहे हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता कि कौन सीधे रास्ते पर चलने वाला है और कौन भटका हुआ है।
आयत 20
وَيَقُولُونَ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ ءَايَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ ۖ فَقُلْ إِنَّمَا ٱلْغَيْبُ لِلَّهِ فَٱنتَظِرُوٓا۟ إِنِّى مَعَكُم مِّنَ ٱلْمُنتَظِرِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
لَوْلَآ
क्यों ना
أُنزِلَ
उतारी गई
عَلَيْهِ
उस पर
ءَايَةٌۭ
कोई निशानी
مِّن
from
رَّبِّهِۦ ۖ
उसके रब की तरफ़ से
فَقُلْ
तो कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْغَيْبُ
ग़ैब
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
فَٱنتَظِرُوٓا۟
पस तुम इन्तिज़ार करो
إِنِّى
बेशक मैं
مَعَكُم
तुम्हारे साथ
مِّنَ
among
ٱلْمُنتَظِرِينَ
इन्तिज़ार करने वालों में से हूँ
वे कहते है, "उस पर उनके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी?" तो कह दो, "परोक्ष तो अल्लाह ही से सम्बन्ध रखता है। अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
तफ़्सीर:
तथा मुश्रिक (बहुदेववादी) लोग कहते हैं : मुहम्मद - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - पर उनके पालनहार की तरफ़ से उनकी सच्चाई को दर्शाने वाली कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गईॽ तो (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : निशानियों का उतरना परोक्ष की बात है, जिसे अल्लाह ही जानता है। इसलिए तुम उन भौतिक निशानियों की प्रतीक्षा करो, जिनका तुमने सुझाव दिया है। मैं भी तुम्हारे साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की बेसब्री और कुरआन के चैलेंज का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल में जल्दबाज़ी से दुआ मांगने की बजाय सब्र रखना बेहतर है।
आयत 21
وَإِذَآ أَذَقْنَا ٱلنَّاسَ رَحْمَةًۭ مِّنۢ بَعْدِ ضَرَّآءَ مَسَّتْهُمْ إِذَا لَهُم مَّكْرٌۭ فِىٓ ءَايَاتِنَا ۚ قُلِ ٱللَّهُ أَسْرَعُ مَكْرًا ۚ إِنَّ رُسُلَنَا يَكْتُبُونَ مَا تَمْكُرُونَ
وَإِذَآ
और जब
أَذَقْنَا
मज़ा चखाते हैं हम
ٱلنَّاسَ
लोगों को
رَحْمَةًۭ
रहमत का
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ضَرَّآءَ
मुसीबत के
مَسَّتْهُمْ
जो पहुँची उन्हें
إِذَا
तब
لَهُم
उनके लिए
مَّكْرٌۭ
चालें चलना है
فِىٓ
against
ءَايَاتِنَا ۚ
हमारी आयात में
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَسْرَعُ
ज़्यादा तेज़ है
مَكْرًا ۚ
चाल चलने में
إِنَّ
बेशक
رُسُلَنَا
फ़रिश्ते हमारे
يَكْتُبُونَ
लिख रहे हैं
مَا
जो
تَمْكُرُونَ
तुम चालें चल रहे हो
जब हम लोगों को उनके किसी तकलीफ़ में पड़ने के पश्चात दयालुता का रसास्वादन कराते है तो वे हमारी आयतों के विषय में चालबाज़ियाँ करने लग जाते है। कह दो, "अल्लाह की चाल ज़्यादा तेज़ है।" निस्संदेह, जो चालबाजियाँ तुम कर रहे हो, हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनको लिखते जा रहे है
तफ़्सीर:
और जब हम बहुदेववादियों को उनके अकाल और दुखों से पीड़ित होने के पश्चात् बारिश एवं हरियाली का स्वाद चखाते हैं, तो वे हमारी निशानियों का मखौल उड़ाते और उन्हें झुठलाते हैं। (ऐ पैगंबर!) आप इन बहुदेववादियों से कह दें : अल्लाह का उपाय सबसे तीव्र है और वह तुम्हें ढील देने और सज़ा देने में अधिक तेज़ है। निःसंदेह संरक्षक फ़रिश्ते तुम्हारी चालबाज़ियों को लिख रहे हैं। उनसे कोई चीज़ नहीं छूटती है। तो फिर उनके पैदा करने वाले (अल्लाह) से कैसे छूट सकती है?! तथा अल्लाह तुम्हें तुम्हारी चालबाज़ी का बदला देगा।
आयत 22
هُوَ ٱلَّذِى يُسَيِّرُكُمْ فِى ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا كُنتُمْ فِى ٱلْفُلْكِ وَجَرَيْنَ بِهِم بِرِيحٍۢ طَيِّبَةٍۢ وَفَرِحُوا۟ بِهَا جَآءَتْهَا رِيحٌ عَاصِفٌۭ وَجَآءَهُمُ ٱلْمَوْجُ مِن كُلِّ مَكَانٍۢ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُمْ أُحِيطَ بِهِمْ ۙ دَعَوُا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ لَئِنْ أَنجَيْتَنَا مِنْ هَـٰذِهِۦ لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُسَيِّرُكُمْ
चलाता है तुम्हें
فِى
in
ٱلْبَرِّ
ख़ुश्की में
وَٱلْبَحْرِ ۖ
और समुन्दर में
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
كُنتُمْ
होते हो तुम
فِى
in
ٱلْفُلْكِ
कश्तियों में
وَجَرَيْنَ
और वो ले चलती हैं
بِهِم
उन्हें
بِرِيحٍۢ
साथ हवा
طَيِّبَةٍۢ
उम्दा के
وَفَرِحُوا۟
और वो ख़ुश होते हैं
بِهَا
साथ उसके
جَآءَتْهَا
आ जाती है उन (कश्तियों) पर
رِيحٌ
हवा
عَاصِفٌۭ
शदीद
وَجَآءَهُمُ
और आ जाती है उन पर
ٱلْمَوْجُ
मौज
مِن
from
كُلِّ
every
مَكَانٍۢ
हर तरफ़ से
وَظَنُّوٓا۟
और वो समझते हैं
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
أُحِيطَ
घेर लिया गया है
بِهِمْ ۙ
उन्हें
دَعَوُا۟
वो पुकारते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
مُخْلِصِينَ
ख़ालिस करने वाले होकर
لَهُ
उसके लिए
ٱلدِّينَ
दीन को
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أَنجَيْتَنَا
निजात दी तूने हमें
مِنْ
from
هَـٰذِهِۦ
इस से
لَنَكُونَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र गुज़ारों में से
वही है जो तुम्हें थल और जल में चलाता है, यहाँ तक कि जब तुम नौका में होते हो और वह लोगो को लिए हुए अच्छी अनुकूल वायु के सहारे चलती है और वे उससे हर्षित होते है कि अकस्मात उनपर प्रचंड वायु का झोंका आता है, हर ओर से लहरें उनपर चली आती है और वे समझ लेते है कि बस अब वे घिर गए, उस समय वे अल्लाह ही को, निरी उसी पर आस्था रखकर पुकारने लगते है, "यदि तूने हमें इससे बचा लिया तो हम अवश्य आभारी होंगे।"
तफ़्सीर:
वह अल्लाह ही है, जो (ऐ लोगो!) तुम्हें थल में तुम्हारे पैरों पर तथा तुम्हारे चौपायों (सवारियों) पर चलाता है और वही तुम्हें समुद्र में नौकाओं में चलाता है। यहाँ तक कि जब तुम नौकाओं में समुद्र में होते हो और नौकाएँ यात्रियों को लेकर अच्छी हवा के सहारे चल पड़ती हैं, तो सवार लोग उस अच्छी हवा से प्रसन्न हो उठते हैं। चुनाँचे इसी दौरान जबकि वे अपने आनंद में होते हैं, उनपर एक तेज़ चलने वाली हवा आती है और हर तरफ़ से समुद्र की लहरें उनपर उठती चली आती हैं तथा उनका प्रबल गुमान यह होता है कि उनका सर्वनाश होने वाला है। ऐसे में, वे अकेले अल्लाह को पुकारते हैं और उसके साथ किसी दूसरे को साझी नहीं करते, यह कहते हुए : यदि तूने हमें इस विनाशकारी विपत्ति से बचा लिया, तो तेरे इस अनुग्रह के लिए हम अवश्य तेरे आभारी होंगे।
आयत 23
فَلَمَّآ أَنجَىٰهُمْ إِذَا هُمْ يَبْغُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۗ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّمَا بَغْيُكُمْ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُم ۖ مَّتَـٰعَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ ثُمَّ إِلَيْنَا مَرْجِعُكُمْ فَنُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
فَلَمَّآ
फिर जब
أَنجَىٰهُمْ
वो निजात दे देता है उन्हें
إِذَا
तब
هُمْ
वो
يَبْغُونَ
वो बग़ावत करने लगते हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ ۗ
हक़ के
يَـٰٓأَيُّهَا
O mankind
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
إِنَّمَا
बेशक
بَغْيُكُمْ
बग़ावत तुम्हारी
عَلَىٰٓ
(is) against
أَنفُسِكُم ۖ
तुम्हारे अपने ख़िलाफ़ है
مَّتَـٰعَ
फ़ायदा उठाना है
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
ثُمَّ
फिर
إِلَيْنَا
हमारी ही तरफ़
مَرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
فَنُنَبِّئُكُم
फिर हम बताऐंगे तुम्हें
بِمَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते रहे
फिर जब वह उनको बचा लेता है, तो क्या देखते है कि वे नाहक़ धरती में सरकशी करने लग जाते है। ऐ लोगों! तुम्हारी सरकशी तुम्हारे अपने ही विरुद्ध है। सांसारिक जीवन का सुख ले लो। फिर तुम्हें हमारी ही ओर लौटकर आना है। फिर हम तुम्हें बता देंगे जो कुछ तुम करते रहे होगे
तफ़्सीर:
फिर जब वह उनकी दुआ स्वीकार कर लेता है और उन्हें उस विपत्ति से बचा लेता है, तो वे अचानक धरती में कुफ़्र, अवज्ञा और पाप करके उपद्रव करने लगते हैं। (ऐ लोगो!), होश में आ जाओ, वास्तव में तुम्हारे उपद्रव का दुष्परिणाम स्वयं तुम्हें ही झेलना है। क्योंकि तुम्हारी सरकशी व उद्दंडता से अल्लाह को कोई नुक़सान नहीं होगा। तुम इस दुनिया के जीवन में उसका आनंद ले रहे हो, जबकि यह नश्वर है। फिर क़ियामत के दिन तुम्हें हमारी ही ओर लौटकर आना है। तब हम तुम्हें बताएँगे कि तुम क्या पाप कर रहे थे तथा हम तुम्हें उसका बदला देंगे।
आयत 24
إِنَّمَا مَثَلُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا كَمَآءٍ أَنزَلْنَـٰهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ فَٱخْتَلَطَ بِهِۦ نَبَاتُ ٱلْأَرْضِ مِمَّا يَأْكُلُ ٱلنَّاسُ وَٱلْأَنْعَـٰمُ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذَتِ ٱلْأَرْضُ زُخْرُفَهَا وَٱزَّيَّنَتْ وَظَنَّ أَهْلُهَآ أَنَّهُمْ قَـٰدِرُونَ عَلَيْهَآ أَتَىٰهَآ أَمْرُنَا لَيْلًا أَوْ نَهَارًۭا فَجَعَلْنَـٰهَا حَصِيدًۭا كَأَن لَّمْ تَغْنَ بِٱلْأَمْسِ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَتَفَكَّرُونَ
إِنَّمَا
बेशक
مَثَلُ
मिसाल
ٱلْحَيَوٰةِ
(of) the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी की
كَمَآءٍ
पानी की तरह है
أَنزَلْنَـٰهُ
उतारा हमने उसे
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
فَٱخْتَلَطَ
फिर मिल जुल गई
بِهِۦ
साथ उसके
نَبَاتُ
नबातात
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन की
مِمَّا
उसमें से जो
يَأْكُلُ
खाते हैं
ٱلنَّاسُ
लोग
وَٱلْأَنْعَـٰمُ
और जानवर (मवेशी)
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَخَذَتِ
पकड़ लिया
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन ने
زُخْرُفَهَا
अपनी रौनक़ को
وَٱزَّيَّنَتْ
और वो मुज़य्यन हो गई
وَظَنَّ
और समझ लिया
أَهْلُهَآ
उसके रहने वालों ने
أَنَّهُمْ
बेशक वो
قَـٰدِرُونَ
क़ादिर हैं
عَلَيْهَآ
उस पर
أَتَىٰهَآ
आ गया उस पर
أَمْرُنَا
हुक्म हमारा
لَيْلًا
रात को
أَوْ
या
نَهَارًۭا
दिन को
فَجَعَلْنَـٰهَا
तो कर दिया हमने उसे
حَصِيدًۭا
कटी हुई खेती
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
नहीं
تَغْنَ
वो बसी थी
بِٱلْأَمْسِ ۚ
कल
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نُفَصِّلُ
हम खोल कर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَتَفَكَّرُونَ
जो ग़ौरो फ़िक्र करते हैं
सांसारिक जीवन की उपमा तो बस ऐसी है जैसे हमने आकाश से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगनेवाली चीज़े, जिनको मनुष्य और चौपाये सभी खाते है, घनी हो गई, यहाँ तक कि धरती ने अपना शृंगार कर लिया और सँवर गई और उसके मालिक समझने लगे कि उन्हें उसपर पूरा अधिकार प्राप्त है कि रात या दिन में हमारा आदेश आ पहुँचा। फिर हमने उसे कटी फ़सल की तरह कर दिया, मानो कल वहाँ कोई आबादी ही न थी। इसी तरह हम उन लोगों के लिए खोल-खोलकर निशानियाँ बयान करते है, जो सोच-विचार से काम लेना चाहें
तफ़्सीर:
सांसारिक जीवन का उदाहरण, जिसके आनंद में तुम लीन हो, जल्दी समाप्त होने के मामले में, बारिश के पानी की तरह है, जिससे धरती से उगने वाले पौधे, जिन्हें इनसान भी खाते हैं, जैसे अनाज और फल आदि और पशु भी खाते हैं, जैसे घास आदि, खूब घने होकर निकल आए। यहाँ तक कि जब धरती ने सुंदरता की चादर ओढ़ ली और वह विभिन्न प्रकार के पौधों से सज गई तथा उसके मालिकों ने समझ लिया कि वे धरती की उगाई हुई फसलों को काटने और फलों को तोड़ने में सक्षम हैं, कि अचानक उसे नष्ट करने का हमारा निर्णय आ गया और हमने उसे कटी हुई फ़सल की तरह कर दिया, मानो वह खेत कुछ समय पहले तक पेड़-पौधों से भरा हुआ था ही नहीं। जिस प्रकार हमने तुम्हारे लिए दुनिया की स्थिति और उसके जल्दी ख़त्म होने को खोल-खोलकर बयान किया है, उसी प्रकार हम सोचने और विचार करने वालों के लिए प्रमाणों एवं तर्कों का वर्णन करते हैं।
आयत 25
وَٱللَّهُ يَدْعُوٓا۟ إِلَىٰ دَارِ ٱلسَّلَـٰمِ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَدْعُوٓا۟
वो बुला रहा है
إِلَىٰ
तरफ़
دَارِ
(the) Home
ٱلسَّلَـٰمِ
सलामती वाले घर के
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
और अल्लाह तुम्हें सलामती के घर की ओर बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधी राह चलाता है;
तफ़्सीर:
अल्लाह सभी लोगों को अपनी जन्नत की ओर बुलाता है, जो कि शांति का घर है, जिसमें लोग विपत्तियों और चिंताओं से सुरक्षित होंगे और मौत से भी महफ़ूज़ रहेंगे। अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, इस्लाम धर्म को अपनाने की तौफ़ीक़ देता है, जो इस शांति के घर की ओर ले जाता है।
आयत 26
۞ لِّلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ ٱلْحُسْنَىٰ وَزِيَادَةٌۭ ۖ وَلَا يَرْهَقُ وُجُوهَهُمْ قَتَرٌۭ وَلَا ذِلَّةٌ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
۞ لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
أَحْسَنُوا۟
अच्छा किया
ٱلْحُسْنَىٰ
अच्छाई है
وَزِيَادَةٌۭ ۖ
और ज़्यादा भी
وَلَا
और ना
يَرْهَقُ
छाएगी
وُجُوهَهُمْ
उनके चेहरों पर
قَتَرٌۭ
स्याही
وَلَا
और ना
ذِلَّةٌ ۚ
ज़िल्लत
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
अच्छे से अच्छा कर्म करनेवालों के लिए अच्छा बदला है और इसके अतिरिक्त और भी। और उनके चहरों पर न तो कलौस छाएगी और न ज़िल्लत। वही जन्नतवाले है; वे उसमें सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह के अनिवार्य किए हुए पूजा कार्यों (आज्ञाकारिता) को करके, तथा उसके निषिद्ध किए हुए पापों को त्यागकर अच्छा काम किया; उनके लिए सबसे अच्छा बदला अर्थात् जन्नत है, तथा उनके लिए इससे अधिक एक और वस्तु अर्थात् पवित्र अल्लाह के चेहरे के दर्शन का सौभाग्य है। और उनके चेहरों पर न धूल छाएगी और न ही उनपर तिरस्कार व अपमान छाएगा, एहसान के गुण से विशिष्ट यही लोग जन्नत वाले हैं, जिसमें वे सदैव रहेंगे।
आयत 27
وَٱلَّذِينَ كَسَبُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ جَزَآءُ سَيِّئَةٍۭ بِمِثْلِهَا وَتَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ ۖ مَّا لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ مِنْ عَاصِمٍۢ ۖ كَأَنَّمَآ أُغْشِيَتْ وُجُوهُهُمْ قِطَعًۭا مِّنَ ٱلَّيْلِ مُظْلِمًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَسَبُوا۟
कमाईं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुराईयाँ
جَزَآءُ
बदला (तो)
سَيِّئَةٍۭ
बुराई का
بِمِثْلِهَا
उसी की मानिन्द है
وَتَرْهَقُهُمْ
और छा जाएगी उन पर
ذِلَّةٌۭ ۖ
ज़िल्लत
مَّا
नहीं है
لَهُم
उनके लिए
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِنْ
any
عَاصِمٍۢ ۖ
कोई बचाने वाला
كَأَنَّمَآ
गोया कि
أُغْشِيَتْ
ढाँप दिए गए हैं
وُجُوهُهُمْ
चेहरे उनके
قِطَعًۭا
टुकड़ों से
مِّنَ
from
ٱلَّيْلِ
रात के
مُظْلِمًا ۚ
तारीक
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जिन्होंने बुराइयाँ कमाई, तो एक बुराई का बदला भी उसी जैसा होगा; और ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। उन्हें अल्लाह से बचानेवाला कोई न होगा। उनके चहरों पर मानो अँधेरी रात के टुकड़े ओढ़ा दिए गए हों। वही आगवाले हैं, उन्हें उसमें सदैव रहना है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने कुफ़्र और पाप जैसे बुरे कर्म किए, उनके लिए उस बुराई का बदला जो उन्होंने किया है, आख़िरत में उसी के समान अल्लाह की सज़ा है, और उनके चेहरों पर तिरस्कार व अपमान छाया होगा। जब अल्लाह उनपर अपनी यातना उतारेगा, तो कोई उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला नहीं होगा, मानो कि उनके चेहरों पर अंधेरी रात की तारीकी ओढ़ा दी गई हो। स्याही की यह अधिकता जहन्नम के धुएँ तथा उसकी तारीकी छा जाने के कारण होगी। इन गुणों से विशिष्ट यही लोग जहन्नम वाले हैं, जिसमें वे हमेशा रहेंगे।
आयत 28
وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَمِيعًۭا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ مَكَانَكُمْ أَنتُمْ وَشُرَكَآؤُكُمْ ۚ فَزَيَّلْنَا بَيْنَهُمْ ۖ وَقَالَ شُرَكَآؤُهُم مَّا كُنتُمْ إِيَّانَا تَعْبُدُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نَحْشُرُهُمْ
हम इकट्ठा करेंगे उनको
جَمِيعًۭا
सबके सबको
ثُمَّ
फिर
نَقُولُ
हम कहेंगे
لِلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
أَشْرَكُوا۟
शिर्क किया
مَكَانَكُمْ
अपनी जगह (ठहरो)
أَنتُمْ
तुम
وَشُرَكَآؤُكُمْ ۚ
और शरीक तुम्हारे
فَزَيَّلْنَا
तो जुदाई डाल देंगे हम
بَيْنَهُمْ ۖ
दर्मियान उनके
وَقَالَ
और कहेंगे
شُرَكَآؤُهُم
शरीक उनके
مَّا
ना
كُنتُمْ
थे तुम
إِيَّانَا
सिर्फ़ हमारी ही
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
और जिस दिन हम उन सबको इकट्ठा करेंगे, फिर उन लोगों से, जिन्होंने शिर्क किया होगा, कहेंगे, "अपनी जगह ठहरे रहो तुम भी और तुम्हारे साझीदार भी।" फिर हम उनके बीच अलगाव पैदा कर देंगे, और उनके ठहराए हुए साझीदार कहेंगे, "तुम हमारी तो हमारी बन्दगी नहीं करते थे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप क़ियामत के दिन को याद करें, जब हम सभी प्राणियों को एकत्र करेंगे, फिर हम उन लोगों से कहेंगे, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह के साथ शिर्क किया था : (ऐ मुश्रिको!) अपने-अपने स्थान पर ठहरे रहो, तुम भी और तुम्हारे वे पूज्य भी, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते थे। फिर हम पूज्यों (जिनकी पूजा की जाती थी) और पूजकों (पूजा करने वालों) के बीच अलगाव पैदा कर देंगे। तथा जिनकी पूजा की जाती थी, वे पूजा करने वालों से यह कहते हुए अलग हो जाएँगे : तुम दुनिया में हमारी तो पूजा नहीं करते थे।
आयत 29
فَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًۢا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ إِن كُنَّا عَنْ عِبَادَتِكُمْ لَغَـٰفِلِينَ
فَكَفَىٰ
पस काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
شَهِيدًۢا
गवाह
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَكُمْ
और दर्मियान तुम्हारे
إِن
बेशक
كُنَّا
थे हम
عَنْ
of
عِبَادَتِكُمْ
तुम्हारी इबादत से
لَغَـٰفِلِينَ
अलबत्ता ग़ाफ़िल
"हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है। हमें तो तुम्हारी बन्दगी की ख़बर तक न थी।"
तफ़्सीर:
उस समय उनके वे देवी-देवता, जिनकी उन्होंने अल्लाह के सिवा पूजा की थी, यह कहते हुए अलग हो जाएँगे : अल्लाह गवाह है (और अकेले उसी की गवाही पर्याप्त है) कि हम अपने लिए तुम्हारी पूजा से प्रसन्न नहीं थे। न हमने तुम्हें इसका आदेश दिया था और न हमें तुम्हारी पूजा की ख़बर थी।
आयत 30
هُنَالِكَ تَبْلُوا۟ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّآ أَسْلَفَتْ ۚ وَرُدُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ مَوْلَىٰهُمُ ٱلْحَقِّ ۖ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
هُنَالِكَ
उसी जगह/वक़्त
تَبْلُوا۟
जाँच लेगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
مَّآ
जो
أَسْلَفَتْ ۚ
उसने पहले किया
وَرُدُّوٓا۟
और वो लौटाए जाऐंगे
إِلَى
तरफ़
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَوْلَىٰهُمُ
जो मौला है उनका
ٱلْحَقِّ ۖ
सच्चा
وَضَلَّ
और गुम हो जाएगा
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ते
वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने पहले के किए हुए कर्मों को स्वयं जाँच लेगा और वह अल्लाह, अपने वास्तविक स्वामी की ओर फिरेंगे और जो कुछ झूठ वे घड़ते रहे थे, वह सब उनसे गुम होकर रह जाएगा
तफ़्सीर:
उस महान स्थान में, प्रत्येक व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन में किए हुए कामों को जाँच लेगा और बहुदेववादियों को उनके सत्य पालनहार अर्थात अल्लाह की ओर लौटाया जाएगा, जो उनका हिसाब लेगा और उन्होंने अपनी मूर्तियों की सिफारिश की जो झूठी बात गढ़ ली थी, वह उनसे दूर चली जाएगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया की मिसाल खेती की तरह दी गई है, जो हरी-भरी होकर आखिरकार सूख जाती है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की रौनक अस्थायी है, इसलिए इसमें ज़्यादा उलझना नहीं चाहिए।
आयत 31
قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ أَمَّن يَمْلِكُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَمَن يُخْرِجُ ٱلْحَىَّ مِنَ ٱلْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ ٱلْمَيِّتَ مِنَ ٱلْحَىِّ وَمَن يُدَبِّرُ ٱلْأَمْرَ ۚ فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُ ۚ فَقُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ
قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन
يَرْزُقُكُم
रिज़्क़ देता है तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन से
أَمَّن
या कौन
يَمْلِكُ
मालिक हो सकता है
ٱلسَّمْعَ
कानों
وَٱلْأَبْصَـٰرَ
और आँखों का
وَمَن
और कौन
يُخْرِجُ
निकालता है
ٱلْحَىَّ
ज़िन्दा को
مِنَ
from
ٱلْمَيِّتِ
मुर्दा से
وَيُخْرِجُ
और निकालता है
ٱلْمَيِّتَ
मुर्दा को
مِنَ
from
ٱلْحَىِّ
ज़िन्दा से
وَمَن
और कौन
يُدَبِّرُ
तदबीर करता है
ٱلْأَمْرَ ۚ
काम की
فَسَيَقُولُونَ
तो वो ज़रूर कहेंगे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
فَقُلْ
तो कह दीजिए
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
कहो, "तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी कौन देता है, या ये कान और आँखें किसके अधिकार में है और कौन जीवन्त को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को जीवन्त से निकालता है और कौन यह सारा इन्तिज़ाम चला रहा है?" इसपर वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह!" तो कहो, "फिर आख़िर तुम क्यों नहीं डर रखते?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अल्लाह के साथ शिर्क करने वाले इन लोगों से पूछें : वह कौन है, जो आकाश से बारिश बरसाकर तुम्हें जीविका प्रदान करता हैॽ तथा वह कौन है, जो तुम्हें धरती से उसमें उगने वाले पौधों और उसमें पाए जाने वाले खनिजों के साथ जीविका प्रदान करता है? और वह कौन है, जो जीव को निर्जीव से, जैसे मनुष्य को शुक्राणु से और पक्षी को अंडे से निकालता हैॽ तथा वह कौन है, जो निर्जीव को जीव से, जैसे शुक्राणु को जीवधारी से और अंडे को पक्षी से निकालता हैॽ और वह कौन है, जो आकाशों और धरती तथा उनमें रहने वाले प्राणियों के मामलों का प्रबंध करता हैॽ वे अवश्य जवाब देंगे कि इन सब चीज़ों का करने वाला अल्लाह ही है। तो आप उनसे कह दें : क्या तुम लोग इस बात को नहीं जानते और अल्लाह के आदेशों का पालन करके तथा उसके निषेधों से बचकर उससे डरते नहींॽ!
आयत 32
فَذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَاذَا بَعْدَ ٱلْحَقِّ إِلَّا ٱلضَّلَـٰلُ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ
فَذَٰلِكُمُ
पस ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمُ
रब तुम्हारा
ٱلْحَقُّ ۖ
सच्चा
فَمَاذَا
तो क्या कुछ है
بَعْدَ
बाद
ٱلْحَقِّ
हक़ के
إِلَّا
सिवाय
ٱلضَّلَـٰلُ ۖ
गुमराही के
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ/किधर
تُصْرَفُونَ
तुम फेरे जाते हो
फिर यही अल्लाह तो है तुम्हारा वास्तविक रब। फिर आख़िर सत्य के पश्चात पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और क्या रह जाता है? फिर तुम कहाँ से फिरे जाते हो?
तफ़्सीर:
तो (ऐ लोगो!) जो यह सब कर रहा है, वही सत्य अल्लाह तुम्हारा सृजनहार और तुम्हारे मामलों का प्रबंधन करने वाला है। फिर सत्य के ज्ञान के पश्चात् सत्य से दूरी और विनाश के सिवा और क्या रह जाता हैॽ! तो इस स्पष्ट सत्य को छोड़कर तुम्हारी बुद्धि कहाँ चली जाती हैॽ!
आयत 33
كَذَٰلِكَ حَقَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى ٱلَّذِينَ فَسَقُوٓا۟ أَنَّهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
حَقَّتْ
हक़ हो गई
كَلِمَتُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब की
عَلَى
upon
ٱلَّذِينَ
उन पर जिन्होंने
فَسَقُوٓا۟
नाफ़रमानी की
أَنَّهُمْ
बेशक वो
لَا
(will) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
इसी तरह अवज्ञाकारी लोगों के प्रति तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही कि वे मानेंगे नहीं
तफ़्सीर:
जिस प्रकार अल्लाह के लिए वास्तविक रुबूबियत (प्रतिपालकता) की बात सत्य सिद्ध हो चुकी है, उसी तरह (ऐ रसूल!) हठ के कारण सत्य मार्ग से निकल जाने वालों के प्रति आपके पालनहार की पूर्वनियति वचन भी सत्य होकर रही कि वे लोग ईमान नहीं लाएँगे।
आयत 34
قُلْ هَلْ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ ۚ قُلِ ٱللَّهُ يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
क्या है
مِن
of
شُرَكَآئِكُم
तुम्हारे शरीकों में से कोई
مَّن
जो
يَبْدَؤُا۟
इब्तिदा करता हो
ٱلْخَلْقَ
तख़लीक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ ۚ
वो लौटाता हो उसे
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَبْدَؤُا۟
वो इब्तिदा करता है
ٱلْخَلْقَ
तख़लीक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ ۖ
वो ही लौटाएगा उसे
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ/किधर
تُؤْفَكُونَ
तुम फेरे जाते हो
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में कोई है जो सृष्टि का आरम्भ भी करता हो, फिर उसकी पुनरावृत्ति भी करे?" कहो, "अल्लाह ही सृष्टि का आरम्भ करता है और वही उसकी पुनरावृति भी; आख़िर तुम कहाँ औधे हुए जाते हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन बहुदेववादियों से कह दें : क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में, जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो, कोई ऐसा है, जो पूर्व उदाहरण के बिना उत्पत्ति का आरंभ करे और फिर उसकी मृत्यु के पश्चात् उसे पुनर्जीवित करेॽ आप उनसे कह दें कि अल्लाह ही पूर्व उदाहरण के बिना उत्पत्ति का आरंभ करता है और फिर वही उसकी मृत्यु के पश्चात् उसे पुनर्जीवित करेगा। तो फिर (ऐ बहुदेववादियो!) तुम लोग सत्य से असत्य की ओर कैसे फिरे जा रहे होॽ!
आयत 35
قُلْ هَلْ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَهْدِىٓ إِلَى ٱلْحَقِّ ۚ قُلِ ٱللَّهُ يَهْدِى لِلْحَقِّ ۗ أَفَمَن يَهْدِىٓ إِلَى ٱلْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّىٓ إِلَّآ أَن يُهْدَىٰ ۖ فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
क्या है
مِن
of
شُرَكَآئِكُم
तुम्हारे शरीकों में से कोई
مَّن
जो
يَهْدِىٓ
रहनुमाई करता हो
إِلَى
to
ٱلْحَقِّ ۚ
तरफ़ हक़ के
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَهْدِى
वो रहनुमाई करता है
لِلْحَقِّ ۗ
तरफ़ हक़ के
أَفَمَن
क्या भला जो
يَهْدِىٓ
रहनुमाई करता है
إِلَى
to
ٱلْحَقِّ
तरफ़ हक़ के
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
أَن
कि
يُتَّبَعَ
वो पैरवी किया जाए
أَمَّن
या जो
لَّا
(does) not
يَهِدِّىٓ
नही वो राह पाता
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يُهْدَىٰ ۖ
वो रहनुमाई किया जाए
فَمَا
तो क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
كَيْفَ
कैसे
تَحْكُمُونَ
तुम फ़ैसले करते हो
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए साझीदारों में कोई है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे?" कहो, "अल्लाह ही सत्य के मार्ग पर चलाता है। फिर जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता हो, वह इसका ज़्यादा हक़दार है कि उसका अनुसरण किया जाए या वह जो स्वयं ही मार्ग न पाए जब तक कि उसे मार्ग न दिखाया जाए? फिर यह तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : क्या तुम्हारे ठहराए हुए उन साझीदारों में, जिनकी तुम अल्लाह के अलावा पूजा करते हो, कोई ऐसा है, जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करेॽ आप उनसे कह दें : केवल अल्लाह ही सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है। तो क्या जो लोगों को सीधा रास्ता दिखाए और उसकी ओर लोगों को बुलाए, वह इसका अधिक योग्य है कि उसका अनुसरण किया जाए या कि तुम्हारे वे पूज्य जो स्वयं ही मार्ग नहीं पाते, जबतक कि कोई दूसरा उन्हें मार्ग न दिखा देॽ! फिर तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसे व्यर्थ फ़ैसले करते हो, जब यह दावा करते हो कि वे अल्लाह के साझीदार हैंॽ! अल्लाह तुम्हारे कथन से बहुत ऊँचा है।
आयत 36
وَمَا يَتَّبِعُ أَكْثَرُهُمْ إِلَّا ظَنًّا ۚ إِنَّ ٱلظَّنَّ لَا يُغْنِى مِنَ ٱلْحَقِّ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِمَا يَفْعَلُونَ
وَمَا
और नहीं
يَتَّبِعُ
पैरवी करते
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
إِلَّا
मगर
ظَنًّا ۚ
गुमान की
إِنَّ
बेशक
ٱلظَّنَّ
गुमान
لَا
(does) not
يُغْنِى
नहीं काम आता
مِنَ
against
ٱلْحَقِّ
हक़ के मुक़ाबले में
شَيْـًٔا ۚ
कुछ भी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
يَفْعَلُونَ
वो कर रहे हैं
और उनमें से अधिकतर तो बस अटकल पर चलते है। निश्चय ही अटकल सत्य को कुछ भी दूर नहीं कर सकती। वे जो कुछ कर रहे हैं अल्लाह उसको भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
बहुदेववादियों में से अधिकांश लोग केवल उसी का अनुसरण करते हैं जिसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है। वे केवल भ्रम और संशय का पालन करते हैं। निश्चय संशय न तो ज्ञान का स्थान ले सकता और न ही उससे बेनियाज़ कर सकता है। वे जो कुछ कर रहे हैं, अल्लाह उसे भली-भाँति जानने वाला है। उनके कार्यों में से कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है और वह जल्द ही उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 37
وَمَا كَانَ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانُ أَن يُفْتَرَىٰ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَـٰكِن تَصْدِيقَ ٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ ٱلْكِتَـٰبِ لَا رَيْبَ فِيهِ مِن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरआन
أَن
कि
يُفْتَرَىٰ
वो गढ़ लिया जाए
مِن
by
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَـٰكِن
और लेकिन
تَصْدِيقَ
तस्दीक़ है
ٱلَّذِى
उस चीज़ की जो
بَيْنَ
(was) before it
يَدَيْهِ
उससे पहले है
وَتَفْصِيلَ
और तफ़सील है
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब की
لَا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ
उसमें
مِن
from
رَّبِّ
रब की तरफ़ से है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह से हटकर घड लिया जाए, बल्कि यह तो जिसके समझ है, उसकी पुष्टि में है और किताब का विस्तार है, जिसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं। यह सारे संसार के रब की ओर से है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन कोई ऐसी किताब नहीं है कि उसे गढ़ लिया जाए और अल्लाह के अलावा किसी और की ओर मंसूब कर दिया जाए, क्योंकि लोग निश्चित रूप से इस क़ुरआन जैसी किताब लाने में असमर्थ हैं। बल्कि यह क़ुरआन उससे पहले उतरने वाली किताबों की पुष्टि करने वाला तथा उन पुस्तकों में सार रूप से वर्णन किए गए अहकाम का विवरण प्रस्तुत करने वाला है। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सभी प्राणियों के पालनहार सर्वशक्तिमान (अल्लाह) की ओर से उतारा गया है।
आयत 38
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍۢ مِّثْلِهِۦ وَٱدْعُوا۟ مَنِ ٱسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ٱفْتَرَىٰهُ ۖ
उसने गढ़ लिया है उसे
قُلْ
कह दीजिए
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِسُورَةٍۢ
एक सूरत
مِّثْلِهِۦ
इस जैसी
وَٱدْعُوا۟
और बुला लो
مَنِ
जिन्हें
ٱسْتَطَعْتُم
इस्तिताअत रखते हो तुम
مِّن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
(क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते है, "इस व्यक्ति (पैग़म्बर) ने उसे स्वयं ही घड़ लिया है?" कहो, "यदि तुम सच्चे हो, तो इस जैसी एक सुरा ले आओ और अल्लाह से हटकर उसे बुला लो, जिसपर तुम्हारा बस चले।"
तफ़्सीर:
बल्कि, क्या ये बहुदेववादी कहते हैं : मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस क़ुरआन को अपनी तरफ़ से गढ़ लिया है और उसे अल्लाह की तरफ़ मंसूब कर दिया है? (ऐ रसूल!) आप उनका खंडन करते हुए कह दें : यदि (तुम्हारे कहने के अनुसार) मैं इसे अपनी तरफ़ से गढ़कर लाया हूँ, जबकि मैं तुम्हारे ही जैसा एक इनसान हूँ, तो तुम इसके समान एक सूरत ही ले आओ और अपनी सहायता के लिए जिसे बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि क़ुरआन मनगढ़ंत और झूठा है। सच्चाई यह है कि तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे। यदि तुम भाषाविद तथा वाक्पटु होने के बावजूद ऐसा नहीं कर सकते, तो यह इस बात का प्रमाण है कि क़ुरआन अल्लाह की ओर से उतरने वाली पुस्तक है।
आयत 39
بَلْ كَذَّبُوا۟ بِمَا لَمْ يُحِيطُوا۟ بِعِلْمِهِۦ وَلَمَّا يَأْتِهِمْ تَأْوِيلُهُۥ ۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلظَّـٰلِمِينَ
بَلْ
बल्कि
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِمَا
उसे जो
لَمْ
नहीं
يُحِيطُوا۟
उन्होंने अहाता किया
بِعِلْمِهِۦ
जिसके इल्म का
وَلَمَّا
हालाँकि नहीं
يَأْتِهِمْ
आई उनके पास
تَأْوِيلُهُۥ ۚ
तावील/हक़ीक़त उसकी
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
before them
قَبْلِهِمْ ۖ
उनसे पहले थे
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों का
बल्कि बात यह है कि जिस चीज़ के ज्ञान पर वे हावी न हो सके, उसे उन्होंने झुठला दिया और अभी उसका परिणाम उनके सामने नहीं आया। इसी प्रकार उन लोगों ने भी झुठलाया था, जो इनसे पहले थे। फिर देख लो उन अत्याचारियों का कैसा परिणाम हुआ!
तफ़्सीर:
उन्होंने क़ुरआन को नहीं माना, बल्कि उसको समझने और उसमें मनन-चिंतन करने से पहले ही तथा जिस यातना से उन्हें डराया गया था उसके आने से पूर्व ही उन्होंने इस क़ुरआन को झुठलाने में जल्दी दिखाई, जबकि उस यातना के आने का समय क़रीब हो चुका था। इनके झुठलाने ही की तरह, पिछले समुदायों ने भी झुठलाया था, जिसके कारण उन्हें यातनाओं का सामना करना पड़ा। अतः (ऐ रसूल!) आप सोचें कि उन झुठलाने वाले समुदायों का अंत कैसा रहा? निश्चित रूप से अल्लाह ने उन्हें नष्ट कर दिया।
आयत 40
وَمِنْهُم مَّن يُؤْمِنُ بِهِۦ وَمِنْهُم مَّن لَّا يُؤْمِنُ بِهِۦ ۚ وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِٱلْمُفْسِدِينَ
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يُؤْمِنُ
ईमान लाता है
بِهِۦ
उस पर
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
لَّا
(does) not
يُؤْمِنُ
नहीं वो ईमान लाता
بِهِۦ ۚ
उस पर
وَرَبُّكَ
और रब आपका
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों को
उनमें कुछ लोग उसपर ईमान रखनेवाले है और उनमें कुछ लोग उसपर ईमान लानेवाले नहीं है। और तुम्हारा रब बिगाड़ पैदा करनेवालों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
बहुदेववादियों में से कुछ लोग अपनी मृत्यु से पहले क़ुरआन पर ईमान ले आएँगे और कुछ लोग अपने हठ और अहंकार के कारण मरते दम तक इसपर ईमान नहीं लाएँगे। (ऐ रसूल!) आपका पालनहार कुफ़्र पर जमे रहने वालों को सबसे ज़्यादा जानने वाला है और उन्हें उनके कुफ़्र का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह ही रोज़ी और तदबीर का असली मालिक होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रोज़ी और तदबीर का असली मालिक अल्लाह है, इसलिए कोशिश के साथ भरोसा भी ज़रूरी है।
आयत 41
وَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل لِّى عَمَلِى وَلَكُمْ عَمَلُكُمْ ۖ أَنتُم بَرِيٓـُٔونَ مِمَّآ أَعْمَلُ وَأَنَا۠ بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تَعْمَلُونَ
وَإِن
और अगर
كَذَّبُوكَ
वो झुठलाऐं आपको
فَقُل
तो कह दीजिए
لِّى
मेरे लिए है
عَمَلِى
अमल मेरा
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए है
عَمَلُكُمْ ۖ
अमल तुम्हरा
أَنتُم
तुम
بَرِيٓـُٔونَ
बरी उज़ ज़िम्मा हो
مِمَّآ
उससे जो
أَعْمَلُ
मैं अमल करता हूँ
وَأَنَا۠
और मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़ ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
और यदि वे तुझे झुठलाएँ तो कह दो, "मेरा कर्म मेरे लिए है और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं करता हूँ उसकी ज़िम्मेदारी से तुम बरी हो और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ।"
तफ़्सीर:
यदि (ऐ रसूल!) आपकी क़ौम के लोग आपको झुठलाएँ, तो उनसे कह दें : मेरे लिए मेरे कर्म का सवाब है और मुझे ही अपने कर्म की ज़िम्मेदारी उठानी है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म का सवाब है और तुम्हें ही उसका दंड झेलना है। जो कुछ मैं कर रहा हूँ उसके दंड से तुम बरी हो और जो कुछ तुम कर रहे हो उसके दंड से मैं बरी हूँ।
आयत 42
وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا۟ لَا يَعْقِلُونَ
وَمِنْهُم
और कुछ उनमें से हैं
مَّن
जो
يَسْتَمِعُونَ
कान लगाते हैं
إِلَيْكَ ۚ
तरफ़ आपके
أَفَأَنتَ
क्या फिर आप
تُسْمِعُ
सुनाऐंगे
ٱلصُّمَّ
बहरों को
وَلَوْ
और अगरचे
كَانُوا۟
हों वो
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
ना वो अक़्ल रखते
और उनमें बहुत-से ऐसे लोग है जो तेरी ओर कान लगाते है। किन्तु क्या तू बहरों को सुनाएगा, चाहे वे समझ न रखते हों?
तफ़्सीर:
बहुदेववादियों में से कुछ लोग ऐसे हैं कि जब आप क़ुरआन पढ़ते हैं, तो वे (ऐ रसूल!) आपकी ओर कान लगा लेते हैं, परंतु मानने और पालन करने के उद्देश्य से नहीं। तो क्या आप उन लोगों को सुना सकते हैं, जिनसे सुनने की शक्ति छीन ली गई है?! इसी प्रकार आप इन लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखा सकते, जो सत्य को सुनने से बहरे हैं। अतः वे उसे समझते नहीं हैं।
आयत 43
وَمِنْهُم مَّن يَنظُرُ إِلَيْكَ ۚ أَفَأَنتَ تَهْدِى ٱلْعُمْىَ وَلَوْ كَانُوا۟ لَا يُبْصِرُونَ
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَنظُرُ
देखता है
إِلَيْكَ ۚ
तरफ़ आपके
أَفَأَنتَ
क्या फिर आप
تَهْدِى
राह दिखाऐंगे
ٱلْعُمْىَ
अँधों को
وَلَوْ
और अगरचे
كَانُوا۟
हों वो
لَا
(do) not
يُبْصِرُونَ
ना वो देखते
और कुछ उनमें ऐसे हैं, जो तेरी ओर ताकते हैं, किन्तु क्या तू अंधों का मार्ग दिखाएगा, चाहे उन्हें कुछ सूझता न हो?
तफ़्सीर:
तथा बहुदेववादियों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो (ऐ रसूल!) आपकी ओर केवल अपनी बाह्य दृष्टि से देखते हैं, अपनी अंतर्दृष्टि से नहीं। तो क्या आप उन लोगों को प्रबुद्ध कर सकते हैं, जिन्होंने अपनी दृष्टि खो दी है?! निःसंदेह आप ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार आप अंतर्दृष्टि से वंचित व्यक्ति को सीधा मार्ग नहीं दिखा सकते।
आयत 44
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظْلِمُ ٱلنَّاسَ شَيْـًۭٔا وَلَـٰكِنَّ ٱلنَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَظْلِمُ
नहीं ज़ुल्म करता
ٱلنَّاسَ
लोगों पर
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱلنَّاسَ
लोग
أَنفُسَهُمْ
अपनी ही जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते हैं
अल्लाह तो लोगों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता, किन्तु लोग स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार करने से पाक है। वह उनपर कणभर भी अत्याचार नहीं करता, परंतु वे स्वयं ही असत्य के पक्षपात, अहंकार और हठ के कारण खुद को विनाश के साधनों में लाकर अपनी जानों पर अत्याचार करते हैं।
आयत 45
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ كَأَن لَّمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا سَاعَةًۭ مِّنَ ٱلنَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيْنَهُمْ ۚ قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱللَّهِ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَحْشُرُهُمْ
वो इकट्ठा करेगा उन्हें
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
नहीं
يَلْبَثُوٓا۟
वो ठहरे
إِلَّا
मगर
سَاعَةًۭ
एक घड़ी
مِّنَ
of
ٱلنَّهَارِ
दिन की
يَتَعَارَفُونَ
वो एक दूसरे को पहचानते रहे
بَيْنَهُمْ ۚ
आपस में
قَدْ
तहक़ीक़
خَسِرَ
ख़सारा पाया
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِلِقَآءِ
मुलाक़ात को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
مُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वाले
जिस दिन वह उनको इकट्ठा करेगा तो ऐसा जान पड़ेगा जैसे वे दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे। वे परस्पर एक-दूसरे को पहचानेंगे। वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया और वे मार्ग न पा सके
तफ़्सीर:
और जब क़ियामत के दिन अल्लाह लोगों को हिसाब-किताब के लिए एकत्र करेगा, तो उन्हें लगेगा कि वे अपने दुनिया के जीवन और क़ब्र में केवल दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे, उससे ज़्यादा नहीं। वहाँ वे एक-दूसरे को पहचानेंगे। फिर उनके एक-दूसरे को पहचानने का सिलसिला क़ियामत के दिन की भयावहता को देखकर समाप्त हो जाएगा। वास्तव में, वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने पालनहार से मिलने को झुठलाया तथा वे दुनिया में दोबारा जीवित होने के दिन पर ईमान रखने वाले नहीं थे कि घाटे से बच सकें।
आयत 46
وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ ٱلَّذِى نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ ٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ
وَإِمَّا
और अगर
نُرِيَنَّكَ
हम दिखाऐं आपको
بَعْضَ
बाज़
ٱلَّذِى
वो चीज़ जो
نَعِدُهُمْ
हम वादा करते हैं उनसे
أَوْ
या
نَتَوَفَّيَنَّكَ
हम फ़ौत कर दें आपको
فَإِلَيْنَا
तो तरफ़ हमारे ही
مَرْجِعُهُمْ
लौटना है उनको
ثُمَّ
फिर
ٱللَّهُ
अल्लाह
شَهِيدٌ
ख़ूब गवाह है
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
يَفْعَلُونَ
वो करते हैं
जिस चीज़ का हम उनसे वादा करते है उसमें से कुछ चाहे तुझे दिखा दें या हम तुझे (इससे पहले) उठा लें, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है। फिर जो कुछ वे कर रहे है उसपर अल्लाह गवाह है
तफ़्सीर:
और यदि हम (ऐ रसूल!) आपको उस यातना का कुछ हिस्सा जिसका हमने उनसे वादा किया है, आपकी मृत्यु से पहले दिखा दें, या हम आपको उससे पहले मृत्यु दे दें, तो दोनों स्थितियों में उन्हें हमारे पास ही लौटकर आना है। फिर जो कुछ वे कर रहे हैं अल्लाह उससे अवगत है, उससे उनकी कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह शीघ्र ही उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा।
आयत 47
وَلِكُلِّ أُمَّةٍۢ رَّسُولٌۭ ۖ فَإِذَا جَآءَ رَسُولُهُمْ قُضِىَ بَيْنَهُم بِٱلْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَلِكُلِّ
और वास्ते हर
أُمَّةٍۢ
उम्मत के
رَّسُولٌۭ ۖ
एक रसूल है
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाता है
رَسُولُهُمْ
रसूल उनका
قُضِىَ
फ़ैसला कर दिया जाता है
بَيْنَهُم
दर्मियान उनके
بِٱلْقِسْطِ
साथ इन्साफ़ के
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
नहीं वो ज़ुल्म किए जाते
प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता
तफ़्सीर:
पिछले समुदायों में से प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल था, जो उनकी ओर भेजा गया था। फिर जब उस (रसूल) ने उन्हें वह संदेश पहुँचा दिया, जिसे पहुँचाने का उसे आदेश दिया गया था और लोगों ने उसे झुठला दिया, तो उनके तथा रसूल के बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया गया। चुनाँचे अल्लाह ने अपनी कृपा से रसूल को बचा लिया और अपने न्याय से उन लोगों को नष्ट कर दिया। तथा उनके कर्मों का बदला देने में उनके साथ कुछ भी अन्याय नहीं किया जाता।
आयत 48
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
(will) this
ٱلْوَعْدُ
ये वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?"
तफ़्सीर:
और ये काफ़िर लोग हठधर्मी करते हुए और चुनौती देते हुए कहते हैं : यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो, तो बताओ कि जिस यातना का तुमने हमसे वादा किया था, उसका समय कब आएगा?!
आयत 49
قُل لَّآ أَمْلِكُ لِنَفْسِى ضَرًّۭا وَلَا نَفْعًا إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۗ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۚ إِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَـْٔخِرُونَ سَاعَةًۭ ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَمْلِكُ
नहीं मैं मालिक
لِنَفْسِى
अपनी जान के लिए
ضَرًّۭا
किसी नुक़सान का
وَلَا
और ना
نَفْعًا
किसी नफ़ा का
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
لِكُلِّ
वास्ते हर
أُمَّةٍ
उम्मत के
أَجَلٌ ۚ
एक मुक़र्रर मुद्दत है
إِذَا
जब
جَآءَ
आ जाएगी
أَجَلُهُمْ
मुक़र्रर मुद्दत उनकी
فَلَا
तो नहीं
يَسْتَـْٔخِرُونَ
वो पीछे रह सकेंगे
سَاعَةًۭ ۖ
एक घड़ी
وَلَا
और ना
يَسْتَقْدِمُونَ
वो आगे बढ़ सकेंगे
कहो, "मुझे अपने लिए न तो किसी हानि का अधिकार प्राप्त है और न लाभ का, बल्कि अल्लाह जो चाहता है वही होता है। हर समुदाय के लिए एक नियत समय है, जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न घड़ी भर पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मैं स्वयं अपने लिए न किसी हानि का मालिक हूँ कि स्वयं को उससे नुक़सान पहुँचाऊँ या ख़ुद से उसे हटा सकूँ, और न ही किसी लाभ का मालिक हूँ कि उससे स्वयं को फायदा पहुँचाऊँ। तो मैं किसी और को कैसे फायदा या नुक़सान पहुँचा सकता हूँ? सिवाय उसके जो अल्लाह उसमें से चाहे, तो फिर मैं उसके ग़ैब की बातों को कैसे जान सकता हूँ? प्रत्येक समुदाय, जिसे अल्लाह ने विनाश की धमकी दी है, उसके विनाश का एक समय निर्धारित है, जिसका ज्ञान केवल अल्लाह को है। अतः जब उसके विनाश का समय आ जाता है, तो वे उससे न कुछ पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं।
आयत 50
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُهُۥ بَيَـٰتًا أَوْ نَهَارًۭا مَّاذَا يَسْتَعْجِلُ مِنْهُ ٱلْمُجْرِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِنْ
अगर
أَتَىٰكُمْ
आ जाए तुम्हारे पास
عَذَابُهُۥ
अज़ाब उसका
بَيَـٰتًا
रात को
أَوْ
या
نَهَارًۭا
दिन को
مَّاذَا
क़्या है
يَسْتَعْجِلُ
वो जल्दी तलब कर रहे हैं (जो)
مِنْهُ
उसमें से
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर उसकी यातना रातों रात या दिन को आ जाए तो (क्या तुम उसे टाल सकोगे?) वह आख़िर कौन-सी चीज़ होगी जिसके लिए अपराधियों को जल्दी पड़ी हुई है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप यातना की जल्दी मचाने वालों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना रात या दिन के किसी समय आ जाए, तो आख़िर कौन-सी चीज़ है, जिसे तुम इस यातना से जल्दी चाहते हो?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
हर कौम के लिए एक मुकर्रर वक्त (मोहलत) होने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हर मुश्किल और मोहलत का एक वक्त होता है, इसलिए हौसला बनाए रखना चाहिए।
आयत 51
أَثُمَّ إِذَا مَا وَقَعَ ءَامَنتُم بِهِۦٓ ۚ ءَآلْـَٔـٰنَ وَقَدْ كُنتُم بِهِۦ تَسْتَعْجِلُونَ
أَثُمَّ
क्या फिर
إِذَا
when
مَا
ज्योहीं
وَقَعَ
वो वाक़ेअ होगा
ءَامَنتُم
ईमान लाओगे तुम (तब)
بِهِۦٓ ۚ
उस पर
ءَآلْـَٔـٰنَ
क्या अब
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
उसी को
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्दी तलब किया करते
क्या फिर जब वह घटित हो जाएगी तब तुम उसे मानोगे? - क्या अब! इसी के लिए तो तुम जल्दी मचा रहे थे!"
तफ़्सीर:
क्या जिस यातना का तुमसे वादा किया गया है, उसके तुम्हारे ऊपर घटित हो जाने के बाद तुम ईमान लाओगे, जबकि उस समय किसी व्यक्ति को उसका ईमान लाभ नहीं देगा, जो उससे पहले ईमान नहीं लाया था? क्या तुम अब ईमान ला रहे हो, हालाँकि इससे पहले तुम यातना के लिए उसे झुठलाने के तौर पर जल्दी मचाया करते थे?!
आयत 52
ثُمَّ قِيلَ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلْخُلْدِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا بِمَا كُنتُمْ تَكْسِبُونَ
ثُمَّ
फिर
قِيلَ
कहा जाएगा
لِلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
ذُوقُوا۟
चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْخُلْدِ
हमेशगी का
هَلْ
नहीं
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जा रहे
إِلَّا
मगर
بِمَا
उसका जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْسِبُونَ
तुम कमाई करते
"फिर अत्याचारी लोगों से कहा जाएगा, "स्थायी यातना का मज़ा चख़ो! जो कुछ तुम कमाते रहे हो, उसके सिवा तुम्हें और क्या बदला दिया जा सकता है?"
तफ़्सीर:
फिर उन्हें यातना में डाले जाने और उनकी ओर से उससे बाहर निकलने की माँग किए जाने के पश्चात उनसे कहा जाएगा : आख़िरत की स्थायी यातना का स्वाद चखो। क्या जो कुफ़्र और पाप तुम किया करते थे, तुम्हें उसके अलावा किसी और चीज़ का बदला दिया जाएगा?!
आयत 53
۞ وَيَسْتَنۢبِـُٔونَكَ أَحَقٌّ هُوَ ۖ قُلْ إِى وَرَبِّىٓ إِنَّهُۥ لَحَقٌّۭ ۖ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
۞ وَيَسْتَنۢبِـُٔونَكَ
और वो पूछते हैं आपसे
أَحَقٌّ
क्या सच है
هُوَ ۖ
वो
قُلْ
कह दीजिए
إِى
हाँ
وَرَبِّىٓ
क़सम है मेरे रब की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَحَقٌّۭ ۖ
यक़ीनन हक़ है
وَمَآ
और नहीं
أَنتُم
तुम
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
वे तुम से चाहते है कि उन्हें ख़बर दो कि "क्या वह वास्तव में सत्य है?" कह दो, "हाँ, मेरे रब की क़सम! वह बिल्कुल सत्य है और तुम क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले नहीं हो।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) बहुदेववादी लोग आपसे पूछते हैं : क्या यह यातना, जिसका हमसे वादा किया गया है, सत्य है? आप उनसे कह दें : हाँ, (अल्लाह की क़सम!) निश्चय यह बिल्कुल सत्य है और तुम उससे बच नहीं सकते हो।
आयत 54
وَلَوْ أَنَّ لِكُلِّ نَفْسٍۢ ظَلَمَتْ مَا فِى ٱلْأَرْضِ لَٱفْتَدَتْ بِهِۦ ۗ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ۖ وَقُضِىَ بَيْنَهُم بِٱلْقِسْطِ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَلَوْ
और अगर
أَنَّ
बेशक हो
لِكُلِّ
for every
نَفْسٍۢ
हर नफ़्स के लिए
ظَلَمَتْ
जिसने ज़ुल्म किया
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
لَٱفْتَدَتْ
अलबत्ता वो फ़िदया दे दे
بِهِۦ ۗ
उसका
وَأَسَرُّوا۟
और वो छुपाऐंगे
ٱلنَّدَامَةَ
नदामत को
لَمَّا
जब
رَأَوُا۟
वो देखेंगे
ٱلْعَذَابَ ۖ
अज़ाब
وَقُضِىَ
और फ़ैसला कर दिया जाएगा
بَيْنَهُم
दर्मियान उनके
بِٱلْقِسْطِ ۚ
साथ इन्साफ़ के
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
यदि प्रत्येक अत्याचारी व्यक्ति के पास वह सब कुछ हो जो धरती में है, तो वह अर्थदंड के रूप में उसे दे डाले। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन में पछताएँगे। उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार न होगा
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह के साथ शिर्क करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को धरती का सारा बहुमूल्य धन प्राप्त हो जाए, तो वह उसे अपने आपको अल्लाह की यातना से छुड़ाने के बदले में दे देगा, यदि उसे ऐसा करने का अवसर प्रदान किया जाए। तथा बहुदेववादी लोग जब क़ियामत के दिन यातना को देखेंगे, तो अपने अविश्वास पर पछतावे को छिपाएँगे। और अल्लाह उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर देगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें उनके कर्मों का बदला दिया जाएगा।
आयत 55
أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ أَلَآ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन में है
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ
सच्चा है
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
सुन लो, जो कुछ आकाशों और धरती में है, अल्लाह ही का है। जान लो, निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है, किन्तु उनमें अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
सुन लो! जो कुछ आकाशों में है उसका मालिक और जो कुछ धरती में है उसका मालिक केवल अल्लाह है। याद रखो! निःसंदेह काफिरों को दंडित करने का अल्लाह का वादा सच्चा है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। परंतु अधिकांश लोग इस बात को नहीं जानते। अतः वे (इसके बारे में) संदेह करते हैं।
आयत 56
هُوَ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
هُوَ
वो ही
يُحْىِۦ
वो ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ
और वो मौत देता है
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
वही जिलाता है और मारता है और उसी की ओर तुम लौटाए जा रहे हो
तफ़्सीर:
वही पवित्र अल्लाह मरे हुए लोगों को जीवित करता है और जीवित लोगों को मौत देता है तथा क़ियामत के दिन तुम सब उसी की ओर लौटाए जाओगे। फिर वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आयत 57
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدْ جَآءَتْكُم مَّوْعِظَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَشِفَآءٌۭ لِّمَا فِى ٱلصُّدُورِ وَهُدًۭى وَرَحْمَةٌۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O mankind
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَتْكُم
आ चुकी तुम्हारे पास
مَّوْعِظَةٌۭ
एक नसीहत
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَشِفَآءٌۭ
और शिफ़ा
لِّمَا
उसके लिए जो
فِى
(is) in
ٱلصُّدُورِ
सीनों में है
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत
لِّلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से उपदेश औऱ जो कुछ सीनों में (रोग) है, उसके लिए रोगमुक्ति और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता आ चुकी है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! तुम्हारे पास क़ुरआन आ गया है, जिसमें सदुपदेश, प्रोत्साहन और डरावा है। तथा वह दिलों के अंदर मौजूद संशय और शंका की बीमारी का इलाज, और सत्य के रास्ते के लिए मार्गदर्शन है, तथा उसमें ईमान वालों के लिए दया है; क्योंकि वही उससे लाभ उठाते हैं।
आयत 58
قُلْ بِفَضْلِ ٱللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِۦ فَبِذَٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوا۟ هُوَ خَيْرٌۭ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
قُلْ
कह दीजिए
بِفَضْلِ
In the Bounty
ٱللَّهِ
साथ अल्लाह के फ़ज़ल के
وَبِرَحْمَتِهِۦ
और उसकी रहमत के
فَبِذَٰلِكَ
तो उस पर
فَلْيَفْرَحُوا۟
पस ज़रूर वो ख़ुश हों
هُوَ
वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّمَّا
उससे जो
يَجْمَعُونَ
वो जमा करते हैं
कह दो, "यह अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से है, अतः इस पर प्रसन्न होना चाहिए। यह उन सब चीज़ों से उत्तम है, जिनको वे इकट्ठा करने में लगे हुए है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप लोगों से कह दें : मैं जो क़ुरआन तुम्हारे पास लेकर आया हूँ, वह अल्लाह की तरफ़ से तुमपर एक अनुकंपा और दया है। अतः अल्लाह ने इस क़ुरआन को उतारकर तुमपर जो अनुकंपा और दया की है, उसपर प्रसन्न हो, इनके सिवा किसी और बात पर नहीं। क्योंकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो कुछ अपने पालनहार की तरफ़ से उनके पास लेकर आए हैं, वह दुनिया की उस नश्वर सामग्री से उत्तम है, जिसे वे इकट्ठा कर रहे हैं।
आयत 59
قُلْ أَرَءَيْتُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ لَكُم مِّن رِّزْقٍۢ فَجَعَلْتُم مِّنْهُ حَرَامًۭا وَحَلَـٰلًۭا قُلْ ءَآللَّهُ أَذِنَ لَكُمْ ۖ أَمْ عَلَى ٱللَّهِ تَفْتَرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُم
क्या ग़ौर किया तुमने
مَّآ
जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
of
رِّزْقٍۢ
रिज़्क़ में से
فَجَعَلْتُم
तो बना लिया तुमने
مِّنْهُ
उसमें से
حَرَامًۭا
कुछ हराम
وَحَلَـٰلًۭا
और कुछ हलाल
قُلْ
कह दीजिए
ءَآللَّهُ
क्या अल्लाह ने
أَذِنَ
इजाज़त दी है
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
أَمْ
या
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
تَفْتَرُونَ
तुम झूठ गढ़ते हो
कह दो, "क्या तुम लोगों ने यह भी देखा कि जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए उतारी है उसमें से तुमने स्वयं ही कुछ को हराम और हलाल ठहरा लिया?" कहो, "क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है या तुम अल्लाह पर झूठ घड़कर थोप रहे हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों (बहुदेववादियों) से कह दें : मुझे इस बारे में बताओ कि अल्लाह ने जो रोज़ी उतारकर तुमपर उपकार किया है, फिर तुमने उसमें अपनी इच्छाओं से काम लेते हुए कुछ को हराम ठहरा लिया है और कुछ को हलाल। आप उनसे पूछें : क्या जिन चीज़ों को तुमने हलाल ठहराया है, उन्हें हलाल ठहराने तथा जिन चीज़ों को तुमने हराम ठहराया है, उन्हें हराम ठहराने की अल्लाह ने तुम्हें अनुमति प्रदान की है, या तुम लोग अल्लाह पर झूठ गढ़ते हो?!
आयत 60
وَمَا ظَنُّ ٱلَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ
وَمَا
और क्या है
ظَنُّ
गुमान
ٱلَّذِينَ
उनका जो
يَفْتَرُونَ
गढ़ते हैं
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
يَوْمَ
(on) the Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के दिन में
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَذُو
(is) surely Full (of) Bounty
فَضْلٍ
अलबत्ता फ़ज़ल वाला है
عَلَى
to
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(are) not
يَشْكُرُونَ
नहीं वो शुक्र करते
जो लोग झूठ घड़कर उसे अल्लाह पर थोंपते है, उन्होंने क़ियामत के दिन के विषय में क्या समझ रखा है? अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा अनुग्रहवाला है, किन्तु उनमें अधिकतर कृतज्ञता नहीं दिखलाते
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर झूठ गढ़ते हैं, वे क्या सोचते हैं कि क़ियामत के दिन उनके साथ क्या कुछ होने वाला है?! क्या वे यह समझते है कि उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा?! यह बहुत दूर की बात है। वास्तव में अल्लाह लोगों पर बड़ा कृपालु है कि उन्हें मोहलत देता है और उन्हें दंड देने में जल्दी नहीं करता। परंतु उनमें से अधिकांश लोग अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का इनकार करने वाले हैं। अतः वे उनके प्रति आभारी नहीं होते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अपनी मर्ज़ी से हलाल-हराम बनाने की मुमानअत है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपनी मर्ज़ी से हलाल-हराम तय करना गलत है, यह अल्लाह का हक है।
आयत 61
وَمَا تَكُونُ فِى شَأْنٍۢ وَمَا تَتْلُوا۟ مِنْهُ مِن قُرْءَانٍۢ وَلَا تَعْمَلُونَ مِنْ عَمَلٍ إِلَّا كُنَّا عَلَيْكُمْ شُهُودًا إِذْ تُفِيضُونَ فِيهِ ۚ وَمَا يَعْزُبُ عَن رَّبِّكَ مِن مِّثْقَالِ ذَرَّةٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ وَلَآ أَصْغَرَ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكْبَرَ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍۢ مُّبِينٍ
وَمَا
और नहीं
تَكُونُ
आप होते
فِى
[in]
شَأْنٍۢ
किसी हाल में
وَمَا
और नहीं
تَتْلُوا۟
आप पढ़ते
مِنْهُ
उस (की तरफ़) से
مِن
from
قُرْءَانٍۢ
कुछ क़ुरआन
وَلَا
और नहीं
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
مِنْ
any
عَمَلٍ
कोई अमल
إِلَّا
मगर
كُنَّا
होते हैं हम
عَلَيْكُمْ
तुम पर
شُهُودًا
गवाह/शाहिद
إِذْ
जब
تُفِيضُونَ
तुम मशग़ूल होते हो
فِيهِ ۚ
उसमें
وَمَا
और नहीं
يَعْزُبُ
छुपता
عَن
from
رَّبِّكَ
आपके रब से
مِن
of
مِّثْقَالِ
हम वज़न
ذَرَّةٍۢ
ज़र्रे के
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
وَلَآ
और ना
أَصْغَرَ
छोटा
مِن
than
ذَٰلِكَ
उससे
وَلَآ
और ना
أَكْبَرَ
बड़ा
إِلَّا
मगर
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍۢ
a Record
مُّبِينٍ
एक खुली किताब में है
तुम जिस दशा में भी होते हो और क़ुरआन से जो कुछ भी पढ़ते हो और तुम लोग जो काम भी करते हो हम तुम्हें देख रहे होते है, जब तुम उसमें लगे होते हो। और तुम्हारे रब से कण भर भी कोई चीज़ छिपी नहीं है, न धरती में न आकाश में और न उससे छोटी और न बड़ी कोई त चीज़ ऐसी है जो एक स्पष्ट किताब में मौजूद न हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप जिस कार्य में भी होते हैं और क़ुरआन में से जो कुछ भी पढ़ते हैं, तथा (ऐ मोमिनों!) तुम जो काम भी करते हो, हम तुम्हें जानते हुए देख रहे होते हैं और तुम्हें सुन रहे होते हैं, जब तुम कार्य करना शुरू करते हो। तुम्हारे पालनहार के ज्ञान से आकाश या धरती में कणभर भी कोई चीज़ ग़ायब नहीं होती। तथा इससे कम वज़न या इससे अधिक वज़न की कोई चीज़ नहीं है, परंतु वह एक स्पष्ट पुस्तक में दर्ज है, जो न कोई छोटी बात छोड़ती है और न बड़ी, बल्कि सबको अपने अंदर समाहित कर रखा है।
आयत 62
أَلَآ إِنَّ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لَا
(there will be) no
خَوْفٌ
ना कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
सुन लो, अल्लाह के मित्रों को न तो कोई डर है और न वे शोकाकुल ही होंगे
तफ़्सीर:
सुन लो! निःसंदेह अल्लाह के मित्रों को न भविष्य में क़ियामत की भयावहता का डर होगा और न वे दुनिया के छूट जाने वाले आनंद पर शोकाकुल होंगे।
आयत 63
ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَكَانُوا۟
और हैं वो
يَتَّقُونَ
वो तक़वा करते
ये वे लोग है जो ईमान लाए और डर कर रहे
तफ़्सीर:
ये अल्लाह के मित्र वे लोग हैं, जो अल्लाह पर और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान रखते थे तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरते थे।
आयत 64
لَهُمُ ٱلْبُشْرَىٰ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ لَا تَبْدِيلَ لِكَلِمَـٰتِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
لَهُمُ
उन्हीं के लिए
ٱلْبُشْرَىٰ
ख़ुशख़बरी है
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَفِى
and in
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
और आख़िरत में
لَا
No
تَبْدِيلَ
नहीं तबदील होना
لِكَلِمَـٰتِ
कलिमात को
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
ذَٰلِكَ
ये है
هُوَ
वो ही
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
उनके लिए सांसारिक जीवन में भी शुभ-सूचना है और आख़िरत में भी - अल्लाह के शब्द बदलते नहीं - यही बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
उनके लिए, उनके पालनहार की ओर से, दुनिया में प्रसन्नता प्रदान करने वाले अच्छे स्वप्न या लोगों की प्रशंसा के रूप में शुभ-सूचना है, तथा उनके लिए फ़रिश्तों की ओर से शुभ समाचार है जब उनके प्राण निकाले जाते हैं, तथा मृत्यु के बाद एवं प्रलय के दिन। अल्लाह ने उनसे जो वादा किया है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा। यह प्रतिफल ही महान सफलता है; क्योंकि इसमें उद्देश्य की प्राप्ति एवं भय से मुक्ति है।
आयत 65
وَلَا يَحْزُنكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّ ٱلْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا ۚ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
وَلَا
और ना
يَحْزُنكَ
ग़मगीन करे आपको
قَوْلُهُمْ ۘ
बात उनकी
إِنَّ
बेशक
ٱلْعِزَّةَ
इज़्ज़त
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
جَمِيعًا ۚ
सारी की सारी
هُوَ
वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
उनकी बात तुम्हें दुखी न करे, सारा प्रभुत्व अल्लाह ही के लिए है, वह सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) ये लोग आपके धर्म के बारे में जो तिरस्कार और लांछन की बातें करते हैं, आप उससे दुःखी न हों। निःसंदेह समस्त प्रभुत्व एवं आधिपत्य अल्लाह ही के लिए है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती। वह उनकी बातों का सुनने वाला और उनके कार्यों का जानने वाला है और जल्द ही उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 66
أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَمَا يَتَّبِعُ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ شُرَكَآءَ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَن
और जो कोई
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَمَا
और किसकी
يَتَّبِعُ
पैरवी करते हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَدْعُونَ
पुकारते हैं
مِن
other than Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
شُرَكَآءَ ۚ
शरीकों को
إِن
नहीं
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी करते
إِلَّا
मगर
ٱلظَّنَّ
गुमान की
وَإِنْ
और नहीं
هُمْ
वो
إِلَّا
मगर
يَخْرُصُونَ
वो क़यास आराईयाँ करते हैं
जान रखो! जो कोई भी आकाशों में है और जो कोई धरती में है, अल्लाह ही का है। जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरे साझीदारों को पुकारते है, वे आखिर किसका अनुसरण करते है? वे तो केवल अटकल पर चलते है और वे निरे अटकले दौड़ाते है
तफ़्सीर:
सुन लो! जो कोई आकाशों में है और जो कोई धरती में है, सब का मालिक एकमात्र अल्लाह है। और ये बहुदेववादी लोग जो अल्लाह को छोड़कर दूसरे साझीदारों की पूजा करते हैं, वे किस चीज़ का अनुसरण कर रहे हैं?! वास्तव में, वे केवल संदेह का पालन करते हैं, तथा अपने साझीदारों की अल्लाह की ओर निसबत करनें में मात्र झूठ बोल रहे हैं। अल्लाह उनकी बातों से सर्वोच्च एवं महान है।
आयत 67
هُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ لِتَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَٱلنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَسْمَعُونَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात को
لِتَسْكُنُوا۟
ताकि तुम सुकून हासिल करो
فِيهِ
उसमें
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
مُبْصِرًا ۚ
रोशन/दिखाने वाला
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَسْمَعُونَ
जो सुनते हों
वही है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें चैन पाओ और दिन को प्रकाशमान बनाया (ताकि तुम उसमें दौड़-धूप कर सको); निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो सुनते है
तफ़्सीर:
वही अकेला है, जिसने (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए रात बनाई, ताकि तुम उसमें हरकत (चलने-फिरने) और थकान से आराम पा सको और दिन को प्रकाशमान बनाया, ताकि उसमें जीवनयापन के लिए लाभदायक वस्तुओं की तलाश में दौड़-धूप कर सको। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए स्पष्ट निशानियाँ हैं, जो मानने और स्वीकार करने के उद्देश्य से सुनते हैं।
आयत 68
قَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدًۭا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ۖ لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ إِنْ عِندَكُم مِّن سُلْطَـٰنٍۭ بِهَـٰذَآ ۚ أَتَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱتَّخَذَ
बना ली
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَدًۭا ۗ
औलाद
سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ
पाक है वो
هُوَ
वो
ٱلْغَنِىُّ ۖ
बहुत बेनियाज़ है
لَهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
إِنْ
नहीं
عِندَكُم
तुम्हारे पास
مِّن
any
سُلْطَـٰنٍۭ
कोई दलील
بِهَـٰذَآ ۚ
इसकी
أَتَقُولُونَ
क्या तुम कहते हो
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
वे कहते है, "अल्लाह औलाद रखता है।" महान और उच्च है वह! वह निरपेक्ष है, आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है। तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं। क्या तुम अल्लाह से जोड़कर वह बाते कहते हो, जिसका तुम्हे ज्ञान नही?
तफ़्सीर:
बहुदेववादियों के एक समूह ने कहा : अल्लाह ने फ़रिश्तों को अपनी पुत्रियाँ बनाया है! अल्लाह उनके इस बात से पवित्र है। वह पवित्र अल्लाह अपनी सभी सृष्टियों से बेनियाज़ है। जो कुछ अकाशों में है और जो कुछ धरती में है, सबका मालिक वही है। तुम्हारे पास (ऐ बहुदेववादियो!) तुम्हारे इस कथन का कोई प्रमाण नहीं है। क्या तुम बिना किसी प्रमाण के अल्लाह पर एक गंभीर बात कहते हो - कि तुम उसकी ओर संतान की निसबत करते हो - जिसकी सच्चाई तुम नहीं जानते?!
आयत 69
قُلْ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَفْتَرُونَ
गढ़ते हैं
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
لَا
they will not succeed
يُفْلِحُونَ
नहीं वो फ़लाह पाऐंगे
कह दो, "जो लोग अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़ते है, वे सफल नहीं होते।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : निःसंदेह जो लोग अल्लाह की ओर संतान की निसबत करके उसपर झूठ गढ़ते हैं, वे अपने उद्देश्य में कामयाब नहीं होंगे और न उस चीज़ से मुक्ति पा सकेंगे, जिससे वे डर रहे हैं।
आयत 70
مَتَـٰعٌۭ فِى ٱلدُّنْيَا ثُمَّ إِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ نُذِيقُهُمُ ٱلْعَذَابَ ٱلشَّدِيدَ بِمَا كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ
مَتَـٰعٌۭ
फ़ायदा उठाना है
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
ثُمَّ
फिर
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे ही
مَرْجِعُهُمْ
लौटना है उनका
ثُمَّ
फिर
نُذِيقُهُمُ
हम चखाऐंगे उन्हें
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
ٱلشَّدِيدَ
सख़्त/शदीद
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْفُرُونَ
वो कुफ़्र करते
यह तो सांसारिक सुख है। फिर हमारी ओर ही उन्हें लौटना है, फिर जो इनकार वे करते रहे होगे उसके बदले में हम उन्हें कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
तफ़्सीर:
अतः वे संसार की सुख-सामग्रियों और नेमतों का जो आनंद ले रहे हैं, उससे धोखा न खाएँ। क्योंकि यह एक क्षणभंगुर थोड़ा-सा सुख है। फिर उन्हें क़ियामत के दिन हमारे ही पास लौटना है। फिर हम उन्हें उनके अल्लाह का इनकार करने और उसके रसूल को झुठलाने के कारण कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह के दोस्तों (औलिया) के मुकाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चे ईमान और तक़वे वालों को दुनिया या आखिरत में डरने की ज़रूरत नहीं।
आयत 71
۞ وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ نُوحٍ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦ يَـٰقَوْمِ إِن كَانَ كَبُرَ عَلَيْكُم مَّقَامِى وَتَذْكِيرِى بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ فَعَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلْتُ فَأَجْمِعُوٓا۟ أَمْرَكُمْ وَشُرَكَآءَكُمْ ثُمَّ لَا يَكُنْ أَمْرُكُمْ عَلَيْكُمْ غُمَّةًۭ ثُمَّ ٱقْضُوٓا۟ إِلَىَّ وَلَا تُنظِرُونِ
۞ وَٱتْلُ
और पढ़िए
عَلَيْهِمْ
उन पर
نَبَأَ
खबर
نُوحٍ
नूह की
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम से
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِن
अगर
كَانَ
है
كَبُرَ
भारी
عَلَيْكُم
तुम पर
مَّقَامِى
खड़ा होना मेरा
وَتَذْكِيرِى
और नसीहत करना मेरा
بِـَٔايَـٰتِ
the Signs of Allah
ٱللَّهِ
साथ अल्लाह की आयात के
فَعَلَى
then on
ٱللَّهِ
तो अल्लाह ही पर
تَوَكَّلْتُ
तवक्कल किया मैंने
فَأَجْمِعُوٓا۟
तो पुख़्ता कर लो तुम
أَمْرَكُمْ
मामला अपना
وَشُرَكَآءَكُمْ
और शरीक तुम्हारे (भी)
ثُمَّ
फिर
لَا
let not be
يَكُنْ
ना हो
أَمْرُكُمْ
मामला तुम्हारा
عَلَيْكُمْ
तुम पर
غُمَّةًۭ
पोशीदा/मख़्फी
ثُمَّ
फिर
ٱقْضُوٓا۟
फ़ैसला करो
إِلَىَّ
साथ मेरे
وَلَا
और ना
تُنظِرُونِ
तुम मोहलत दो मुझे
उन्हें नूह का वृत्तान्त सुनाओ। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मेरा खड़ा होना और अल्लाह की आयतों के द्वारा नसीहत करना तुम्हें भारी हो गया है तो मेरा भरोसा अल्लाह पर है। तु अपना मामला ठहरा लो और अपने ठहराए हुए साझीदारों को भी साथ ले लो, फिर तुम्हारा मामला तुम पर कुछ संदिग्ध न रहे; फिर मेरे साथ जो कुछ करना है, कर डालों और मुझे मुहलत न दो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों (बहुदेववादियों) को नूह अलैहिस्सलाम का वृत्तांत सुनाएँ, जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मेरा तुम्हारे बीच खड़ा होना तुमपर भारी लगता है तथा मेरा अल्लाह की आयतों द्वारा उपदेश देना और नसीहत करना तुम्हारे लिए कष्ट का कारण बन गया है, और तुमने मेरी हत्या का संकल्प कर लिया है, तो मैंने तुम्हारी साजिश को विफल करने में केवल अल्लाह पर भरोसा किया है। अतः तुम अपना मामला सुनिश्चित कर लो और मुझे मारने का पक्का इरादा कर लो, तथा मदद के लिए अपने देवी-देवताओं को भी बुला लो। फिर अपनी साजिश को एक अस्पष्ट रहस्य न रखो और फिर मुझे मारने की योजना बनाने के बाद जो तुम्हारे दिल में है, उसे कर डालो और मुझे एक क्षण के लिए भी मोहलत न दो।
आयत 72
فَإِن تَوَلَّيْتُمْ فَمَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ ۖ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّيْتُمْ
मुँह फेर लो तुम
فَمَا
तो नहीं
سَأَلْتُكُم
माँगा मैंने तुमसे
مِّنْ
any
أَجْرٍ ۖ
कोई अजर
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَى
on
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह पर
وَأُمِرْتُ
और मैं हुक्म दिया गया हूँ
أَنْ
कि
أَكُونَ
मैं हो जाऊँ
مِنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदारों में से
फिर यदि तुम मुँह फेरोगे तो मैंने तुमसे कोई बदला नहीं माँगा। मेरा बदला (पारिश्रामिक) बस अल्लाह के ज़िम्मे है, और आदेश मुझे मुस्लिम (आज्ञाकारी) होने का हुआ है
तफ़्सीर:
यदि तुमने मेरे (अल्लाह के धर्म की ओर) बुलावे से मुँह फेर लिया, तो तुम जानते हो कि मैंने तुम्हें अपने पालनहार का संदेश पहुँचाने पर तुमसे कोई बदला नहीं माँगा है। तुम लोग मुझपर ईमान लाओ या कुफ़्र करो, मेरा सवाब (बदला) अल्लाह के ज़िम्मे है। अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है कि मैं उन लोगों में से हो जाऊँ, जो आज्ञाकारित और सत्कर्म के साथ उसके अधीन रहने वाले हैं।
आयत 73
فَكَذَّبُوهُ فَنَجَّيْنَـٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ وَجَعَلْنَـٰهُمْ خَلَـٰٓئِفَ وَأَغْرَقْنَا ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُنذَرِينَ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठलाया उसे
فَنَجَّيْنَـٰهُ
पस निजात दी हमने उसे
وَمَن
और उनको जो
مَّعَهُۥ
उसके साथ थे
فِى
in
ٱلْفُلْكِ
कश्ती में
وَجَعَلْنَـٰهُمْ
और बनाया हमने उन्हें
خَلَـٰٓئِفَ
जानशीन
وَأَغْرَقْنَا
और ग़र्क़ कर दिया हमने
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا ۖ
हमारी आयात को
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अन्जाम
ٱلْمُنذَرِينَ
डराए जाने वालों का
किन्तु उन्होंने झूठला दिया, तो हमने उसे और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में थे, बचा लिया और उन्हें उतराधिकारी बनाया, और उन लोगो को डूबो दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था। अतः देख लो, जिन्हें सचेत किया गया था उनका क्या परिणाम हुआ!
तफ़्सीर:
फिर भी उनकी क़ौम ने उन्हें झुठलाया और उनको सच्चा नहीं माना। अतः हमने उन्हें और उनके साथ नाव में सवार मोमिनों को बचा लिया और उन्हें उनसे पहले के लोगों का उत्तराधिकारी बना दिया। तथा जिन लोगों ने उनकी लाई हुई निशानियों और प्रमाणों को झुठलाया था, हमने उन्हें तूफ़ान (बाढ़) के द्वारा नष्ट कर दिया। अतः (ऐ रसूल!) आप सोचें कि जिन लोगों को नूह अलैहिस्सलाम ने सचेत किया था, पर वे ईमान नहीं लाए, उनका अंतिम परिणाम क्या हुआ?
आयत 74
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنۢ بَعْدِهِۦ رُسُلًا إِلَىٰ قَوْمِهِمْ فَجَآءُوهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَمَا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوا۟ بِمَا كَذَّبُوا۟ بِهِۦ مِن قَبْلُ ۚ كَذَٰلِكَ نَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلْمُعْتَدِينَ
ثُمَّ
फिर
بَعَثْنَا
भेजे हमने
مِنۢ
after him
بَعْدِهِۦ
बाद इसके
رُسُلًا
कई रसूल
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِمْ
तरफ़ उनकी क़ौम के
فَجَآءُوهُم
तो वो आए उनके पास
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَمَا
तो ना
كَانُوا۟
थे वो
لِيُؤْمِنُوا۟
कि वो ईमान लाते
بِمَا
बवजह उसके जो
كَذَّبُوا۟
वो झुठला चुके थे
بِهِۦ
उसे
مِن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَطْبَعُ
हम मोहर लगा देते हैं
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِ
दिलों पर
ٱلْمُعْتَدِينَ
हद से तजावुज़ करने वालों के
फिर उसके बाद कितने ही रसूल हमने उनकी क़ौम की ओर भेजे और वे उनके पास स्पष्ट निशानियां लेकर आए, किन्तु वे ऐसे न थे कि जिसको पहले झुठला चुके हॊं, उसे मानते। इसी तरह अतिक्रमणकारियों कॆ दिलों पर हम मुहर लगा देते हैं
तफ़्सीर:
फिर कुछ समय के बाद, हमने नूह अलैहिस्सलाम के पश्चात् बहुत-से रसूल उनकी क़ौमों की ओर भेजे। तो वे रसूल अपने समुदायों के पास निशानियों और प्रमाणों के साथ आए। परंतु रसूलों को झुठलाने के उनके पिछले आग्रह के कारण उनमें ईमान लाने की कोई इच्छा नहीं थी। अतः अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी। जिस प्रकार हमने पिछले रसूलों के अनुयायियों के दिलों पर मुहर लगा दी थी, उसी प्रकार हम हर समय और जगह में उन काफ़िरों के दिलों पर मुहर लगा देते हैं, जो कुफ़्र के साथ अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं।
आयत 75
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنۢ بَعْدِهِم مُّوسَىٰ وَهَـٰرُونَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ بِـَٔايَـٰتِنَا فَٱسْتَكْبَرُوا۟ وَكَانُوا۟ قَوْمًۭا مُّجْرِمِينَ
ثُمَّ
फिर
بَعَثْنَا
भेजा हमने
مِنۢ
after them
بَعْدِهِم
बाद उनके
مُّوسَىٰ
मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून को
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَمَلَإِي۟هِۦ
और उसके सरदारों के
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ अपनी आयात के
فَٱسْتَكْبَرُوا۟
तो उन्होंने तकब्बुर किया
وَكَانُوا۟
और थे वो
قَوْمًۭا
लोग
مُّجْرِمِينَ
मुजरिम
फिर उनके बाद हमने मूसा और हारून को अपनी आयतों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा। किन्तु उन्होंने घमंड किया, वे थे ही अपराधी लोग
तफ़्सीर:
फिर कुछ समय के बाद, हमने इन रसूलों के पश्चात मूसा और उनके भाई हारून अलैहिमस्सलाम को मिस्र के राजा फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सरदारों की ओर भेजा। हमने उन दोनों को उनकी सत्यता को दर्शाने वाली निशानियों के साथ भेजा था। परंतु उन्होंने घमंड के कारण उन दोनों के लाए हुए धर्म को मानने से इनकार कर दिया। दरअसल, वे अल्लाह के साथ कुफ़्र करने और उसके रसूलों को झुठलाने के कारण अपराधी लोग थे।
आयत 76
فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوٓا۟ إِنَّ هَـٰذَا لَسِحْرٌۭ مُّبِينٌۭ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُمُ
आया उनके पास
ٱلْحَقُّ
हक़
مِنْ
from Us
عِندِنَا
हमारी तरफ़ से
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّ
यक़ीनन
هَـٰذَا
ये
لَسِحْرٌۭ
अलबत्ता जादू है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
अतः जब हमारी ओर से सत्य उनके सामने आया तो वे कहने लगे, "यह तो खुला जादू है।"
तफ़्सीर:
फिर जब फिरऔन और उसकी क़ौम के सरदारों के पास वह धर्म आ गया, जिसे मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम लेकर आए थे, तो उन लोगों ने मूसा अलैहिस्सलाम के लाए हुए धर्म की सत्यता को दर्शाने वाली निशानियों के बारे में कहा : निःसंदेह यह तो खुला जादू है, यह सत्य नहीं है।
आयत 77
قَالَ مُوسَىٰٓ أَتَقُولُونَ لِلْحَقِّ لَمَّا جَآءَكُمْ ۖ أَسِحْرٌ هَـٰذَا وَلَا يُفْلِحُ ٱلسَّـٰحِرُونَ
قَالَ
कहा
مُوسَىٰٓ
मूसा ने
أَتَقُولُونَ
क्या तुम कहते हो
لِلْحَقِّ
हक़ को (जादू)
لَمَّا
जब
جَآءَكُمْ ۖ
वो आ गया तुम्हारे पास
أَسِحْرٌ
क्या जादू है
هَـٰذَا
ये
وَلَا
हालाँकि नहीं
يُفْلِحُ
फ़लाह पाते
ٱلسَّـٰحِرُونَ
साहिर/जादूगर
मूसा ने कहा, "क्या तुम सत्य के विषय में ऐसा कहते हो, जबकि यह तुम्हारे सामने आ गया है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो सफल नहीं हुआ करते।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने उनकी निंदा करते हुए कहा : क्या तुम सत्य के बारे में, जबकि वह तुम्हारे पास आ गया है, ऐसा कहते हो कि वह जादू है?! कदापि नहीं, वह जादू नहीं है। निश्चय मैं जानता हूँ कि जादूगर कभी सफल नहीं होता। फिर मैं इसका उपयोग कैसे कर सकता हूँ?!
आयत 78
قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا لِتَلْفِتَنَا عَمَّا وَجَدْنَا عَلَيْهِ ءَابَآءَنَا وَتَكُونَ لَكُمَا ٱلْكِبْرِيَآءُ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا نَحْنُ لَكُمَا بِمُؤْمِنِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَجِئْتَنَا
क्या आया है तू हमारे पास
لِتَلْفِتَنَا
ताकि तू फेर दे हमें
عَمَّا
उससे जो
وَجَدْنَا
पाया हमने
عَلَيْهِ
उस पर
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
وَتَكُونَ
और हो जाए
لَكُمَا
तुम दोनों के लिए
ٱلْكِبْرِيَآءُ
बड़ाई
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
जमीन में
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
لَكُمَا
तुम दोनों को
بِمُؤْمِنِينَ
मानने वाले
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस चीज़ से फेर दे जिसपर हमने अपना बाप-दादा का पाया है और धरती में तुम दोनों की बड़ाई स्थापित हो जाए? हम तो तुम्हें माननेवाले नहीं।"
तफ़्सीर:
फिरऔन की क़ौम ने मूसा अलैहिस्सलाम को यह कहते हुए उत्तर दिया : क्या तुम इस जादू के साथ हमारे पास इसलिए आए हो, ताकि हमें उस धर्म से फेर दो, जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है, तथा तुम्हें और तुम्हारे भाई को राज्य प्राप्त हो जाए? हम (ऐ मूसा और हारून!) तुम्हारे लिए इस बात को स्वीकार करने वाले नहीं हैं कि तुम दोनों हमारी तरफ़ भेजे गए रसूल (संदेष्टा) हो।
आयत 79
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ٱئْتُونِى بِكُلِّ سَـٰحِرٍ عَلِيمٍۢ
وَقَالَ
और कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
ٱئْتُونِى
लाओ मेरे पास
بِكُلِّ
हर
سَـٰحِرٍ
जादूगर को
عَلِيمٍۢ
जो माहिर हो
फ़िरऔन ने कहा, "हर कुशल जादूगर को मेरे पास लाओ।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने अपनी क़ौम से कहा : मेरे पास हर ऐसे जादूगर को लेकर आओ, जिसे जादू में महारत हासिल हो और उसमें निपुण हो।
आयत 80
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلْقُوا۟ مَآ أَنتُم مُّلْقُونَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
आ गए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
قَالَ
कहा
لَهُم
उनसे
مُّوسَىٰٓ
मूसा ने
أَلْقُوا۟
तुम सब डालो
مَآ
जो
أَنتُم
तुम
مُّلْقُونَ
डालने वाले हो
फिर जब जादूगर आ गए तो मूसा ने उनसे कहा, "जो कुछ तुम डालते हो, डालो।"
तफ़्सीर:
जब वे फ़िरऔन के पास जादूगरों को ले आए, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनपर अपनी जीत के बारे में आश्वस्त होकर उनसे कहा : (ऐ जादूगरो!) तुम्हें जो कुछ डालना है, डालो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम और मूसा-फिरऔन के मुकाबले का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की दावत में मुखालिफत के बावजूद डटे रहना नबियों की सुन्नत है।
आयत 81
فَلَمَّآ أَلْقَوْا۟ قَالَ مُوسَىٰ مَا جِئْتُم بِهِ ٱلسِّحْرُ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ سَيُبْطِلُهُۥٓ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُصْلِحُ عَمَلَ ٱلْمُفْسِدِينَ
فَلَمَّآ
तो जब
أَلْقَوْا۟
उन्होंने डाला
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
مَا
वो जो
جِئْتُم
लाए हो तुम
بِهِ
जिसको
ٱلسِّحْرُ ۖ
जादू है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَيُبْطِلُهُۥٓ ۖ
अनक़रीब वो बातिल कर देगा उसे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُصْلِحُ
नहीं वो संवारता
عَمَلَ
काम
ٱلْمُفْسِدِينَ
मुफ़सिदों का
फिर जब उन्होंने डाला तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ लाए हो, जादू है। अल्लाह अभी उसे मटियामेट किए देता है। निस्संदेह अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवालों के कर्म को फलीभूत नहीं होने देता
तफ़्सीर:
फिर जब उन्होंने अपने पास मौजूद जादू को फेंक दिया, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : जो कुछ तुमने दिखाया है, वह जादू है। निःसंदेह अल्लाह, जो कुछ तुमने किया है, उसे इस तरह विनष्ट कर देगा कि उसका कोई निशान नहीं रहेगा। वास्तव में, तुम लोग अपने जादू द्वारा धरती में बिगाड़ पैदा करने वाले हो, और अल्लाह बिगाड़ पैदा करने वाले के कार्य को नहीं सुधारता है।
आयत 82
وَيُحِقُّ ٱللَّهُ ٱلْحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦ وَلَوْ كَرِهَ ٱلْمُجْرِمُونَ
وَيُحِقُّ
और सच्चा साबित कर दिखाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْحَقَّ
हक़ को
بِكَلِمَـٰتِهِۦ
अपने कलिमात से
وَلَوْ
और अगरचे
كَرِهَ
नापसंद करें
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
"अल्लाह अपने शब्दों से सत्य को सत्य कर दिखाता है, चाहे अपराधी नापसन्द ही करें।"
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने पूर्वनियति शब्दों के साथ तथा अपने शरई शब्दों में विद्यमान प्रमाणों एवं तर्कों के साथ सत्य को स्थापित और सशक्त कर देता है, भले ही फिरऔनियों के अपराधी काफिरों को बुरा लगे।
आयत 83
فَمَآ ءَامَنَ لِمُوسَىٰٓ إِلَّا ذُرِّيَّةٌۭ مِّن قَوْمِهِۦ عَلَىٰ خَوْفٍۢ مِّن فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِمْ أَن يَفْتِنَهُمْ ۚ وَإِنَّ فِرْعَوْنَ لَعَالٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلْمُسْرِفِينَ
فَمَآ
तो ना
ءَامَنَ
बात मानी
لِمُوسَىٰٓ
मूसा की
إِلَّا
मगर
ذُرِّيَّةٌۭ
चंद नौजवानों ने
مِّن
among
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
عَلَىٰ
for
خَوْفٍۢ
ख़ौफ़ की बिना पर
مِّن
of
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन से
وَمَلَإِي۟هِمْ
और उसके सरदारों से
أَن
कि
يَفْتِنَهُمْ ۚ
वो फ़ितने में डाल देगा उन्हें
وَإِنَّ
और बेशक
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन
لَعَالٍۢ
अलबत्ता सरकश था
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَمِنَ
(was) of
ٱلْمُسْرِفِينَ
यक़ीनन हद से बढ़ जाने वालों में से था
फिर मूसा की बात उसकी क़ौम की संतति में से बस कुछ ही लोगों ने मानी; फ़िरऔन और उनके सरदारों के भय से कि कहीं उन्हें किसी फ़ितने में न डाल दें। फ़िरऔन था भी धरती में बहुत सिर उठाए हुए, औऱ निश्चय ही वह हद से आगे बढ़ गया था
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम ने मुँह फेरने की ठान रखी थी। चुनाँचे मूसा अलैहिस्सलाम पर (उनके प्रत्यक्ष निशानियों और स्पष्ट प्रमाणों को लाने के बाद भी) उनकी क़ौम बनू इसराईल के केवल कुछ युवाओं ने विश्वास किया, जबकि वे फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सरदारों से डरे हुए थे कि उनका मामला अगर प्रकाश में आ गया, तो वे उन्हें यातना में डालकर उन्हें उनके ईमान से विचलित न कर दें। दरअसल, फिरऔन अभिमानी तथा मिस्र और उसके लोगों पर हावी व मुसल्लत था। तथा निःसंदेह वह कुफ़्र, बनू इसराईल की हत्या करने और उन्हें यातना देने में हद से आगे बढ़ा हुआ था।
आयत 84
وَقَالَ مُوسَىٰ يَـٰقَوْمِ إِن كُنتُمْ ءَامَنتُم بِٱللَّهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُوٓا۟ إِن كُنتُم مُّسْلِمِينَ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
ءَامَنتُم
ईमान लाए तुम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
فَعَلَيْهِ
तो उसी पर
تَوَكَّلُوٓا۟
तुम तवक्कल करो
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार
मूसा ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो तो उसपर भरोसा करो, यदि तुम आज्ञाकारी हो।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि तुम अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हो, तो केवल अल्लाह ही पर भरोसा करो, अगर तुम आज्ञाकारी हो। क्योंकि अल्लाह पर भरोसा तुमसे बुराई को दूर कर देगा और तुम्हारे लिए भलाई लाएगा।
आयत 85
فَقَالُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلْنَا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةًۭ لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
عَلَى
Upon
ٱللَّهِ
अल्लाह ही पर
تَوَكَّلْنَا
तवक्कल किया हमने
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَا
(Do) not
تَجْعَلْنَا
ना तू बनाना हमें
فِتْنَةًۭ
फ़ितना
لِّلْقَوْمِ
उन लोगों के लिए
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
इसपर वे बोले, "हमने अल्लाह पर भरोसा किया। ऐ हमारे रब! तू हमें अत्याचारी लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल
तफ़्सीर:
तो उन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम को जवाब देते हुए कहा : हमने केवल अल्लाह पर भरोसा किया है। ऐ हमारे पालनहार! तू हमपर अत्याचारियों को प्रभुत्व प्रदान न कर कि वे यातना, हत्या और प्रलोभन द्वारा हमें हमारे धर्म से भटका दें।
आयत 86
وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَنَجِّنَا
और निजात दे हमें
بِرَحْمَتِكَ
साथ अपनी रहमत के
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
"और अपनी दयालुता से हमें इनकार करनेवालों से छुटकारा दिया।"
तफ़्सीर:
और (ऐ हमारे पालनहार!) अपनी दया से हमें फ़िरऔन की काफ़िर क़ौम के हाथों से मुक्ति प्रदान कर, क्योंकि उन्होंने हमें गुलाम बनाकर रखा है और हमें यातना और हत्या द्वारा प्रताड़ित किया है।
आयत 87
وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰ وَأَخِيهِ أَن تَبَوَّءَا لِقَوْمِكُمَا بِمِصْرَ بُيُوتًۭا وَٱجْعَلُوا۟ بُيُوتَكُمْ قِبْلَةًۭ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۗ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰ
तरफ़ मूसा
وَأَخِيهِ
और उसके भाई के
أَن
कि
تَبَوَّءَا
तुम दोनों मुतय्यन करो
لِقَوْمِكُمَا
अपनी क़ौम के लिए
بِمِصْرَ
मिस्र में
بُيُوتًۭا
कुछ घर
وَٱجْعَلُوا۟
और बना लो
بُيُوتَكُمْ
अपने घरों को
قِبْلَةًۭ
क़िबला/मरकज़
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ ۗ
नमाज़
وَبَشِّرِ
और ख़ुशखबरी दो
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
हमने मूसा और उसके भाई की ओर प्रकाशना की कि "तुम दोनों अपने लोगों के लिए मिस्र में कुछ घर निश्चित कर लो औऱ अपने घरों को क़िबला बना लो। और नमाज़ क़ायम करो और ईमानवालों को शुभसूचना दे दो।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा और उनके भाई हारून अलैहिमस्सलाम की ओर वह़्य (प्रकाशना) भेजी कि तुम दोनों अपनी क़ौम के लिए मिस्र में एक अल्लाह की उपासना हेतु कुछ घर बनाओ और अपने घरों का रुख क़िबला (बैतुल मक़्दिस) की दिशा में रखो तथा संपूर्ण रूप से नमाज़ अदा करो। तथा (ऐ मूसा!) आप ईमान वालों को यह प्रसन्नतापूर्ण सूचना दे दें कि अल्लाह उनकी मदद करेगा, उन्हें समर्थन देगा, उनके दुश्मनों का विनाश करेगा और उन्हें धर्ती में ख़लीफा (उत्तराधिकारी) बनाएगा।
आयत 88
وَقَالَ مُوسَىٰ رَبَّنَآ إِنَّكَ ءَاتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلَأَهُۥ زِينَةًۭ وَأَمْوَٰلًۭا فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّوا۟ عَن سَبِيلِكَ ۖ رَبَّنَا ٱطْمِسْ عَلَىٰٓ أَمْوَٰلِهِمْ وَٱشْدُدْ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا۟ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّكَ
बेशक तू
ءَاتَيْتَ
दी तूने
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन को
وَمَلَأَهُۥ
और उसके सरदारों को
زِينَةًۭ
ज़ीनत
وَأَمْوَٰلًۭا
और माल
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी में
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لِيُضِلُّوا۟
ताकि वो भटकाऐं
عَن
from
سَبِيلِكَ ۖ
तेरे रास्ते से
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱطْمِسْ
मिटा दे
عَلَىٰٓ
[on]
أَمْوَٰلِهِمْ
इनके मालों को
وَٱشْدُدْ
और सख़्ती डाल दे
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِهِمْ
इनके दिलों पर
فَلَا
तो ना
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाऐं
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَرَوُا۟
वो देख लें
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
ٱلْأَلِيمَ
दर्दनाक
मूसा ने कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को सांसारिक जीवन में शोभा-सामग्री और धन दिए है, हमारे रब, इसलिए कि वे तेरे मार्ग से भटकाएँ! हमारे रब, उनके धन नष्ट कर दे और उनके हृदय कठोर कर दे कि वे ईमान न लाएँ, ताकि वे दुखद यातना देख लें।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ हमारे पालनहार! तूने फ़िरऔन और उसकी क़ौम की अशराफिया को दुनिया की चमक-दमक और शोभा-सामग्री प्रदान की है और उन्हें इस सांसारिक जीवन में धन-संपत्ति दी है, परंतु जो कुछ तूने उन्हें दिया उसके लिए उन्होंने तेरा शुक्रिया अदा नहीं किया। बल्कि उन्होंने उनका इस्तेमाल तेरे रास्ते से लोगों को भटकाने के लिए किया। ऐ हमारे रब! उनके धन को तबाह और नष्ट कर दे और उनके हृदय को इतना कठोर बना दे कि वे उस समय तक ईमान न लाएँ जबतक कि दर्दनाक यातना को अपने सामने न देख लें, जिस समय उनके ईमान से उन्हें कोई फ़ायदा न होगा।
आयत 89
قَالَ قَدْ أُجِيبَت دَّعْوَتُكُمَا فَٱسْتَقِيمَا وَلَا تَتَّبِعَآنِّ سَبِيلَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
قَالَ
फ़रमाया
قَدْ
तहक़ीक़
أُجِيبَت
क़ुबूल कर ली गई
دَّعْوَتُكُمَا
दुआ तुम दोनों की
فَٱسْتَقِيمَا
पस तुम दोनों साबित क़दम रहो
وَلَا
और ना
تَتَّبِعَآنِّ
तुम दोनों हरगिज़ पैरवी करना
سَبِيلَ
रास्ते की
ٱلَّذِينَ
उनके जो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
कहा, "तुम दोनों की प्रार्थना स्वीकृत हो चुकी। अतः तुम दोनों जमें रहो और उन लोगों के मार्ग पर कदापि न चलना, जो जानते नहीं।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने फरमाया : मैंने (ऐ मूसा और हारून!) तुम दोनों की फ़िरऔन और उसकी क़ौम की अशराफिया के विरूद्ध दुआ को स्वीकार कर लिया। अतः तुम दोनों अपने धर्म पर जमे रहो और उससे मुँह फेरकर उन अज्ञानियों के मार्ग का अनुसरण न करो, जो सत्य के मार्ग का ज्ञान नहीं रखते।
आयत 90
۞ وَجَـٰوَزْنَا بِبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱلْبَحْرَ فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ وَجُنُودُهُۥ بَغْيًۭا وَعَدْوًا ۖ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَدْرَكَهُ ٱلْغَرَقُ قَالَ ءَامَنتُ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا ٱلَّذِىٓ ءَامَنَتْ بِهِۦ بَنُوٓا۟ إِسْرَٰٓءِيلَ وَأَنَا۠ مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
۞ وَجَـٰوَزْنَا
और पार करा दिया हमने
بِبَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
ٱلْبَحْرَ
समुन्दर
فَأَتْبَعَهُمْ
फिर पीछा किया उनका
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन
وَجُنُودُهُۥ
और उसके लश्करों ने
بَغْيًۭا
सरकशी
وَعَدْوًا ۖ
और ज़्यादती से
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَدْرَكَهُ
पा लिया उसे
ٱلْغَرَقُ
ग़र्क़ होने ने
قَالَ
वो बोला
ءَامَنتُ
मैं ईमान ले आया
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِىٓ
वो ही जो
ءَامَنَتْ
ईमान लाए
بِهِۦ
जिस पर
بَنُوٓا۟
the Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल
وَأَنَا۠
और मैं
مِنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों में से हूँ
और हमने इसराईलियों को समुद्र पार करा दिया। फिर फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने सरकशी और ज़्यादती के साथ उनका पीछा किया, यहाँ तक कि जब वह डूबने लगा तो पुकार उठा, "मैं ईमान ले आया कि उसके सिव कोई पूज्य-प्रभु नही, जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान लाई। अब मैं आज्ञाकारी हूँ।"
तफ़्सीर:
और हमने सागर को फाड़ने के बाद बनी इसराईल के लिए उसे पार करना आसान बना दिया, यहाँ तक कि उन्होंने उसे सुरक्षित रूप से पार कर लिया। फिर फ़िरऔन और उसके सैनिकों ने अत्याचार और ज़्यादती करते हुए उनका पीछा किया। यहाँ तक कि जब सागर के दोनों भाग उसपर मिल गए और वह डूबने लगा और बचने की कोई उम्मीद न रही, तो कहने लगा : मैं ईमान ले आया कि उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जिसपर बनी इसराईल ईमान लाए हैं और मैं अल्लाह के आज्ञाकारियों में से हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के आखिरी लम्हात के ईमान का रद्द होना बताया गया है। यह हमें सिखाता है कि मौत के वक्त की तौबा कबूल नहीं होती, इसलिए तौबा में देर नहीं करनी चाहिए।
आयत 91
ءَآلْـَٔـٰنَ وَقَدْ عَصَيْتَ قَبْلُ وَكُنتَ مِنَ ٱلْمُفْسِدِينَ
ءَآلْـَٔـٰنَ
क्या अब
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
عَصَيْتَ
नाफ़रमानी की तूने
قَبْلُ
इससे पहले
وَكُنتَ
और था तू
مِنَ
of
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों में से
"क्या अब? हालाँकि इससे पहले तुने अवज्ञा की और बिगाड़ पैदा करनेवालों में से था
तफ़्सीर:
क्या तू जीवन से निराश होने के बाद अब ईमान ला रहा है?! हालाँकि (ऐ फ़िरऔन!) तू अल्लाह की यातना उतरने से पहले, उसका इनकार करके और उसके रास्ते से रोककर, अल्लाह की अवज्ञा करता रहा है और तू बिगाड़ पैदा करने वालों में से था, क्योंकि तू स्वयं पथभ्रष्ट था और दूसरों को भी पथभ्रष्ट करता था।
आयत 92
فَٱلْيَوْمَ نُنَجِّيكَ بِبَدَنِكَ لِتَكُونَ لِمَنْ خَلْفَكَ ءَايَةًۭ ۚ وَإِنَّ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ عَنْ ءَايَـٰتِنَا لَغَـٰفِلُونَ
فَٱلْيَوْمَ
तो आज
نُنَجِّيكَ
हम बचा लेंगे तुझे
بِبَدَنِكَ
साथ तेरे बदन के
لِتَكُونَ
ताकि तू हो जाए
لِمَنْ
उनके लिए जो
خَلْفَكَ
तेरे बाद हों
ءَايَةًۭ ۚ
एक निशानी
وَإِنَّ
और बेशक
كَثِيرًۭا
बहुत से
مِّنَ
among
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
عَنْ
of
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात से
لَغَـٰفِلُونَ
अलबत्ता ग़ाफ़िल हैं
"अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेगें, ताकि तू अपने बादवालों के लिए एक निशानी हो जाए। निश्चय ही, बहुत-से लोग हमारी निशानियों के प्रति असावधान ही रहते है।"
तफ़्सीर:
आज हम तुझे (ऐ फिरऔन!) समुद्र से निकाल लेंगे और तुझे एक ऊँचे स्थान पर डाल देंगे, ताकि तेरे बाद आने वाले लोग तुझसे सीख ग्रहण करें। वास्तव में अधिकतर लोग हमारे तर्कों और हमारी शक्ति के प्रमाणों से अनभिज्ञ हैं, उनमें सोच-विचार नहीं करते।
आयत 93
وَلَقَدْ بَوَّأْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مُبَوَّأَ صِدْقٍۢ وَرَزَقْنَـٰهُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ فَمَا ٱخْتَلَفُوا۟ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِى بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
بَوَّأْنَا
ठिकाना दिया हमने
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
مُبَوَّأَ
ठिकाना
صِدْقٍۢ
सच्चा/उम्दा
وَرَزَقْنَـٰهُم
और रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
مِّنَ
with
ٱلطَّيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों से
فَمَا
तो नहीं
ٱخْتَلَفُوا۟
उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
جَآءَهُمُ
आ गया उनके पास
ٱلْعِلْمُ ۚ
इल्म
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
يَقْضِى
वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فِيمَا
उसमें जो
كَانُوا۟
थे वो
فِيهِ
जिसमें
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते
और हमने इसराईल की सन्तान को अच्छा, सम्मानित ठिकाना दिया औ उन्हें अच्छी आजीविका प्रदान की। फिर उन्होंने उस समय विभेद किया, जबकि ज्ञान उनके पास आ चुका था। निश्चय ही तुम्हारा रब क़ियामत के दिन उनके बीच उस चीज़ का फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे विभेद करते रहे है
तफ़्सीर:
और हमने बनी इसराईल को शाम (लेवंत) की धन्य भूमि में एक सुखद स्थान और एक मनभावन ठिकाना दिया और उन्हें हलाल व शुद्ध चीज़ों से जीविका प्रदान की। फिर उन्होंने अपने धर्म के मामले में मतभेद नहीं किया, यहाँ तक कि उनके पास क़ुरआन आ गया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उन गुणों एवं विशेषताओं की पुष्टि करने वाला है, जो उन्होंने तौरात में पढ़ा था। फिर जब उन लोगों ने इसका इनकार कर दिया, तो उनके क्षेत्रों को छीन लिया गया। निश्चय ही (ऐ रसूल!) आपका पालनहार क़ियामत के दिन उनके बीच उस चीज़ के बारे में फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे थे। फिर वह उनमें से सत्यवादी और असत्यवादी को वह बदला देगा, जिसका उन दोनों में से प्रत्येक हक़दार होगा।
आयत 94
فَإِن كُنتَ فِى شَكٍّۢ مِّمَّآ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ فَسْـَٔلِ ٱلَّذِينَ يَقْرَءُونَ ٱلْكِتَـٰبَ مِن قَبْلِكَ ۚ لَقَدْ جَآءَكَ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ
فَإِن
फिर अगर
كُنتَ
हैं आप
فِى
in
شَكٍّۢ
किसी शक में
مِّمَّآ
उसके बारे में जो
أَنزَلْنَآ
नाज़िल किया हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
فَسْـَٔلِ
तो पूछ लीजिए
ٱلَّذِينَ
उन लोगों से जो
يَقْرَءُونَ
पढ़ते हैं
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِن
before you
قَبْلِكَ ۚ
आपसे पहले
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَكَ
आ गया आपके पास
ٱلْحَقُّ
हक़
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
فَلَا
so (do) not
تَكُونَنَّ
पस हरगिज़ ना आप हों
مِنَ
among
ٱلْمُمْتَرِينَ
शक करने वालों में से
अतः यदि तुम्हें उस चीज़ के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, तो उनसे पूछ लो जो तुमसे पहले से किताब पढ़ रहे है। तुम्हारे पास तो तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका। अतः तुम कदापि सन्देह करनेवाले न हो
तफ़्सीर:
यदि (ऐ रसूल!) आप उस क़ुरआन की सच्चाई के बारे में, जो हमने आपकी ओर उतारा है, संदेह और अचरज में हैं, तो ईमान लाने वाले उन यहूदियों से पूछ लें जो तौरात पढ़ते हैं और उन ईसाइयों से पूछ लें जो इंजील पढ़ते हैं। वे आपको बताएँगे कि आपपर जो उतारा गया है, वह सत्य है; क्योंकि वे अपनी पुस्तकों में उसका विवरण पाते हैं। निःसंदेह आपके पास आपके पालनहार की ओर से वह सत्य आया है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। अतः आप कदापि संदेह करने वालों में से न हों।
आयत 95
وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ فَتَكُونَ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
وَلَا
And (do) not
تَكُونَنَّ
और हरगिज़ ना आप हों
مِنَ
of
ٱلَّذِينَ
उनमें से जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِ
(the) Signs of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
فَتَكُونَ
वरना आप हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों मे से
और न उन लोगों में सम्मिलित होना जिन्होंन अल्लाह की आयतों को झुठलाया, अन्यथा तुम घाटे में पड़कर रहोगे
तफ़्सीर:
और आप कदापि उन लोगों में से न हों, जिन्होंने अल्लाह के तर्कों एवं प्रमाणों को झुठला दिया। अन्यथा इसकी वजह से आप उन घाटा उठाने वाले लोगों में से हो जाएँगे, जिन्होंने अपने अविश्वास के कारण अपने आपको विनाश से ग्रस्त करके खुद अपना घाटा किया। यह सारी चेतावनी शक और इनकार के खतरे एवं गंभीरता को बयान करने के लिए है, अन्यथा नबी इस बात से मा'सूम (पवित्र) हैं कि उनकी ओर से इस तरह की कोई बात सामने आए।
आयत 96
إِنَّ ٱلَّذِينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
حَقَّتْ
साबित हो गई
عَلَيْهِمْ
उन पर
كَلِمَتُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब की
لَا
will not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
निस्संदेह जिन लोगों के विषय में तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही वे ईमान नहीं लाएँगे,
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों के विषय में अल्लाह का फ़ैसला सिद्ध हो चुका है कि वे कुफ़्र पर जमे रहने के कारण कुफ़्र ही पर मरेंगे, वे कभी भी ईमान नहीं लाएँगे।
आयत 97
وَلَوْ جَآءَتْهُمْ كُلُّ ءَايَةٍ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ
وَلَوْ
और अगरचे
جَآءَتْهُمْ
आ जाए उनके पास
كُلُّ
हर
ءَايَةٍ
निशानी
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَرَوُا۟
वो देख लें
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
ٱلْأَلِيمَ
दर्दनाक
जब तक के वे दुखद यातना न देख लें, चाहे प्रत्येक निशानी उनके पास आ जाए
तफ़्सीर:
यद्यपि उनके पास प्रत्येक धार्मिक अथवा ब्रह्मांडीय निशानी आ जाए। यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना अपनी आँखों से देख लें, तब वे ईमान ले आएँगे, जबकि उस समय ईमान लाना उनको लाभ नहीं देगा।
आयत 98
فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ ءَامَنَتْ فَنَفَعَهَآ إِيمَـٰنُهَآ إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّآ ءَامَنُوا۟ كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ ٱلْخِزْىِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَمَتَّعْنَـٰهُمْ إِلَىٰ حِينٍۢ
فَلَوْلَا
फिर क्यों ना
كَانَتْ
हुई
قَرْيَةٌ
कोई बस्ती
ءَامَنَتْ
जो ईमान लाई
فَنَفَعَهَآ
तो नफ़ा दिया उसे
إِيمَـٰنُهَآ
उसके ईमान ने
إِلَّا
सिवाय
قَوْمَ
क़ौमे
يُونُسَ
यूनुस के
لَمَّآ
जब
ءَامَنُوا۟
वो ईमान लाए
كَشَفْنَا
हटा दिया हमने
عَنْهُمْ
उनसे
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْخِزْىِ
रुस्वाई का
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَمَتَّعْنَـٰهُمْ
और फ़ायदा दिया हमने उन्हें
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक मुद्दत तक
फिर ऐसी कोई बस्ती क्यों न हुई कि वह ईमान लाती और उसका ईमान उसके लिए लाभप्रद सिद्ध होता? हाँ, यूनुस की क़ौम के लोग इसके लिए अपवाद है। जब वे ईमान लाए तो हमने सांसारिक जीवन में अपमानजनक यातना को उनपर से टाल दिया और उन्हें एक अवधि तक सुखोपभोग का अवसर प्रदान किया
तफ़्सीर:
ऐसा नहीं हुआ है कि जिन बस्तियों की ओर हमने अपने रसूलों को भेजा था, उनमें से कोई बस्ती यातना देखने से पहले सार्थक रूप से ईमान लाई हो, फिर यातना देखने से पहले ईमान लाने के कारण उसका ईमान उसे लाभ पहुँचाया हो, सिवाय यूनुस अलैहिस्सलाम की क़ौम के, कि जब वे सच्चा ईमान ले आए, तो हमने सांसारिक जीवन में उनके ऊपर से अपमान व तिरस्कार के अज़ाब को हटा दिया और उन्हें उनकी समय सीमा समाप्त होने तक (दुनिया की सामग्रियों से) लाभान्वित होने का अवसर प्रदान किया।
आयत 99
وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَـَٔامَنَ مَن فِى ٱلْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا ۚ أَفَأَنتَ تُكْرِهُ ٱلنَّاسَ حَتَّىٰ يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
رَبُّكَ
रब आपका
لَـَٔامَنَ
अलबत्ता ईमान ले आते
مَن
जो
فِى
(are) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में हैं
كُلُّهُمْ
सबके सब
جَمِيعًا ۚ
इकट्ठे
أَفَأَنتَ
क्या भला आप
تُكْرِهُ
मजबूर करेंगे
ٱلنَّاسَ
लोगों को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَكُونُوا۟
वो हो जाऐं
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती में जितने लोग है वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ?
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आपका पालनहार धरती में मौजूद सभी लोगों को ईमान वाला बनाना चाहता, तो सभी लोग अवश्य ईमान ले आते, परंतु अपनी हिकमत के कारण उसने ऐसा नहीं चाहा। अतः वह जिसे चाहता है, अपने न्याय से गुमराह कर देता है और जिसे चाहता है, अपनी कृपा से मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसलिए आप लोगों को ईमान लाने पर मजबूर नहीं कर सकते। क्योंकि उन्हें ईमान लाने की तौफ़ीक़ देना केवल अल्लाह के हाथ में है।
आयत 100
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تُؤْمِنَ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَجْعَلُ ٱلرِّجْسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِنَفْسٍ
किसी नफ़्स के लिए
أَن
कि
تُؤْمِنَ
वो ईमान लाए
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न से
وَيَجْعَلُ
और वो डाल देता है
ٱلرِّجْسَ
गंदगी को
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल रखते
हालाँकि किसी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं कि अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई क्यक्ति ईमान लाए। वह तो उन लोगों पर गन्दगी डाल देता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
तफ़्सीर:
किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना अपने आप ईमान ले आए। अतः अल्लाह की इच्छा के बिना ईमान नहीं पाया जा सकता। इसलिए आप उनपर अफ़सोस न करें। अल्लाह उन लोगों पर यातना और अपमान डाल देता है, जो उसके प्रमाणों व तर्कों तथा उसके आदेशों और निषेधों को नहीं समझते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूनुस अलैहिस्सलाम की कौम की मिसाल दी गई है, जिन्होंने अज़ाब की अलामत देखकर तौबा कर ली। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्ची तौबा और सुधार कौम को तबाही से बचा सकता है।
आयत 101
قُلِ ٱنظُرُوا۟ مَاذَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَا تُغْنِى ٱلْـَٔايَـٰتُ وَٱلنُّذُرُ عَن قَوْمٍۢ لَّا يُؤْمِنُونَ
قُلِ
कह दीजिए
ٱنظُرُوا۟
देखो
مَاذَا
क्या कुछ है
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
تُغْنِى
फ़ायदा देतीं
ٱلْـَٔايَـٰتُ
आयात
وَٱلنُّذُرُ
और डरावे
عَن
to
قَوْمٍۢ
उन लोगों को जो
لَّا
(who do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
कहो, "देख लो, आकाशों और धरती में क्या कुछ है!" किन्तु निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के कुछ काम नहीं आती, जो ईमान न लाना चाहें
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन मुश्रिकों से, जो आपसे निशानियों का प्रश्न करते हैं, कह दें : विचार करो कि आकाशों और धरती में अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसकी शक्ति को इंगित करने वाली क्या-क्या निशानियाँ हैं। जो लोग, अविश्वास पर अपने हठ के कारण, ईमान लाने को तैयार नहीं हैं, उन्हें निशानियों, तर्कों और संदेशवाहकों का उतारना कोई लाभ नहीं देता।
आयत 102
فَهَلْ يَنتَظِرُونَ إِلَّا مِثْلَ أَيَّامِ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِهِمْ ۚ قُلْ فَٱنتَظِرُوٓا۟ إِنِّى مَعَكُم مِّنَ ٱلْمُنتَظِرِينَ
فَهَلْ
तो नहीं
يَنتَظِرُونَ
वो इन्तिज़ार कर रहे
إِلَّا
मगर
مِثْلَ
मानिन्द
أَيَّامِ
दिनों के
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
خَلَوْا۟
गुज़र चुके हैं
مِن
before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले
قُلْ
कह दीजिए
فَٱنتَظِرُوٓا۟
पस इन्तिज़ार करो
إِنِّى
बेशक मैं
مَعَكُم
साथ तुम्हारे
مِّنَ
among
ٱلْمُنتَظِرِينَ
इन्तिज़ार करने वालों में से हूँ
अतः वे तो उस तरह के दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिस तरह के दिन वे लोग देख चुके है जो उनसे पहले गुज़रे है। कह दो, "अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
तफ़्सीर:
तो क्या ये झुठलाने वाले लोग उसी तरह की घटनाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिनसे अल्लाह ने इनसे पहले के झुठलाने वाले समुदायों को ग्रस्त किया था?! आप (ऐ रसूल!) उनसे कह दीजिए : तुम अल्लाह की यातना की प्रतीक्षा करो, मैं (भी) तुम्हारे साथ अपने पालनहार के वादे की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
आयत 103
ثُمَّ نُنَجِّى رُسُلَنَا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۚ كَذَٰلِكَ حَقًّا عَلَيْنَا نُنجِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
ثُمَّ
फिर
نُنَجِّى
हम निजात देते हैं
رُسُلَنَا
अपने रसूलों को
وَٱلَّذِينَ
और उनको जो
ءَامَنُوا۟ ۚ
ईमान लाए
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
حَقًّا
हक़ है
عَلَيْنَا
हम पर
نُنجِ
कि हम निजात दें
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
फिर हम अपने रसूलों और उन लोगों को बचा लेते रहे हैं, जो ईमान ले आए। ऐसी ही हमारी रीति है, हमपर यह हक़ है कि ईमानवालों को बचा लें
तफ़्सीर:
फिर हम उनपर दंड उतार देते हैं और अपने रसूलों को बचा लेते हैं, तथा उनके साथ ईमान लाने वालों को भी बचा लेते हैं। इसलिए वे उस यातना से पीड़ित नहीं होते, जिससे उनकी क़ौम ग्रस्त होती है। जिस प्रकार हमने उन रसूलों और उनके साथ मोमिनों को बचा लिया, ऐसे ही हम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को और आपके साथ मोमिनों को बचा लेंगे। यह बचाना हमपर एक सिद्ध अधिकार है।
आयत 104
قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِن كُنتُمْ فِى شَكٍّۢ مِّن دِينِى فَلَآ أَعْبُدُ ٱلَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَـٰكِنْ أَعْبُدُ ٱللَّهَ ٱلَّذِى يَتَوَفَّىٰكُمْ ۖ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَيُّهَا
O mankind
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
فِى
in
شَكٍّۢ
किसी शक में
مِّن
of
دِينِى
मेरे दीन से
فَلَآ
पस नहीं
أَعْبُدُ
मैं इबादत करता
ٱلَّذِينَ
जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَـٰكِنْ
और लेकिन
أَعْبُدُ
मैं इबादत करता हूँ
ٱللَّهَ
अल्लाह की
ٱلَّذِى
वो जो
يَتَوَفَّىٰكُمْ ۖ
फ़ौत करता है तुम्हें
وَأُمِرْتُ
और हुक्म दिया गया हूँ मैं
أَنْ
कि
أَكُونَ
मैं हो जाऊँ
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में से
कह दो, "ऐ लोगों! यदि तुम मेरे धर्म के विषय में किसी सन्देह में हो तो मैं तो उनकी बन्दगी नहीं करता जिनकी तुम अल्लाह से हटकर बन्दगी करते हो, बल्कि मैं उस अल्लाह की बन्दगी करता हूँ जो तुम्हें मृत्यु देता है। और मुझे आदेश है कि मैं ईमानवालों में से होऊँ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : ऐ लोगो! यदि तुम मेरे उस धर्म के विषय में संदेह में हो, जिसकी ओर मैं तुम्हें आमंत्रित करता हूँ और वह तौहीद (एकेश्वरवाद) का धर्म है, तो मैं तुम्हारे धर्म के भ्रष्ट होने के बारे में निश्चित हूँ, इसलिए मैं उसका अनुसरण नहीं करता। तथा मैं उनकी पूजा नहीं करता, जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर पूजा करते हो। परंतु मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ, जो तुम्हें मौत देता है और उसने मुझे आदेश दिया है कि मैं उसके धर्म के प्रति निष्ठावान मोमिनों (विश्वासियों) में से रहूँ।
आयत 105
وَأَنْ أَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًۭا وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
وَأَنْ
और ये कि
أَقِمْ
क़ायम रखिए
وَجْهَكَ
चेहरा अपना
لِلدِّينِ
दीन के लिए
حَنِيفًۭا
यकसू होकर
وَلَا
and (do) not
تَكُونَنَّ
और हरगिज़ ना आप हों
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों में से
और यह कि हर ओर से एकाग्र होकर अपना रुख़ इस धर्म की ओर कर लो और मुशरिक़ों में कदापि सम्मिलित न हो,
तफ़्सीर:
तथा उसने मुझे यह भी आदेश दिया है कि मैं सत्य धर्म पर स्थापित रहूँ और सभी धर्मों से विमुख होकर उसी पर स्थिर रहूँ, और मुझे इस बात से मना किया है कि मैं उसके साथ शिर्क करने वालों में से होऊँ।
आयत 106
وَلَا تَدْعُ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَ ۖ فَإِن فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذًۭا مِّنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَا
और ना
تَدْعُ
आप पुकारिए
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उसे जो
لَا
(will) not
يَنفَعُكَ
ना वो फ़ायदा दे सकता है आपको
وَلَا
और ना
يَضُرُّكَ ۖ
वो नुक़सान दे सकता है आपको
فَإِن
फिर अगर
فَعَلْتَ
किया आपने (ऐसा)
فَإِنَّكَ
तो बेशक आप
إِذًۭا
उस वक़्त
مِّنَ
of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों में से होंगे
और अल्लाह से हटकर उसे न पुकारो जो न तुम्हें लाभ पहुँचाए और न तुम्हें हानि पहुँचा सके और न तुम्हारा बुरा कर सके, क्योंकि यदि तुमने ऐसा किया तो उस समय तुम अत्याचारी होगे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अल्लाह के सिवा उन मूर्तियों और प्रतिमाओं इत्यादि को न पुकारें, जो न किसी लाभ के मालिक हैं कि आपको लाभ पहुँचा सकें और न किसी हानि के मालिक हैं कि आपको हानि पहुँचा सकें। क्योंकि यदि आपने उनकी पूजा की, तो फिर आप अल्लाह के अधिकार और स्वयं के अधिकार पर अतिक्रमण करने वाले अत्याचारियों में से हो जाएँगे।
आयत 107
وَإِن يَمْسَسْكَ ٱللَّهُ بِضُرٍّۢ فَلَا كَاشِفَ لَهُۥٓ إِلَّا هُوَ ۖ وَإِن يُرِدْكَ بِخَيْرٍۢ فَلَا رَآدَّ لِفَضْلِهِۦ ۚ يُصِيبُ بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِن
और अगर
يَمْسَسْكَ
पहुँचाए आपको
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِضُرٍّۢ
कोई तकलीफ़
فَلَا
तो नहीं
كَاشِفَ
कोई हटाने वाला
لَهُۥٓ
उसे
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
وَإِن
और अगर
يُرِدْكَ
वो इरादा करे आपके साथ
بِخَيْرٍۢ
किसी भलाई का
فَلَا
तो नहीं
رَآدَّ
कोई फेरने वाला
لِفَضْلِهِۦ ۚ
उसके फ़ज़ल को
يُصِيبُ
वो पहुँचाता है
بِهِۦ
उसे
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ ۚ
अपने बन्दों में से
وَهُوَ
और वो
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
यदि अल्लाह तुम्हें किसी तकलीफ़ में डाल दे तो उसके सिवा कोई उसे दूर करनेवाला नहीं। और यदि वह तुम्हारे लिए किसी भलाई का इरादा कर ले तो कोई उसके अनुग्रह को फेरनेवाला भी नहीं। वह इसे अपने बन्दों में से जिस तक चाहता है, पहुँचाता है और वह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह (ऐ रसूल!) आपको किसी विपत्ति से पीड़ित कर दे और आप उसे अपने से दूर करना चाहें, तो पवित्र अल्लाह के सिवा कोई उसे दूर करने वाला नहीं, और यदि वह आपके साथ भलाई का इरादा कर ले, तो कोई उसके अनुग्रह को रोक नहीं सकता। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपने अनुग्रह से सम्मानित करता है। अतः उसे कोई विवश करने वाला नहीं। तथा वह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दयावान है।
आयत 108
قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدْ جَآءَكُمُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَنِ ٱهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِى لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۖ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيْكُم بِوَكِيلٍۢ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَيُّهَا
O mankind
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَكُمُ
आ चुका तुम्हारे पास
ٱلْحَقُّ
हक़
مِن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَمَنِ
तो जिसने
ٱهْتَدَىٰ
हिदायत पाई
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَهْتَدِى
वो हिदायत पाएगा
لِنَفْسِهِۦ ۖ
अपने नफ़्स के लिए
وَمَن
और जो
ضَلَّ
गुमराह हुआ
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَضِلُّ
वो गुमराह होगा
عَلَيْهَا ۖ
अपने (नफ़्स) पर
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
عَلَيْكُم
तुम पर
بِوَكِيلٍۢ
कोई ज़िम्मेदार
कह दो, "ऐ लोगों! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका है। अब जो कोई मार्ग पर आएगा, तो वह अपने ही लिए मार्ग पर आएगा, और जो कोई पथभ्रष्ट होगा तो वह अपने ही बुरे के लिए पथभ्रष्टि होगा। मैं तुम्हारे ऊपर कोई हवालेदार तो हूँ नहीं।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : ऐ लोगो! तुम्हारे पालनहार की ओर से अवतिरत क़ुरआन तुम्हारे पास आ गया है। अतः जो कोई सीधा मार्ग अपनाएगा और उसपर ईमान लाएगा, उसका लाभ उसी को प्राप्त होगा, क्योंकि अल्लाह अपने बंदों की आज्ञाकारिता से निस्पृह है। और जो कोई पथभ्रष्टता का मार्ग अपनाएगा, उसकी पथभ्रष्टता का प्रभाव केवल उसी पर होगा, क्योंकि अल्लाह को उसके बंदों की अवज्ञा से हानि नहीं पहुँच सकती। और मैं तुम्हारे ऊपर कोई निरीक्षक नहीं हूँ कि तुम्हारे कर्मों का संरक्षण करूँ और तुमसे उनका हिसाब लूँ।
आयत 109
وَٱتَّبِعْ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيْكَ وَٱصْبِرْ حَتَّىٰ يَحْكُمَ ٱللَّهُ ۚ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْحَـٰكِمِينَ
وَٱتَّبِعْ
और पैरवी कीजिए
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَٱصْبِرْ
और सब्र कीजिए
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَحْكُمَ
फ़ैसला कर दे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْحَـٰكِمِينَ
सब फ़ैसला करने वालों से
जो कुछ तुमपर प्रकाशना की जा रही है, उसका अनुसरण करो और धैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह फ़ैसला कर दे, और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उस चीज़ का अनुसरण करें, जो आपका पालनहार आपकी ओर वह़्य (प्रकाशना) करता है और उसके अनुसार कार्य करें, तथा आपकी क़ौम के जो लोग आपके विरोधी हैं उनके कष्ट पर, और जिस चीज़ के पहुँचाने का आपको आदेश दिया गया है, उसके पहुँचाने पर धैर्य से काम लें। तथा आप निरंतर इसी व्यवहार पर बने रहें, यहाँ तक कि अल्लाह उनके बारे में अपना फ़ैसला कर दे, इस प्रकार कि वह आपको इस दुनिया में उनपर विजय प्रदान कर दे और आख़िरत में उन्हें दंडित करे, यदि उनकी मृत्यु उनके कुफ़्र की अवस्था में हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सब्र और अल्लाह के फैसले पर भरोसा रखने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अल्लाह के फैसले पर सब्र और भरोसा रखना चाहिए।
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