नाम का मतलब
इब्राहीम अलैहिस्सलाम (उनकी दुआओं के ज़िक्र की वजह से नाम रखा गया)
पृष्ठभूमि
सूरह इब्राहीम में अंधेरों से रोशनी की तरफ निकालने के मौज़ूअ पर गुफ्तगू है, और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मक्का और उनकी औलाद के लिए की गई दुआओं का ज़िक्र है। यह सूरह नेमतों की नाशुक्री और अल्लाह की सज़ा से खबरदार करती है।
फ़ज़ीलत / सार
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मक्का और अपनी औलाद के लिए मांगी गई मशहूर दुआएं इसी सूरह में हैं, जो आज भी मुसलमान पढ़ते हैं।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓر ۚ كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ إِلَيْكَ لِتُخْرِجَ ٱلنَّاسَ مِنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ بِإِذْنِ رَبِّهِمْ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ
الٓر ۚ
अलिफ़ लाम रा
كِتَـٰبٌ
एक किताब है (ये)
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
لِتُخْرِجَ
ताकि आप निकालें
ٱلنَّاسَ
लोगों को
مِنَ
from
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँधेरों से
إِلَى
to
ٱلنُّورِ
तरफ़ रोशनी के
بِإِذْنِ
साथ इज़्न के
رَبِّهِمْ
उनके रब के
إِلَىٰ
to
صِرَٰطِ
तरफ़ रास्ते
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَمِيدِ
ख़ूब तारीफ़ वाले के
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसे हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, ताकि तुम मनुष्यों को अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले आओ, उनके रब की अनुमति से प्रभुत्वशाली, प्रशंस्य सत्ता, उस अल्लाह के मार्ग की ओर
तफ़्सीर:
{अलिफ़॰ लाम॰ रा॰।} सूरतुल-बक़रा के आरंभ में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है। यह क़ुरआन एक किताब है, जिसे हमने (ऐ रसूल!) आपकी ओर उतारा है, ताकि आप अल्लाह की की इच्छा और उसकी मदद से लोगों को कुफ़्र, अज्ञानता और गुमराही से निकालकर ईमान, ज्ञान और हिदायत की ओर अर्थात् इस्लाम धर्म की ओर ले आएँ, जो उस प्रभुत्वशाली अल्लाह का रास्ता है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, जो हर चीज़ में प्रशंसित है।
आयत 2
ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَوَيْلٌۭ لِّلْكَـٰفِرِينَ مِنْ عَذَابٍۢ شَدِيدٍ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلَّذِى
वो ज़ात
لَهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَوَيْلٌۭ
और हलाकत है
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
مِنْ
from
عَذَابٍۢ
the punishment
شَدِيدٍ
सख़्त अज़ाब से
जिसका वह सब है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। इनकार करनेवालों के लिए तो एक कठोर यातना के कारण बड़ी तबाही है
तफ़्सीर:
वह अल्लाह, जो अकेले आकाशों की सारी वस्तुओं का मालिक है और अकेले वही धरती की सारी वस्तुओं का मालिक है। इसलिए वही इस बात का हक़दार है कि अकेले उसी की इबादत की जाए और उसकी सृष्टि में से किसी भी चीज़ को उसका साझी न बनाया जाए। और जिन लोगों ने कुफ़्र किया, वे सख़्त यातना का सामना करेंगे।
आयत 3
ٱلَّذِينَ يَسْتَحِبُّونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا عَلَى ٱلْـَٔاخِرَةِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ضَلَـٰلٍۭ بَعِيدٍۢ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَسْتَحِبُّونَ
तरजीह देते है
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
عَلَى
than
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
وَيَصُدُّونَ
और वो रोकते हैं
عَن
from
سَبِيلِ
(the) Path
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
وَيَبْغُونَهَا
और वो तलाश करते हैं उसमें
عِوَجًا ۚ
टेढ़ापन
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
فِى
[in]
ضَلَـٰلٍۭ
गुमराही में
بَعِيدٍۢ
दूर की
जो आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते है और अल्लाह के मार्ग से रोकते है और उसमें टेढ़ पैदा करना चाहते है, वही परले दरजे की गुमराही में पड़े है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने कुफ़्र किया, वे दुनिया के जीवन और उसके क्षणभंगुर आनंद को आख़िरत और उसके स्थायी आनंद पर प्रधानता देते हैं, तथा लोगों को अल्लाह के रास्ते से विचलित करते हैं और उसके रास्ते के लिए सत्य से विकृति और विचलन तथा सीध से टेढ़ और झुकाव ढूँढते हैं, ताकि कोई भी उसपर न चले। इन गुणों से विशेषित लोग सत्य एवं सीधे मार्ग से बहुत दूर की गुमराही में हैं।
आयत 4
وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِۦ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ ۖ فَيُضِلُّ ٱللَّهُ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
بِلِسَانِ
ज़बान में
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम की
لِيُبَيِّنَ
ताकि वो वाज़ेह करे
لَهُمْ ۖ
उनके लिए
فَيُضِلُّ
पस भटका देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला है
हमने जो रसूल भी भेजा, उसकी अपनी क़ौम की भाषा के साथ ही भेजा, ताकि वह उनके लिए अच्छी तरह खोलकर बयान कर दे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट रहने देता है और जिसे चाहता है सीधे मार्ग पर लगा देता है। वह है भी प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी
तफ़्सीर:
हमने जो भी रसूल भेजा, उसे उसके समुदाय की भाषा में बात करने वाला बनाकर भेजा। ताकि रसूल अल्लाह के यहाँ से जो कुछ लेकर आए, उनके लिए उसे समझना आसान हो जाए। हमने उसे लोगों को अल्लाह पर ईमान लाने के लिए बाध्य करने के लिए नहीं भेजा। क्योंकि अल्लाह जिसे चाहता है, अपने न्याय के अनुसार गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है, अपनी कृपा से हिदायत का सामर्थ्य प्रदान करता है। वह प्रभुत्वशाली है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, अपनी रचना और प्रबंधन में पूर्ण ह़िकमत वाला है।
आयत 5
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَآ أَنْ أَخْرِجْ قَوْمَكَ مِنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ وَذَكِّرْهُم بِأَيَّىٰمِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّكُلِّ صَبَّارٍۢ شَكُورٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
بِـَٔايَـٰتِنَآ
साथ अपनी निशानियों के
أَنْ
कि
أَخْرِجْ
निकालो
قَوْمَكَ
अपनी क़ौम को
مِنَ
from
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँधेरों से
إِلَى
to
ٱلنُّورِ
तरफ़ रोशनी के
وَذَكِّرْهُم
और याद दिलाओ उन्हें
بِأَيَّىٰمِ
of the days
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के दिनों की
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّكُلِّ
वास्ते हर
صَبَّارٍۢ
बहुत सब्र करने वाले
شَكُورٍۢ
बहुत शुक्र करने वाले के
हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था कि "अपनी क़ौम के लोगों को अँधेरों से प्रकाश की ओर निकाल ला और उन्हें अल्लाह के दिवस याद दिला।" निश्चय ही इसमें प्रत्येक धैर्यवान, कृतज्ञ व्यक्ति के लिए कितनी ही निशानियाँ है
तफ़्सीर:
हमने मूसा को नबी बनाकर भेजा और उनकी सत्यता को इंगित करने वाली और उनके अपने पालनहार की ओर से भेजे हुए (रसूल) होने को दर्शाने वाली निशानियों के साथ उनका समर्थन किया। और हमने उन्हें अपनी जाति को कुफ़्र एवं अज्ञानता से ईमान और ज्ञान की ओर निकाल लाने का आदेश दिया। और हमने उन्हें उन दिनों की याद दिलाने का आदेश दिया जिनमें अल्लाह ने उनपर अनुग्रह किया था। निःसंदेह उन दिनों में अल्लाह के एकत्व, उसकी महान शक्ति और ईमान वालों पर अनुग्रह करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। और इससे वही लोग लाभान्वित होते हैं, जो अल्लाह के आज्ञापालन पर धैर्य रखने वाले और उसकी नेमतों पर हमेशा शुक्र करने वाले हैं।
आयत 6
وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ أَنجَىٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ وَيُذَبِّحُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌۭ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِقَوْمِهِ
अपनी क़ौम से
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَةَ
नेअमत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْكُمْ
तुम पर है (जो)
إِذْ
जब
أَنجَىٰكُم
उसने निजात दी तुम्हें
مِّنْ
from
ءَالِ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन से
يَسُومُونَكُمْ
वो चखाते थे तुम्हें
سُوٓءَ
बुरा
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब
وَيُذَبِّحُونَ
और वो ज़िबाह करते थे
أَبْنَآءَكُمْ
तुम्हारे बेटों को
وَيَسْتَحْيُونَ
और वो ज़िन्दा छोड़ देते थे
نِسَآءَكُمْ ۚ
तुम्हारी औरतों को
وَفِى
And in
ذَٰلِكُم
और इसमें
بَلَآءٌۭ
आज़माइश थी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ी
जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह ही उस कृपादृष्टि को याद करो, जो तुमपर हुई। जब उसने तुम्हें फ़िरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम्हें बुरी यातना दे रहे थे, तुम्हारे बेटों का वध कर डालते थे और तुम्हारी औरतों को जीवित रखते थे, किन्तु इसमें तुम्हारे रब की ओर से बड़ी कृपा हुई।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) उस समय को याद कीजिए, जब मूसा ने अपने पालनहार के आदेश का पालन करते हुए अपनी जाति बनी इसराईल को अल्लाह की ओर से प्राप्त होने वाली नेमतों का स्मरण कराते हुए कहा : ऐ मेरे समुदाय के लोगो! अल्लाह की नेमत को याद करो जब उसने तुम्हें फ़िरऔनियों से बचाया और उनकी यातना से सुरक्षा प्रदान की। वे तुम्हें घोर यातना देते थे। तुम्हारे बेटों का वध कर देते थे ताकि तुम्हारे बीच कोई ऐसा बच्चा न पैदा हो जो फ़िरऔन के राज्य पर क़ब्ज़ा जमा सके। तथा वे तुम्हारी महिलाओं को उन्हें अपमानित और बेइज़्ज़त करने के लिए जीवित रखते थे। उनके इने कृत्यों में तुम्हारे धैर्य की एक महान परीक्षा है। चुनाँचे इस आज़माइश पर धैर्य के बदले में अल्लाह ने तुम्हें फ़िरऔनियों की प्रताड़ना से छुटकारा प्रदान कर दिया।
आयत 7
وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِن شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ ۖ وَلَئِن كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِى لَشَدِيدٌۭ
وَإِذْ
और जब
تَأَذَّنَ
आगाह कर दिया
رَبُّكُمْ
तुम्हारे रब ने
لَئِن
अलबत्ता अगर
شَكَرْتُمْ
शुक्र किया तुमने
لَأَزِيدَنَّكُمْ ۖ
अलबत्ता मैं ज़रूर ज़्यादा दूँगा तुम्हें
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
كَفَرْتُمْ
नाशुक्री की तुमने
إِنَّ
बेशक
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
لَشَدِيدٌۭ
अलबत्ता सख़्त है
जब तुम्हारे रब ने सचेत कर दिया था कि 'यदि तुम कृतज्ञ हुए तो मैं तुम्हें और अधिक दूँगा, परन्तु यदि तुम अकृतज्ञ सिद्ध हुए तो निश्चय ही मेरी यातना भी अत्यन्त कठोर है।'
तफ़्सीर:
और मूसा ने उनसे कहा : उस समय को याद करो, जब तुम्हारे पालनहार ने तुम्हें अच्छी तरह सूचित कर दिया : यदि तुम अल्लाह की दी हुई इन नेमतों पर उसका शुक्रिया अदा करोगे, तो वह तुम्हें इनके अतिरिक्त और भी नेमतों और अनुग्रहों से सम्मानित करेगा, और यदि तुम उसकी नेमतों का इनकार करोगे और उनका शुक्रिया अदा न करोगे, तो उसकी यातना उसके लिए बहुत सख़्त है, जो उसकी नेमतों का इनकार करता है और उनका शुक्रिया अदा नहीं करता है।
आयत 8
وَقَالَ مُوسَىٰٓ إِن تَكْفُرُوٓا۟ أَنتُمْ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا فَإِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِىٌّ حَمِيدٌ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰٓ
मूसा ने
إِن
अगर
تَكْفُرُوٓا۟
तुम नाशुक्री करो
أَنتُمْ
तुम
وَمَن
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में हैं
جَمِيعًۭا
सबके सब
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَغَنِىٌّ
अलबत्ता बहुत बेनियाज़ है
حَمِيدٌ
बहुत तारीफ़ वाला है
और मूसा ने भी कहा था, "यदि तुम और वे जो भी धरती में हैं सब के सब अकृतज्ञ हो जाओ तो अल्लाह तो बड़ा निरपेक्ष, प्रशंस्य है।"
तफ़्सीर:
और मूसा ने अपने समुदाय के लोगों से कहा : यदि तुम कुफ़्र करो और तुम्हारे साथ धरती के सभी लोग कुफ़्र कर बैठें, तो तुम्हारे कुफ्र का नुक़सान तुम्हें ही उठाना पड़ेगा। क्योंकि अल्लाह स्वयं में बेनियाज़ है, स्वयं में प्रशंसा के योग्य है। ईमान वालों का ईमान उसे लाभ नहीं देता, और न काफ़िरों का कुफ़्र उसे नुक़सान पहुँचाता।
आयत 9
أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَبَؤُا۟ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ قَوْمِ نُوحٍۢ وَعَادٍۢ وَثَمُودَ ۛ وَٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۛ لَا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ جَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَرَدُّوٓا۟ أَيْدِيَهُمْ فِىٓ أَفْوَٰهِهِمْ وَقَالُوٓا۟ إِنَّا كَفَرْنَا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ وَإِنَّا لَفِى شَكٍّۢ مِّمَّا تَدْعُونَنَآ إِلَيْهِ مُرِيبٍۢ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَأْتِكُمْ
आई तुम्हारे पास
نَبَؤُا۟
ख़बर
ٱلَّذِينَ
उन लोगों की जो
مِن
(were) before you
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले थे
قَوْمِ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह
وَعَادٍۢ
और आद
وَثَمُودَ ۛ
और समूद की
وَٱلَّذِينَ
और उनकी जो
مِنۢ
(were) after them
بَعْدِهِمْ ۛ
उनके बाद थे
لَا
None
يَعْلَمُهُمْ
नहीं जानता उन्हें
إِلَّا
मगर
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
جَآءَتْهُمْ
आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَرَدُّوٓا۟
तो उन्होंने फेर दिया
أَيْدِيَهُمْ
अपने हाथों को
فِىٓ
in
أَفْوَٰهِهِمْ
अपने मुँहों में
وَقَالُوٓا۟
और कहा
إِنَّا
बेशक हम
كَفَرْنَا
इन्कार करते हैं हम
بِمَآ
उसका जो
أُرْسِلْتُم
भेजे गए तुम
بِهِۦ
साथ जिसके
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَفِى
(are) surely in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّمَّا
इस चीज़ से जो
تَدْعُونَنَآ
तुम बुलाते हो हमें
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
مُرِيبٍۢ
जो बेचैन करने वाला है
क्या तुम्हें उन लोगों की खबर नहीं पहुँची जो तुमसे पहले गुज़रे हैं, नूह की क़ौम और आद और समूद और वे लोग जो उनके पश्चात हुए जिनको अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता? उनके पास उनके रसूल स्पष्टि प्रमाण लेकर आए थे, किन्तु उन्होंने उनके मुँह पर अपने हाथ रख दिए और कहने लगे, "जो कुछ देकर तुम्हें भेजा गया है, हम उसका इनकार करते है और जिसकी ओर तुम हमें बुला रहे हो, उसके विषय में तो हम अत्यन्त दुविधाजनक संदेह में ग्रस्त है।"
तफ़्सीर:
(ऐ काफ़िरो!) क्या तुम्हारे पास तुमसे पहले के झुठलाने वाले समुदायों के विनाश की ख़बर नहीं आई? नूह की जाति, हूद की जाति आद, सालेह की जाति समूद और उनके बाद आने वाले समुदायों की, जिनकी संख्या बहुत अधिक है, जिन्हें अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए। लेकिन उन्होंने रसूलों से क्रोध के कारण अपनी उँगलियों को काटते हुए अपने हाथ अपने मुँहों में डाल लिए और अपने रसूलों से कहा : हम उसका इनकार करते हैं, जिसके साथ तुम भेजे गए हो। और निःसंदहे हम उस चीज़ के बारे में जिसकी ओर तुम हमें आमंत्रित करते हो, असमंजस में डालने वाले संदेह में पड़े हुए हैं।
आयत 10
۞ قَالَتْ رُسُلُهُمْ أَفِى ٱللَّهِ شَكٌّۭ فَاطِرِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يَدْعُوكُمْ لِيَغْفِرَ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرَكُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۚ قَالُوٓا۟ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا تُرِيدُونَ أَن تَصُدُّونَا عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَا فَأْتُونَا بِسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ قَالَتْ
कहा
رُسُلُهُمْ
उनके रसूलों ने
أَفِى
Can (there) be about
ٱللَّهِ
क्या अल्लाह के बारे में
شَكٌّۭ
शक है
فَاطِرِ
जो पैदा करने वाला है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन का
يَدْعُوكُمْ
वो बुलाता है तुम्हें
لِيَغْفِرَ
ताकि वो बख़्श दे
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
[of]
ذُنُوبِكُمْ
तुम्हारे गुनाहों को
وَيُؤَخِّرَكُمْ
और वो मोहलत दे तुम्हें
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
a term
مُّسَمًّۭى ۚ
एक मुक़र्रर मुद्दत तक
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنْ
नहीं हो
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُنَا
हम जैसे
تُرِيدُونَ
तुम चाहते हो
أَن
कि
تَصُدُّونَا
तुम रोको हमें
عَمَّا
उससे जो
كَانَ
थे
يَعْبُدُ
इबादत करते
ءَابَآؤُنَا
आबा ओ अजदाद हमारे
فَأْتُونَا
पस ले आओ हमारे पास
بِسُلْطَـٰنٍۢ
कोई दलील
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह
उनके रसूलों ने कहो, "क्या अल्लाह के विषय में संदेह है, जो आकाशों और धरती का रचयिता है? वह तो तुम्हें इसलिए बुला रहा है, ताकि तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर दे और तुम्हें एक नियत समय तक मुहल्ल दे।" उन्होंने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक मनुष्य हो, चाहते हो कि हमें उनसे रोक दो जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए है। अच्छा, तो अब हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण ले आओ।"
तफ़्सीर:
उनके रसूलों ने उनके जवाब में कहा : क्या अल्लाह के एकेश्वरवाद और इबादत के लिए उसके एकल होने के बारे में कोई संदेह है, जबकि वह आकाशों का रचयिता तथा धरती का रचयिता और बिना किसी नमूने के उनकी उत्पत्ति करने वाला है?! वह तुम्हें ईमान की ओर बुलाता है, ताकि तुम्हारे पिछले गुनाहों को माफ़ कर दे और तुम्हेंं तुम्हारे सांसारिक जीवन में निर्धारित समय सीमा को पूरा करने तक के लिए मोहलत दे। उनके समुदायों ने उनसे कहा : तुम तो हमारे ही जैसे इनसान हो। तुम्हें हमपर कोई विशिष्टता प्राप्त नहीं है। तुम हमें उसकी पूजा करने से रोकना चाहते हो, जिसकी हमारे बाप-दादा पूजा करते थे। इसलिए हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लाओ, जो तुम्हारे इस दावे में तुम्हारी सच्चाई का संकेत दे कि तुम अल्लाह की ओर से हमारे लिए रसूल बनाकर भेजे गए हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन के मकसद (अंधेरे से रोशनी की तरफ लाना) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन इंसान को गुमराही के अंधेरों से हिदायत की रोशनी की तरफ लाने के लिए नाज़िल हुआ है।
आयत 11
قَالَتْ لَهُمْ رُسُلُهُمْ إِن نَّحْنُ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَمُنُّ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ وَمَا كَانَ لَنَآ أَن نَّأْتِيَكُم بِسُلْطَـٰنٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ
قَالَتْ
कहा
لَهُمْ
उन्हें
رُسُلُهُمْ
उनके रसूलों ने
إِن
नहीं हैं
نَّحْنُ
हम
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُكُمْ
तुम जैसे
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَمُنُّ
एहसान करता है
عَلَىٰ
on
مَن
जिस पर
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ ۖ
अपने बन्दों में से
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है (मुमकिन)
لَنَآ
हमारे लिए
أَن
कि
نَّأْتِيَكُم
हम ले आऐं तुम्हारे पास
بِسُلْطَـٰنٍ
कोई दलील
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِ
by the permission of Allah
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न से
وَعَلَى
And upon
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल करें
ٱلْمُؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले
उनके रसूलों ने उनसे कहा, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे मनुष्य है, किन्तु अल्लाह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है एहसान करता है और यह हमारा काम नहीं कि तुम्हारे सामने कोई प्रमाण ले आएँ। यह तो बस अल्लाह के आदेश के पश्चात ही सम्भव है; और अल्लाह ही पर ईमानवालों को भरोसा करना चाहिए
तफ़्सीर:
उनके रसूलों ने उन्हें जवाब देते हुए कहा : हम तो तुम्हारे जैसे इनसान ही हैं। इसलिए हम इसमें आपकी समानता से इनकार नहीं करते हैं। परंतु इस समानता से यह ज़रूरी नहीं है कि हम हर चीज़ में समान हों। क्योंकि अल्लाह अपने बंदों में से जिन पर चाहता है, विशेष कृपा करता है और उन्हें लोगों की ओर संदेशवाहक के रूप में चुन लेता है। तथा अल्लाह की इच्छा के बिना हमारे लिए सही नहीं है कि हम तुम्हारे पास वह प्रमाण लेकर आएँ जिसकी तुमने माँग की है। क्योंकि उसको लाना हमारी क्षमता में नहीं है।बल्कि केवल अल्लाह ही ऐसा करने में सक्षम है। और ईमान वालों को अपने सभी मामलों में अकेले अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।
आयत 12
وَمَا لَنَآ أَلَّا نَتَوَكَّلَ عَلَى ٱللَّهِ وَقَدْ هَدَىٰنَا سُبُلَنَا ۚ وَلَنَصْبِرَنَّ عَلَىٰ مَآ ءَاذَيْتُمُونَا ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُتَوَكِّلُونَ
وَمَا
और क्या है
لَنَآ
हमें
أَلَّا
कि ना
نَتَوَكَّلَ
हम तवक्कल करें
عَلَى
upon
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
هَدَىٰنَا
हिदायत दी उसने हमें
سُبُلَنَا ۚ
हमारे रास्तों की
وَلَنَصْبِرَنَّ
और अलबत्ता हम ज़रूर सब्र करेंगे
عَلَىٰ
on
مَآ
उस पर जो
ءَاذَيْتُمُونَا ۚ
अज़ियत दे रहे हो तुम हमें
وَعَلَى
And upon
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल करें
ٱلْمُتَوَكِّلُونَ
तवक्कल करने वाले
आख़िर हमें क्या हुआ है कि हम अल्लाह पर भरोसा न करें, जबकि उसने हमें हमारे मार्ग दिखाए है? तुम हमें जो तकलीफ़ पहुँचा रहे हो उसके मुक़ाबले में हम धैर्य से काम लेंगे। भरोसा करनेवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"
तफ़्सीर:
कौन-सी बाधा और कौन-सा बहाना है जो हमें उस (अल्लाह) पर भरोसा करने से रोकता है? जबकि उसने हमें सबसे सीधा और सबसे स्पष्ट रास्ता दिखाया है। तथा तुम्हारे झुठलाने और उपहास के माध्यम से हमें कष्ट पहुँचाने पर हम अवश्य सब्र करेंगे। तथा ईमान वालों को अपने सभी मामलों में अकेले अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।
आयत 13
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِرُسُلِهِمْ لَنُخْرِجَنَّكُم مِّنْ أَرْضِنَآ أَوْ لَتَعُودُنَّ فِى مِلَّتِنَا ۖ فَأَوْحَىٰٓ إِلَيْهِمْ رَبُّهُمْ لَنُهْلِكَنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِرُسُلِهِمْ
अपने रसूलों को
لَنُخْرِجَنَّكُم
अलबत्ता हम ज़रूर निकाल देंगे तुम्हें
مِّنْ
of
أَرْضِنَآ
अपनी ज़मीन से
أَوْ
या
لَتَعُودُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर लौटोगे
فِى
to
مِلَّتِنَا ۖ
हमारी मिल्लत में
فَأَوْحَىٰٓ
तो वही की
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
رَبُّهُمْ
उनके रब ने
لَنُهْلِكَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हलाक कर देंगे
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
अन्ततः इनकार करनेवालों ने अपने रसूलों से कहा, "हम तुम्हें अपने भू-भाग से निकालकर रहेंगे, या तो तुम्हें हमारे पंथ में लौट आना होगा।" तब उनके रब ने उनकी ओर प्रकाशना की, "हम अत्याचारियों को विनष्ट करके रहेंगे
तफ़्सीर:
रसूलों के समुदायों में से जिन्होंने कुफ़्र किया, जब वे अपने रसूलों के साथ बहस करने में असमर्थ हो गए, तो उन्होंने कहा : निश्चय हम तुम्हें अवश्य अपनी बस्ती से निकाल देंगे या अवश्य तुम अपने धर्म से हमारे धर्म में लौट आओगे। तो अल्लाह ने रसूलों की ओर उन्हें सशक्त करते हुए वह़्य की : निश्चय हम उन अत्याचारियों को अवश्य नष्ट कर देंगे, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार किया।
आयत 14
وَلَنُسْكِنَنَّكُمُ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَافَ مَقَامِى وَخَافَ وَعِيدِ
وَلَنُسْكِنَنَّكُمُ
और अलबत्ता हम ज़रूर आबाद कर देंगे तुम्हें
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ ۚ
बाद इनके
ذَٰلِكَ
ये
لِمَنْ
उसके लिए है जो
خَافَ
डरे
مَقَامِى
मेरे सामने खड़ा होने से
وَخَافَ
और वो डरे
وَعِيدِ
मेरी वईद से
और उनके पश्चात तुम्हें इस धरती में बसाएँगे। यह उसके लिए है, जिसे मेरे समक्ष खड़े होने का भय हो और जो मेरी चेतावनी से डरे।"
तफ़्सीर:
उनका विनाश करने के बाद, हम (ऐ रसूलो) तुम्हें (और तुम्हारे अनुयायियों को) उस धरती में आबाद कर देंगे। यह झुठलाने वाले काफ़िरों का विनाश करने और उनका विनाश करने के बाद रसूलों और ईमान वालों को धरती में आबाद करने की उक्त बात उसके लिए है, जिसने मेरी महानता और मेरे उसका निरीक्षण करने को अपने मन में उपस्थित रखा, और मेरी उसे यातना की चेतावनी का भय रखा।
आयत 15
وَٱسْتَفْتَحُوا۟ وَخَابَ كُلُّ جَبَّارٍ عَنِيدٍۢ
وَٱسْتَفْتَحُوا۟
और उन्होंने फ़ैसला चाहा
وَخَابَ
और नामुराद हुआ
كُلُّ
हर
جَبَّارٍ
सरकश
عَنِيدٍۢ
इनाद रखने वाला
उन्होंने फ़ैसला चाहा और प्रत्येक सरकश-दुराग्रही असफल होकर रहा
तफ़्सीर:
रसूलों ने अपने पालनहार से अपने दुश्मनों के विरुद्ध विजय और सहायता माँगी और प्रत्येक अभिमानी, सत्य से बैर रखने वाला, जो सत्य के स्पष्ट होने के बावजूद उसे नहीं मानता, असफल रहा।
आयत 16
مِّن وَرَآئِهِۦ جَهَنَّمُ وَيُسْقَىٰ مِن مَّآءٍۢ صَدِيدٍۢ
مِّن
of him
وَرَآئِهِۦ
उसके आगे
جَهَنَّمُ
जहन्नम है
وَيُسْقَىٰ
और वो पिलाया जाएगा
مِن
of
مَّآءٍۢ
पानी में से
صَدِيدٍۢ
पीप वाले
वह जहन्नम से घिरा है और पीने को उसे कचलोहू का पानी दिया जाएगा,
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन इस अभिमानी के आगे जहन्नम है। चुनाँचे जहन्नम उसके घात में है। तथा उसे उसके अंदर जहन्नमियों के शरीर से बहने वाली पीप पिलाई जाएगी। इसलिए वह उसकी प्यास को नहीं बुझाएगी। चुनाँचे उसे प्यास और अन्य प्रकार की यातनाओं के द्वारा निरंतर प्रताड़ित किया जाएगा।
आयत 17
يَتَجَرَّعُهُۥ وَلَا يَكَادُ يُسِيغُهُۥ وَيَأْتِيهِ ٱلْمَوْتُ مِن كُلِّ مَكَانٍۢ وَمَا هُوَ بِمَيِّتٍۢ ۖ وَمِن وَرَآئِهِۦ عَذَابٌ غَلِيظٌۭ
يَتَجَرَّعُهُۥ
वो घूँट-घूँट पियेगा उसे
وَلَا
और नहीं
يَكَادُ
वो क़रीब होगा
يُسِيغُهُۥ
कि वो निगल सके उसे
وَيَأْتِيهِ
और आएगी उसके पास
ٱلْمَوْتُ
मौत
مِن
from
كُلِّ
every
مَكَانٍۢ
हर जगह से
وَمَا
और नहीं (होगा)
هُوَ
वो
بِمَيِّتٍۢ ۖ
मरने वाला
وَمِن
And ahead of him
وَرَآئِهِۦ
और उसके आगे
عَذَابٌ
अज़ाब है
غَلِيظٌۭ
सख़्त
जिसे वह कठिनाई से घूँट-घूँट करके पिएगा और ऐसा नहीं लगेगा कि वह आसानी से उसे उतार सकता है, और मृत्यु उसपर हर ओर से चली आती होगी, फिर भी वह मरेगा नहीं। और उसके सामने कठोर यातना होगी
तफ़्सीर:
वह उसकी कड़वाहट, गर्मी और बदबू के कारण उसे बार-बार पीने का प्रयास करेगा, लेकिन वह उसे निगलने में सक्षम नहीं होगा। तथा जिस यातना से वह पीड़ित होगा, उसकी गंभीरता के कारण हर तरफ़ से मौत उसके पास आएगी। हालाँकि वह मरने वाला नहीं कि आराम पा जाए। बल्कि वह ज़िंदा रहेगा और पीड़ा झेलेगा। और उसके सामने एक और कठोर यातना है, जो उसकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 18
مَّثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ ۖ أَعْمَـٰلُهُمْ كَرَمَادٍ ٱشْتَدَّتْ بِهِ ٱلرِّيحُ فِى يَوْمٍ عَاصِفٍۢ ۖ لَّا يَقْدِرُونَ مِمَّا كَسَبُوا۟ عَلَىٰ شَىْءٍۢ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلضَّلَـٰلُ ٱلْبَعِيدُ
مَّثَلُ
मिसाल
ٱلَّذِينَ
उन लोगों की जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِرَبِّهِمْ ۖ
अपने रब से
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
كَرَمَادٍ
उस राख की तरह हैं
ٱشْتَدَّتْ
कि सख़्त चली हो
بِهِ
उस पर
ٱلرِّيحُ
हवा
فِى
in
يَوْمٍ
एक दिन में
عَاصِفٍۢ ۖ
तेज़ हवा के
لَّا
No
يَقْدِرُونَ
ना वो क़ुदरत रखेंगे
مِمَّا
उसमें से जो
كَسَبُوا۟
उन्होंने कमाई की
عَلَىٰ
on
شَىْءٍۢ ۚ
किसी चीज़ पर
ذَٰلِكَ
यही है
هُوَ
वो
ٱلضَّلَـٰلُ
गुमराही
ٱلْبَعِيدُ
दूर की
जिन लोगों ने अपने रब का इनकार किया उनकी मिसाल यह है कि उनके कर्म जैसे राख हों जिसपर आँधी के दिन प्रचंड हवा का झोंका चले। कुछ भी उन्हें अपनी कमाई में से हाथ न आ सकेगा। यही परले दर्जे की तबाही और गुमराही है
तफ़्सीर:
काफ़िर लोग जो नेकी के कार्य करते हैं, जैसे दान, उपकार और कमज़ोरों पर कृपा आदि, उनकी मिसाल उस राख की तरह है, जिस पर आँधी वाले दिन में तेज़ हवा चले और उसे पूरी शक्ति से उड़ा ले जाए और अलग-अलग स्थानों में इस तरह बिखेर दे कि उसका निशान तक बाक़ी न रहे। यही हाल काफ़िरों के अच्छे कार्यों का है, जिनपर कुफ़्र की आँधी चल चुकी है। क़ियामत के दिन काफ़िरों को उनका कोई लाभ नहीं होगा। वह कार्य जिसकी बुनियाद ईमान पर न हो, वह सत्य के मार्ग से दूर की गुमराही है।
आयत 19
أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَأْتِ بِخَلْقٍۢ جَدِيدٍۢ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُذْهِبْكُمْ
वो ले जाए तुम सबको
وَيَأْتِ
और वो ले आए
بِخَلْقٍۢ
कोई मख़लूक़
جَدِيدٍۢ
नई
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने आकाशों और धरती को सोद्देश्य पैदा किया? यदि वह चाहे तो तुम सबको ले जाए और एक नवीन सृष्टा जनसमूह ले आए
तफ़्सीर:
(ऐ इनसान) क्या तू नहीं जानता कि अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को सत्य के साथ पैदा किया है। चुनाँचे उसने उन्हें व्यर्थ में नहीं बनाया। यदि वह (ऐ लोगो!) तुम्हें विनष्ट करना और तुम्हारे स्थान पर एक अन्य मख़लूक़ लाना चाहे, जो उसकी इबादत और आज्ञापालन करे, तो वह तुम्हें विनष्ट करके एक अन्य मख़लूक़ ला सकता है, जो उसकी इबादत और आज्ञापालन करने वाली हो। क्योंकि यह उसके लिए बहुत आसान काम है।
आयत 20
وَمَا ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ بِعَزِيزٍۢ
وَمَا
और नहीं
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
on
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
بِعَزِيزٍۢ
कुछ मुश्किल
और यह अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं है
तफ़्सीर:
तुम्हें विनष्ट करके तुम्हारे स्थान पर अन्य मख़लूक़ को लाना अल्लाह सर्वशक्तिमान को विवश करने वाला कार्य नहीं है। क्योंकि वह सब कुछ करने में सक्षम है, उसे कोई भी चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रसूलों पर भरोसे और कुफ्फार की धमकियों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की राह में मुश्किलें आएं तो अल्लाह पर तवक्कुल रखना चाहिए।
आयत 21
وَبَرَزُوا۟ لِلَّهِ جَمِيعًۭا فَقَالَ ٱلضُّعَفَـٰٓؤُا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًۭا فَهَلْ أَنتُم مُّغْنُونَ عَنَّا مِنْ عَذَابِ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ ۚ قَالُوا۟ لَوْ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ لَهَدَيْنَـٰكُمْ ۖ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَجَزِعْنَآ أَمْ صَبَرْنَا مَا لَنَا مِن مَّحِيصٍۢ
وَبَرَزُوا۟
और वो सामने होंगे
لِلَّهِ
अल्लाह के
جَمِيعًۭا
सबके सब
فَقَالَ
तो कहेंगे
ٱلضُّعَفَـٰٓؤُا۟
कमज़ोर लोग
لِلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوٓا۟
तकब्बुर किया
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
تَبَعًۭا
ताबेअ
فَهَلْ
तो क्या
أَنتُم
तुम
مُّغْنُونَ
बचाने वाले हो
عَنَّا
हमें
مِنْ
from
عَذَابِ
अज़ाब से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
anything
شَىْءٍۢ ۚ
कुछ भी
قَالُوا۟
वो कहेंगे
لَوْ
अगर
هَدَىٰنَا
हिदायत देता हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَهَدَيْنَـٰكُمْ ۖ
अलबत्ता हिदायत करते हम तुम्हें
سَوَآءٌ
यकसाँ/बराबर है
عَلَيْنَآ
हम पर
أَجَزِعْنَآ
ख़्वाह जज़ा व फ़ज़ा करें हम
أَمْ
या
صَبَرْنَا
सब्र करें हम
مَا
नहीं है
لَنَا
हमारे लिए
مِن
any
مَّحِيصٍۢ
कोई पनाहगाह
सबके सब अल्लाह के सामने खुलकर आ जाएँगे तो कमज़ोर लोग, उन लोगों से जो बड़े बने हुए थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलते थे। तो क्या तुम अल्लाह की यातना में से कुछ हमपर टाल सकते हो? वे कहेंगे, "यदि अल्लाह हमें मार्ग दिखाता तो हम तुम्हें भी दिखाते। अब यदि हम व्याकुल हों या धैर्य से काम लें, हमारे लिए बराबर है। हमारे लिए बचने का कोई उपाय नहीं।"
तफ़्सीर:
नियत समय के दिन लोग अपनी क़ब्रों से उठकर अल्लाह के सामने उपस्थित होंगे। उस समय कमज़ोर अनुयायी अपने सरदारों से कहेंगे : (ऐ सरदारो!) हम तुम्हारे अनुयायी थे। तुम्हारे आदेश का पानल करते और तुम्हारे मना किए हुए कार्य से दूर रहते थे। तो क्या तुम हमें अल्लाह की यातना से कुछ भी बचा सकते हो? तो उनके सरदार करेंगे : यदि अल्लाह ने हमें हिदायत की तौफ़ीक़ प्रदान की होती, तो हम तुम्हें अवश्य उसका मार्ग दिखाते। फिर हम सभी उसकी यातना से बच जाते। लेकिन हम गुमराह हो गए, तो हमने तुम्हें भी गुमराह कर दिया। अब हमारे और तुम्हारे लिए बराबर है कि हम यातना सहन करने सो कमज़ोर हो जाएँ या धैर्य से काम लें। हमारे लिए यातना से भागने की कोई जगह नहीं है।
आयत 22
وَقَالَ ٱلشَّيْطَـٰنُ لَمَّا قُضِىَ ٱلْأَمْرُ إِنَّ ٱللَّهَ وَعَدَكُمْ وَعْدَ ٱلْحَقِّ وَوَعَدتُّكُمْ فَأَخْلَفْتُكُمْ ۖ وَمَا كَانَ لِىَ عَلَيْكُم مِّن سُلْطَـٰنٍ إِلَّآ أَن دَعَوْتُكُمْ فَٱسْتَجَبْتُمْ لِى ۖ فَلَا تَلُومُونِى وَلُومُوٓا۟ أَنفُسَكُم ۖ مَّآ أَنَا۠ بِمُصْرِخِكُمْ وَمَآ أَنتُم بِمُصْرِخِىَّ ۖ إِنِّى كَفَرْتُ بِمَآ أَشْرَكْتُمُونِ مِن قَبْلُ ۗ إِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَقَالَ
और कहेगा
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
لَمَّا
जब
قُضِىَ
फ़ैसला कर दिया जाएगा
ٱلْأَمْرُ
काम का
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
وَعَدَكُمْ
वादा किया तुमसे
وَعْدَ
वादा
ٱلْحَقِّ
सच्चा
وَوَعَدتُّكُمْ
और वादा किया मैंने तुमसे
فَأَخْلَفْتُكُمْ ۖ
तो ख़िलाफ़ किया मैंने तुमसे
وَمَا
और ना
كَانَ
था
لِىَ
मेरे लिए
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّن
any
سُلْطَـٰنٍ
कोई ज़ोर
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
دَعَوْتُكُمْ
बुलाया मैंने तुम्हें
فَٱسْتَجَبْتُمْ
पस क़ुबूल कर लिया तुमने
لِى ۖ
मेरे लिए
فَلَا
पस ना
تَلُومُونِى
तुम मलामत करो मुझे
وَلُومُوٓا۟
बल्कि मलामत करो
أَنفُسَكُم ۖ
अपने नफ़्सों को
مَّآ
नहीं
أَنَا۠
मैं
بِمُصْرِخِكُمْ
फ़रियाद रसी करने वाला तुम्हारी
وَمَآ
और ना
أَنتُم
तुम
بِمُصْرِخِىَّ ۖ
फ़रियाद रसी करने वाले हो मेरी
إِنِّى
बेशक मैं
كَفَرْتُ
इन्कार किया मैंने
بِمَآ
उसका जो
أَشْرَكْتُمُونِ
शरीक ठहराया तुमने मुझे
مِن
before
قَبْلُ ۗ
इससे पहले
إِنَّ
बेशक
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिम लोग
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
जब मामले का फ़ैसला हो चुकेगा तब शैतान कहेगा, "अल्लाह ने तो तुमसे सच्चा वादा किया था और मैंने भी तुमसे वादा किया था, फिर मैंने तो तुमसे सत्य के प्रतिकूल कहा था। और मेरा तो तुमपर कोई अधिकार नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने मान ली; बल्कि अपने आप ही को मलामत करो, न मैं तुम्हारी फ़रियाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रियाद सुन सकते हो। पहले जो तुमने सहभागी ठहराया था, मैं उससे विरक्त हूँ।" निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखदायिनी यातना है
तफ़्सीर:
जब जन्नत वाले जन्नत में और जहन्नम वाले जहन्नम में प्रवेश कर गए, तो इबलीस ने कहा : निःसंदेह अल्लाह ने तुमसे सच्चा वादा किया और उसने तुमसे जो वादा किया था, उसे पूरा कर दिया। और मैंने तुमसे झूठा वादा किया, इसलिए मैंने तुमसे जो वादा किया था, उसे पूरा नहीं किया। मेरे पास कोई शक्ति नहीं थी जिसके द्वारा मैं तुम्हें दुनिया में कुफ़्र और गुमराही पर मजबूर कर सकता। लेकिन दरअसल मैंने तुम्हें कुफ़्र की ओर बुलाया और तुम्हारे लिए गुनाहों को सुंदर बनाकर पेश किया, तो तुम तुरंत मेरे पीछे चल पड़े। इसलिए अपनी गुमराही के लिए मुझे दोष न दो, बल्कि स्वयं को दोष दो। क्योंकि तुम खुद दोष के अधिक योग्य हो। न मैं तुम्हें यातना से बचाने के लिए तुम्हारी मदद को पहुँचने वाला हूँ, और न तुम मुझसे यातना को दूर करने के लिए मेरी मदद को पहुँचने वाले हो। मैं तुम्हारे उपासना में मुझे अल्लाह का साझी बनाने का इनकार करता हूँ। निःसंदेह (दुनिया में अल्लाह का साझी बनाकर और उसका इनकार करके) अत्याचार करने वालों के लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना है, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 23
وَأُدْخِلَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ ۖ تَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَـٰمٌ
وَأُدْخِلَ
और दाख़िल किए जाऐंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उनमें
بِإِذْنِ
इज़्न से
رَبِّهِمْ ۖ
अपने रब के
تَحِيَّتُهُمْ
दुआ- ए -मुलाक़ात उनकी
فِيهَا
उनमें
سَلَـٰمٌ
सलाम (होगा)
इसके विपरीत जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए वे ऐसे बाग़ों में प्रवेश करेंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे अपने रब की अनुमति से सदैव रहेंगे। वहाँ उनका अभिवादन 'सलाम' से होगा
तफ़्सीर:
अत्याचारियों के अंजाम के विपरीत, ईमान लाने और अच्छे कार्य करने वालों को ऐसी जन्नतों में प्रवेश कराया जाएगा, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हैं। वे अपने रब की अनुमति और सामर्थ्य से उनमें हमेशा के लिए रहेंगे। वे एक-दूसरे का अभिवादन करेंगे, फ़रिश्ते भी उनका अभिवादन करेंगे और उनका पवित्र पालनहार भी उनका अभिवादन करेगा। यह अभिवादन 'सलाम' के द्वारा होगा।
आयत 24
أَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًۭا كَلِمَةًۭ طَيِّبَةًۭ كَشَجَرَةٍۢ طَيِّبَةٍ أَصْلُهَا ثَابِتٌۭ وَفَرْعُهَا فِى ٱلسَّمَآءِ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
كَيْفَ
किस तरह
ضَرَبَ
बयान की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَثَلًۭا
मिसाल
كَلِمَةًۭ
कलमा
طَيِّبَةًۭ
तय्यबा/पाकीज़ा की
كَشَجَرَةٍۢ
मानिन्द दरख़्त
طَيِّبَةٍ
पाकीज़ा के
أَصْلُهَا
जड़ उसकी
ثَابِتٌۭ
मज़बूत है
وَفَرْعُهَا
और शाख़ें उसकी
فِى
(are) in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में हैं
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने कैसी मिसाल पेश की? अच्छी उत्तम बात एक अच्छे शुभ वृक्ष के सदृश है, जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी शाखाएँ आकाश में पहुँची हुई हों;
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह ने एकेश्वरवाद के शब्द (तौह़ीद के कलिमा) 'ला इलाहा इल्लल्लाह' का उदाहरण कैसे दिया, जब उसका उदाहरण एक पवित्र वृक्ष अर्थात् खजूर के पेड़ के साथ दिया, जिसका तना धरती के अंदर धँसा हुआ होता है, जो अपनी जड़ो के द्वारा पानी प्राप्त करता है और उसकी शाखा आकाश की ओर ऊँची होती है, ओस पीती है और अच्छी (साफ़) हवा को ग्रहण करती है।
आयत 25
تُؤْتِىٓ أُكُلَهَا كُلَّ حِينٍۭ بِإِذْنِ رَبِّهَا ۗ وَيَضْرِبُ ٱللَّهُ ٱلْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
تُؤْتِىٓ
वो देता है
أُكُلَهَا
फल अपना
كُلَّ
हर
حِينٍۭ
वक़्त
بِإِذْنِ
इज़्न से
رَبِّهَا ۗ
अपने रब के
وَيَضْرِبُ
और बयान करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْأَمْثَالَ
मिसालें
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَتَذَكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
अपने रब की अनुमति से वह हर समय अपना फल दे रहा हो। अल्लाह तो लोगों के लिए मिशालें पेश करता है, ताकि वे जाग्रत हों
तफ़्सीर:
यह अच्छा पेड़ अपने पालनहार की अनुमति से हर समय अपना अच्छा फल देता है। तथा पाक एवं उच्च अल्लाह इस आशा में लोगों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है कि वे उपदेश ग्रहण करें।
आयत 26
وَمَثَلُ كَلِمَةٍ خَبِيثَةٍۢ كَشَجَرَةٍ خَبِيثَةٍ ٱجْتُثَّتْ مِن فَوْقِ ٱلْأَرْضِ مَا لَهَا مِن قَرَارٍۢ
وَمَثَلُ
और मिसाल
كَلِمَةٍ
कलमा
خَبِيثَةٍۢ
ख़बीसा/नापाक की
كَشَجَرَةٍ
मानिन्द दरख़्त
خَبِيثَةٍ
नापाक के
ٱجْتُثَّتْ
जो उखाड़ा गया
مِن
from
فَوْقِ
ऊपर से
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन के
مَا
नहीं
لَهَا
उसके लिए
مِن
(is) any
قَرَارٍۢ
कोई क़रार
और अशुभ एंव अशुद्ध बात की मिसाल एक अशुभ वृक्ष के सदृश है, जिसे धरती के ऊपर ही से उखाड़ लिया जाए और उसे कुछ भी स्थिरता प्राप्त न हो
तफ़्सीर:
और शिर्क के दुष्ट शब्द का उदाहरण एक दुष्ट पेड़ की तरह है, जो कि इंद्रायन की बेल है, जिसे उसकी जड़ से उखाड़ दिया गया, उसकी ज़मीन पर कोई स्थिरता नहीं है, और न ही आकाश की ओर कोई बुलंदी है। चुनाँचे वह सूख जाता है और हवाएँ उसे उड़ा ले जाती हैं। अतः कुफ़्र के शब्द का अंजाम (भी) विनाश है और कुफ़्र करने वाले का कोई अच्छा काम अल्लाह की ओर नहीं चढ़ता।
आयत 27
يُثَبِّتُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱلْقَوْلِ ٱلثَّابِتِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَيُضِلُّ ٱللَّهُ ٱلظَّـٰلِمِينَ ۚ وَيَفْعَلُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ
يُثَبِّتُ
साबित रखता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱلْقَوْلِ
साथ बात
ٱلثَّابِتِ
मज़बूत के
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَفِى
and in
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
وَيُضِلُّ
और भटकाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلظَّـٰلِمِينَ ۚ
ज़ालिमों को
وَيَفْعَلُ
और करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
जो
يَشَآءُ
वो चाहता है
ईमान लानेवालों को अल्लाह सुदृढ़ बात के द्वारा सांसारिक जीवन में भी परलोक में भी सुदृढ़ता प्रदान करता है और अत्याचारियों को अल्लाह विचलित कर देता है। और अल्लाह जो चाहता है, करता है
तफ़्सीर:
अल्लाह मोमिनों को तौह़ीद के दृढ़ कलिमा (शब्द) के साथ दुनिया के जीवन में पूर्ण ईमान प्रदान करता है यहाँ तक कि उनकी मृत्यु ईमान पर होती है। और 'बरज़ख़' के जीवन में उनकी कब्रों के अंदर (फ़रिश्तों द्वारा) सवाल के समय (भी सुदृढ़ रखता है) और क़ियामत के दिन (भी) उन्हें दृढ़ता प्रदान करेगा। जबकि अल्लाह उसके साथ शिर्क और कुफ़्र करके अत्याचार करने वालों को सत्यता और सही मार्गदर्शन से भटका देता है। और अल्लाह जो चाहता है, करता है। जिसे गुमराह करना चाहता है, उसे अपने न्याय के साथ गुमराह कर देता है और जिसे सीधी राह दिखाना चाहता है, उसे अपने अनुग्रह से सीधी राह दिखाता है। उसे कोई मजबूर करने वाला नहीं है।
आयत 28
۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ بَدَّلُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ كُفْرًۭا وَأَحَلُّوا۟ قَوْمَهُمْ دَارَ ٱلْبَوَارِ
۞ أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[to]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जिन्होंने
بَدَّلُوا۟
बदल डाला
نِعْمَتَ
नेअमत को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
كُفْرًۭا
कुफ़्र/नाशुक्री से
وَأَحَلُّوا۟
और उन्होंने ला उतारा
قَوْمَهُمْ
अपनी क़ौम को
دَارَ
घर में
ٱلْبَوَارِ
हलाकत के
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने अल्लाह की नेमत को कुफ़्र से बदल डाला औऱ अपनी क़ौम को विनाश-गृह में उतार दिया;
तफ़्सीर:
आपने क़ुरैश के उन लोगों का हाल देख लिया जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया, जब उन्होंने 'हरम' में सुरक्षा प्रदान करने और उनके बीच मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नबी बनाकर भेजने की अल्लाह की नेमत को बदल डाला। उन्होंने उसके बदले उसकी नेमतों की नाशुक्री करते हुए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अपने पालनहार की ओर से लाए हुए धर्म को झुठला दिया और अपनी जाति के उन लोगों को विनाश के घर में ला उतारा, जिन्होंने कुफ़्र में उनका पालन किया।
आयत 29
جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا ۖ وَبِئْسَ ٱلْقَرَارُ
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
يَصْلَوْنَهَا ۖ
वो जलेंगे उसमें
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
ٱلْقَرَارُ
ठिकाना
जहन्नम में, जिसमें वे झोंके जाएँगे और वह अत्यन्त बुरा ठिकाना है!
तफ़्सीर:
विनाश का घर' जहन्नम है, जिसमें वे प्रवेश करके उसकी गर्मी झेलेंगे और उनका यह ठिकाना बहुत बुरा ठिकाना है।
आयत 30
وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ أَندَادًۭا لِّيُضِلُّوا۟ عَن سَبِيلِهِۦ ۗ قُلْ تَمَتَّعُوا۟ فَإِنَّ مَصِيرَكُمْ إِلَى ٱلنَّارِ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने बना लिए
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
أَندَادًۭا
कुछ शरीक
لِّيُضِلُّوا۟
ताकि वो भटका दें
عَن
from
سَبِيلِهِۦ ۗ
उसके रास्ते से
قُلْ
कह दीजिए
تَمَتَّعُوا۟
तुम फ़ायदे उठा लो
فَإِنَّ
तो बेशक
مَصِيرَكُمْ
लौटना है तुम्हारा
إِلَى
(is) to
ٱلنَّارِ
तरफ़ आग के
और उन्होंने अल्लाह के प्रतिद्वन्दी बना दिए, ताकि परिणामस्वरूप वे उन्हें उसके मार्ग से भटका दें। कह दो, "थोड़े दिन मज़े ले लो। अन्ततः तुम्हें आग ही की ओर जाना है।"
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने अल्लाह के साझी और समकक्ष बना लिए, ताकि खुद अल्लाह के रास्ते से भटकने के बाद अपने अनुयायियों को भी उससे भटका दें। (ऐ रसूल) आप उनसे कह दें : इस जीवन में तुम जिन इच्छाओं में व्यस्त और संदेह फैलाने में लगे हो, उनका कुछ लाभ उठा लो। क्योंकि क़ियामत के दिन तुम्हें आग (नरक) ही की ओर लौटना है, उसके अलावा तुम्हारा कोई अन्य ठिकाना नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शैतान की बेवफाई और अच्छी बात की मिसाल (मज़बूत दरख्त) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अच्छी बात एक मज़बूत दरख्त की तरह है, जिसकी जड़ें गहरी होनी चाहिए।
आयत 31
قُل لِّعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خِلَـٰلٌ
قُل
कह दीजिए
لِّعِبَادِىَ
मेरे बन्दों से
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
يُقِيمُوا۟
वो क़ायम करें
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَيُنفِقُوا۟
और वो ख़र्च करें
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
سِرًّۭا
छुप कर
وَعَلَانِيَةًۭ
और ज़ाहिरी तौर पर
مِّن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتِىَ
आ जाए
يَوْمٌۭ
वो दिन
لَّا
नहीं
بَيْعٌۭ
कोई तिजारत
فِيهِ
उस में
وَلَا
और ना
خِلَـٰلٌ
कोई दोस्ती
मेरे जो बन्दे ईमान लाए है उनसे कह दो कि वे नमाज़ की पाबन्दी करें और हमने उन्हें जो कुछ दिया है उसमें से छुपे और खुले ख़र्च करें, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिनमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न मैत्री
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप मोमिनों से कह दें : ऐ मोमिनो! पूर्ण रूप से नमाज़ पढ़ो, और अल्लाह के दिए हुए धन से आवश्यक और वांछनीय कार्यों में खर्च करो, रियाकारी के डर से गुप्त रूप से, और खुले तौर पर इसलिए कि दूसरे लोग तुम्हारा अनुसरण करें। इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा, न छुड़ौती स्वीकार की जाएगी कि उसके द्वारा अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा प्राप्त कर लिया जाए, और न कोई दोस्ती होगी कि एक दोस्त अपने दोस्त के लिए सिफ़ारिश कर दे।
आयत 32
ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًۭا لَّكُمْ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْفُلْكَ لِتَجْرِىَ فِى ٱلْبَحْرِ بِأَمْرِهِۦ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْأَنْهَـٰرَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَأَنزَلَ
और उसने उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَخْرَجَ
फिर उसने निकाला
بِهِۦ
साथ उसके
مِنَ
of
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों में से
رِزْقًۭا
रिज़्क़
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र कीं
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْفُلْكَ
कश्तियाँ
لِتَجْرِىَ
ताकि वो चलें
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
بِأَمْرِهِۦ ۖ
उसके हुक्म से
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र कीं
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَنْهَـٰرَ
नहरें
वह अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती की सृष्टि की और आकाश से पानी उतारा, फिर वह उसके द्वारा कितने ही पैदावार और फल तुम्हारी आजीविका के रूप में सामने लाया। और नौका को तुम्हारे काम में लगाया, ताकि समुद्र में उसके आदेश से चले और नदियों को भी तुम्हें लाभ पहुँचाने में लगाया
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है, जिसने आकाशों और धरती को किसी पूर्व उदाहरण के बिना पैदा किया, और आकाश से बारिश का पानी उतारा, फिर उस उतारे हुए पानी से (ऐ लोगो!) तुम्हारी जीविका के लिए फलों की क़िस्मों को निकाला और नावों को तुम्हारे वश में कर दिया, जो पानी के ऊपर उसके अनुमान के अनुसार चलती हैं, और नदियों को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, ताकि उनसे पानी पिओ और अपने पशुओं और अपनी खेतियों को सैराब करो।
आयत 33
وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ دَآئِبَيْنِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र किया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلشَّمْسَ
सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
دَآئِبَيْنِ ۖ
लगातार चलने वाले
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र किया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
और सूर्य और चन्द्रमा को तुम्हारे लिए कार्यरत किया और एक नियत विधान के अधीन निरंतर गतिशील है। और रात औऱ दिन को भी तुम्हें लाभ पहुँचाने में लगा रखा है
तफ़्सीर:
उसने सूर्य और चाँद को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, जो लगातार गतिशील हैं, तथाा दिन और रात को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया, जो एक-दूसरे के बाद आते-जाते हैं; रात तुम्हारे सोने और आराम करने के लिए और दिन तुम्हारी गतिविधि और दौड़-धूप करने के लिए है।
आयत 34
وَءَاتَىٰكُم مِّن كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ ۚ وَإِن تَعُدُّوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ لَا تُحْصُوهَآ ۗ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَظَلُومٌۭ كَفَّارٌۭ
وَءَاتَىٰكُم
और उसने दी तुम्हें
مِّن
of
كُلِّ
हर वो चीज़
مَا
जो
سَأَلْتُمُوهُ ۚ
माँगी तुमने उस से
وَإِن
और अगर
تَعُدُّوا۟
तुम गिनने लगो
نِعْمَتَ
नेअमतें
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَا
not
تُحْصُوهَآ ۗ
नहीं तुम शुमार कर सकते उन्हें
إِنَّ
बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
لَظَلُومٌۭ
अलबत्ता बड़ा ज़ालिम है
كَفَّارٌۭ
बड़ा नाशुक्रा है
और हर उस चीज़ में से तुम्हें दिया जो तुमने उससे माँगा यदि तुम अल्लाह की नेमतों की गणना नहीं कर सकते। वास्तव में मनुष्य ही बड़ा ही अन्यायी, कृतघ्न है
तफ़्सीर:
और उसने तुम्हें उन सब चीज़ों में से प्रदान किया, जो तुमने माँगीं और जो तुमने नहीं माँगीं। यदि तुम अल्लाह की नेमतों की गणना करो, तो उनकी बहुतायत और बहुलता के कारण उनकी गणना नहीं कर सकते। क्योंकि तुम्हारे लिए जो कुछ उल्लेख किया गया है, वे उनके कुछ उदाहरण हैं। निश्चय इनसान अपने आप पर बड़ा अत्याचार करने वाला, अल्लाह सर्वशक्तिमान की नेमतों का बहुत कृतघ्न है।
आयत 35
وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَـٰذَا ٱلْبَلَدَ ءَامِنًۭا وَٱجْنُبْنِى وَبَنِىَّ أَن نَّعْبُدَ ٱلْأَصْنَامَ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِيمُ
इब्राहीम ने
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱجْعَلْ
बना दे
هَـٰذَا
इस
ٱلْبَلَدَ
शहर को
ءَامِنًۭا
अमन वाला
وَٱجْنُبْنِى
और बचा ले मुझे
وَبَنِىَّ
और मेरी औलाद को
أَن
(इससे) कि
نَّعْبُدَ
हम इबादत करें
ٱلْأَصْنَامَ
बुतों की
याद करो जब इबराहीम ने कहा था, "मेरे रब! इस भूभाग (मक्का) को शान्तिमय बना दे और मुझे और मेरी सन्तान को इससे बचा कि हम मूर्तियों को पूजने लग जाए
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब इबराहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे इसमाईल और उनकी माँ हाजर को मक्का की घाटी में रहने के लिए छोड़ने के बाद दुआ की : ऐ मेरे पालनहार! इस नगर - मक्का - को, जिसमें मैंने अपने परिवार को रहने के लिए छोड़ा है, शांति एवं सुरक्षा वाला नगर बना दे। जिसमें कोई खून न बहाया जाए, और किसी पर अत्याचार न किया जाए। तथा मुझे और मेरे बच्चों को मूर्तिपूजा से दूर रख।
आयत 36
رَبِّ إِنَّهُنَّ أَضْلَلْنَ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ ۖ فَمَن تَبِعَنِى فَإِنَّهُۥ مِنِّى ۖ وَمَنْ عَصَانِى فَإِنَّكَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّهُنَّ
बेशक उन्होंने
أَضْلَلْنَ
गुमराह कर दिया
كَثِيرًۭا
कसीर तादाद को
مِّنَ
among
ٱلنَّاسِ ۖ
लोगों में से
فَمَن
तो जो कोई
تَبِعَنِى
पैरवी करे मेरी
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
مِنِّى ۖ
मुझसे है
وَمَنْ
और जो कोई
عَصَانِى
नाफ़रमानी करे मेरी
فَإِنَّكَ
तो बेशक तू ही है
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला
मेरे रब! इन्होंने (इन मूर्तियों नॆ) बहुत से लोगों को पथभ्रष्ट किया है। अतः जिस किसी ने मॆरा अनुसरण किया वह मेरा है और जिस ने मेरी अवज्ञा की तो निश्चय ही तू बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पालनहार! मूर्तियों ने बहुत से लोगों को गुमराह किया है। क्योंकि उन्होंने यह सोचा कि ये मूर्तियाँ उनके लिए सिफ़ारिश करेंगी। इसलिए वे इनके फ़ितने (प्रलोभन) में पड़ गए और अल्लाह को छोड़कर इनकी पूजा की। अतः लोगों में से जिसने भी अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके आज्ञापालन में मेरा अनुसरण किया, वह मेरे दल और मेरे अनुयायियों में से है। और जिसने मेरी अवज्ञा की और अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके आज्ञापालन में मेरा अनुसरण नहीं किया, तो (ऐ मेरे रब!) तू जिनके गुनाहों को क्षमा करना चाहे, क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 37
رَّبَّنَآ إِنِّىٓ أَسْكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِى بِوَادٍ غَيْرِ ذِى زَرْعٍ عِندَ بَيْتِكَ ٱلْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱجْعَلْ أَفْـِٔدَةًۭ مِّنَ ٱلنَّاسِ تَهْوِىٓ إِلَيْهِمْ وَٱرْزُقْهُم مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ
رَّبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَسْكَنتُ
बसाया मैंने
مِن
(some) of
ذُرِّيَّتِى
अपनी कुछ औलाद को
بِوَادٍ
वादी में
غَيْرِ
बग़ैर
ذِى
with
زَرْعٍ
खेती वाली
عِندَ
पास
بَيْتِكَ
तेरे घर के
ٱلْمُحَرَّمِ
हुरमत वाले
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لِيُقِيمُوا۟
ताकि वो क़ायम करें
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
فَٱجْعَلْ
पस कर दे
أَفْـِٔدَةًۭ
दिलों को
مِّنَ
of
ٱلنَّاسِ
लोगों के
تَهْوِىٓ
वो माइल हों
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
وَٱرْزُقْهُم
और रिज़्क़ दे उन्हें
مِّنَ
with
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों में से
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَشْكُرُونَ
वो शुक्र अदा करें
मेरे रब! मैंने एक ऐसी घाटी में जहाँ कृषि-योग्य भूमि नहीं अपनी सन्तान के एक हिस्से को तेरे प्रतिष्ठित घर (काबा) के निकट बसा दिया है। हमारे रब! ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। अतः तू लोगों के दिलों को उनकी ओर झुका दे और उन्हें फलों और पैदावार की आजीविका प्रदान कर, ताकि वे कृतज्ञ बने
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! मैंने अपनी कुछ संतान, अर्थात् अपने बेटे इसमाईल और उसके बेटों को तेरे सम्मानित घर के पास एक ऐसी घाटी में बसाया है, जिसमें कोई खेती या पानी नहीं है। ऐ हमारे पालनहार! मैंने उन्हें उसके पास इसलिए बसाया है कि वे उसमें नमाज़ क़ायम करें। इसलिए (ऐ मेरे रब!) लोगों के दिलों को इनकी ओर और इस नगर की ओर प्रलोभित कर दे, और उन्हें फलों से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे अपने ऊपर तेरे उपकार का शुक्रिया अदा करें।
आयत 38
رَبَّنَآ إِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْفِى وَمَا نُعْلِنُ ۗ وَمَا يَخْفَىٰ عَلَى ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّكَ
बेशक तू
تَعْلَمُ
तू जानता है
مَا
जो कुछ
نُخْفِى
हम छुपाते हैं
وَمَا
और जो कुछ
نُعْلِنُ ۗ
हम ज़ाहिर करते हैं
وَمَا
और नहीं
يَخْفَىٰ
छुप सकती
عَلَى
from
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مِن
any
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
हमारे रब! तू जानता ही है जो कुछ हम छिपाते है और जो कुछ प्रकट करते है। अल्लाह से तो कोई चीज़ न धरती में छिपी है और न आकाश में
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! तू हर उस चीज़ को जानता है, जिसे हम छिपाते हैं और जिसे हम प्रकट करते हैं। तथा धरती या आकाश में अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपी नहीं है। बल्कि वह उसे जानता है। इसलिए उसकी ओर हमारी आवश्यकता और हमारी निर्धनता उससे छिपी नहीं है।
आयत 39
ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى وَهَبَ لِى عَلَى ٱلْكِبَرِ إِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ ۚ إِنَّ رَبِّى لَسَمِيعُ ٱلدُّعَآءِ
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
वो जिसने
وَهَبَ
अता किए
لِى
मुझे
عَلَى
in
ٱلْكِبَرِ
बावजूद बुढ़ापे के
إِسْمَـٰعِيلَ
इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ ۚ
और इसहाक़
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
لَسَمِيعُ
अलबत्ता ख़ूब सुनने वाला है
ٱلدُّعَآءِ
दुआ को
सारी प्रशंसा है उस अल्लाह की जिसने बुढ़ापे के होते हुए भी मुझे इसमाईल और इसहाक़ दिए। निस्संदेह मेरा रब प्रार्थना अवश्य सुनता है
तफ़्सीर:
हर प्रकार का आभार और प्रशंसा उस अल्लाह महिमावान् के लिए है, जिसने नेक संतान प्रदान करने की मेरी दुआ स्वीकार कर ली। चुनाँचे उसने मेरे बुढ़ापे के बावजूद मुझे हाजर से इसमाईल और सारा से इसहाक़ प्रदान किया। निःसंदेह मेरा पवित्र पालनहार उसकी दुआ को सुनने वाला है, जो उससे दुआ करे।
आयत 40
رَبِّ ٱجْعَلْنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَآءِ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱجْعَلْنِى
बना मुझे
مُقِيمَ
क़ायम करने वाला
ٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ का
وَمِن
and from
ذُرِّيَّتِى ۚ
और मेरी औलाद को
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَتَقَبَّلْ
और तू क़ुबूल कर ले
دُعَآءِ
दुआ मेरी
मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तान को नमाज़ क़ायम करनेवाला बना। हमारे रब! और हमारी प्रार्थना स्वीकार कर
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पालनहार! मुझे पूर्ण रूप से नमाज़ पढ़ने वाला बना और मेरी औलाद को भी नमाज़ क़ायम करने वालों में से बना। ऐ हमारे पालनहार! और मेरी दुआ स्वीकार कर और उसे अपने यहाँ स्वीकृत बना दे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मक्का के लिए दुआ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपने घर और औलाद के लिए दीनदारी और अमन की दुआ करना बेहद अहम है।
आयत 41
رَبَّنَا ٱغْفِرْ لِى وَلِوَٰلِدَىَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ ٱلْحِسَابُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱغْفِرْ
बख़्श दे
لِى
मुझे
وَلِوَٰلِدَىَّ
और मेरे वालिदैन को
وَلِلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिनों को
يَوْمَ
जिस दिन
يَقُومُ
क़ायम होगा
ٱلْحِسَابُ
हिसाब
हमारे रब! मुझे और मेरे माँ-बाप को और मोमिनों को उस दिन क्षमाकर देना, जिस दिन हिसाब का मामला पेश आएगा।"
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! मेरे पापों को क्षमा कर दे और मेरे माता-पिता के पापों को क्षमा कर दे। (यह प्रार्थना उन्होंने उस समय की थी जब उन्हें पता नहीं था कि उनके पिता अल्लाह के दुश्मन हैं। जब उनके लिए यह स्पष्ट हो गया कि वह अल्लाह के दुश्मन हैं, तो उनसे खुद को अलग कर लिया।) और ईमान वालों के गुनाहों को क्षमा कर दे, जिस दिन लोग अपने पालनहार के सामने हिसाब के लिए खड़े होंगे।
आयत 42
وَلَا تَحْسَبَنَّ ٱللَّهَ غَـٰفِلًا عَمَّا يَعْمَلُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ۚ إِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍۢ تَشْخَصُ فِيهِ ٱلْأَبْصَـٰرُ
وَلَا
और ना
تَحْسَبَنَّ
तुम हरगिज़ समझो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
غَـٰفِلًا
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
يَعْمَلُ
अमल करते हैं
ٱلظَّـٰلِمُونَ ۚ
ज़ालिम लोग
إِنَّمَا
बेशक
يُؤَخِّرُهُمْ
वो ढील दे रहा है उन्हें
لِيَوْمٍۢ
उस दिन के लिए
تَشْخَصُ
पथरा जाऐंगी
فِيهِ
जिसमें
ٱلْأَبْصَـٰرُ
निगाहें
अब ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे है, उससे अल्लाह को असावधान न समझो। वह तो इन्हें बस उस दिन तक के लिए टाल रहा है जबकि आँखे फटी की फटी रह जाएँगी,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप हरगिज़ यह न समझें कि यदि अल्लाह अत्याचारियों की यातना को विलंबित कर रहा है, तो वह उनके झुठलाने और अल्लाह के रास्ते से रोकने आदि कार्यों से अनजान है। बल्कि वह उनसे अवगत है। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। वह केवल उनकी यातना को क़ियामत के दिन तक विलंबित कर रहा है, जिस दिन आँखें, जो कुछ देख रही होंगी उसकी भयावहता के डर से, फटी की फटी रह जाएँगी।
आयत 43
مُهْطِعِينَ مُقْنِعِى رُءُوسِهِمْ لَا يَرْتَدُّ إِلَيْهِمْ طَرْفُهُمْ ۖ وَأَفْـِٔدَتُهُمْ هَوَآءٌۭ
مُهْطِعِينَ
तेज़ी से दौड़ने वाले
مُقْنِعِى
ऊपर उठाए हुए
رُءُوسِهِمْ
अपने सरों को
لَا
not
يَرْتَدُّ
नहीं लौटेगी
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
طَرْفُهُمْ ۖ
निगाह उनकी
وَأَفْـِٔدَتُهُمْ
और दिल उनके
هَوَآءٌۭ
ख़ाली होंगे
अपने सिर उठाए भागे चले जा रहे होंगे; उनकी निगाह स्वयं उनकी अपनी ओर भी न फिरेगी और उनके दिल उड़े जा रहे होंगे
तफ़्सीर:
जब लोग क़ब्रों से उठकर पुकारने वाले की ओर तेज़ी से भागेंगे, अपने सिर को उठाए हुए होंगे, वे घबराहट से आकाश की ओर देखेंगे, उनकी निगाहें उनकी ओर नहीं लौटेंगी, बल्कि वे जो कुछ भी देख रही होंगी उसके डर से खुली की खुली रह जाएँगी और उनके दिल ख़ाली होंगे, उस दिन के दृश्य की दहशत से उनमें कोई समझ-बूझ नहीं होगी।
आयत 44
وَأَنذِرِ ٱلنَّاسَ يَوْمَ يَأْتِيهِمُ ٱلْعَذَابُ فَيَقُولُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ رَبَّنَآ أَخِّرْنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ قَرِيبٍۢ نُّجِبْ دَعْوَتَكَ وَنَتَّبِعِ ٱلرُّسُلَ ۗ أَوَلَمْ تَكُونُوٓا۟ أَقْسَمْتُم مِّن قَبْلُ مَا لَكُم مِّن زَوَالٍۢ
وَأَنذِرِ
और ख़बरदार कीजिए
ٱلنَّاسَ
लोगों को
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتِيهِمُ
आएगा उनके पास
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
فَيَقُولُ
तो कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَخِّرْنَآ
मोहलत दे हमें
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
एक मुद्दत तक
قَرِيبٍۢ
क़रीब की
نُّجِبْ
हम क़ुबूल कर लें
دَعْوَتَكَ
तेरी दावत
وَنَتَّبِعِ
और हम पैरवी करें
ٱلرُّسُلَ ۗ
रसूलों की
أَوَلَمْ
क्या नहीं
تَكُونُوٓا۟
थे तुम
أَقْسَمْتُم
क़समें खाते तुम
مِّن
before
قَبْلُ
इससे पहले
مَا
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
any
زَوَالٍۢ
कोई ज़वाल
लोगों को उस दिन से डराओ, जब यातना उन्हें आ लेगी। उस समय अत्याचारी लोग कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ी-सी मुहलत दे दे। हम तेरे आमंत्रण को स्वीकार करेंगे और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" कहा जाएगा, "क्या तुम इससे पहले क़समें नहीं खाया करते थे कि हमारा तो पतन ही न होगा?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) अपनी उम्मत को क़ियामत के दिन की यातना से डराएँ। उस समय कुफ़्र और शिर्क के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोग कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! हमें मोहलत दे दे और हमसे यातना को टाल दे और हमें थोड़े समय के लिए दुनिया में वापस भेज दे, हम तुझपर ईमान लाएँगे और उन रसूलों का पालन करेंगे, जिन्हें तूने हमारी ओर भेजा था। तब उन्हें फटकार लगाते हुए जवाब दिया जाएगा : क्या तुमने दुनिया के जीवन में, मरणोपरांत पुनर्जीवित किए जाने का इनकार करते हुए यह क़सम नहीं खाई थी कि तुम्हें दुनिया के जीवन से आख़िरत की ओर स्थानांतरित नहीं होना है?!
आयत 45
وَسَكَنتُمْ فِى مَسَـٰكِنِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَتَبَيَّنَ لَكُمْ كَيْفَ فَعَلْنَا بِهِمْ وَضَرَبْنَا لَكُمُ ٱلْأَمْثَالَ
وَسَكَنتُمْ
और ठहरे रहे तुम
فِى
in
مَسَـٰكِنِ
घरों में
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟
ज़ुल्म किया
أَنفُسَهُمْ
अपनी जानों पर
وَتَبَيَّنَ
और वाज़ेह हो गया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
كَيْفَ
कैसा
فَعَلْنَا
किया हमने (सुलूक)
بِهِمْ
साथ उनके
وَضَرَبْنَا
और बयान कर दीं हमने
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَمْثَالَ
मिसालें
तुम लोगों की बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया था और तुमपर अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका था कि उनके साथ हमने कैसा मामला किया और हमने तुम्हारे लिए कितनी ही मिशालें बयान की थी।"
तफ़्सीर:
और तुम अपने से पहले के उन समुदायों के रहने की जगहों में उतरे, जिन्होंने अल्लाह का इनकार करके अपने आप पर अत्याचार किया था, जैसे हूद और सालेह के समुदाय। और तुम्हारे लिए स्पष्ट हो गया कि हमने अन्हें कैसे विनष्ट किया और हमने अल्लाह की किताब में तुम्हारे लिए उदाहरण प्रस्तुत किए, ताकि तुम उपदेश ग्रहण करो, परन्तु तुमने उनसे उपदेश ग्रहण नहीं किया।
आयत 46
وَقَدْ مَكَرُوا۟ مَكْرَهُمْ وَعِندَ ٱللَّهِ مَكْرُهُمْ وَإِن كَانَ مَكْرُهُمْ لِتَزُولَ مِنْهُ ٱلْجِبَالُ
وَقَدْ
और तहक़ीक़
مَكَرُوا۟
उन्होंने चाल चली
مَكْرَهُمْ
अपनी चाल
وَعِندَ
और पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَكْرُهُمْ
उनकी चाल (का तोड़)
وَإِن
और नहीं
كَانَ
थी
مَكْرُهُمْ
चाल उनकी
لِتَزُولَ
कि टल जाऐं
مِنْهُ
उससे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
वे अपनी चाल चल चुक हैं। अल्लाह के पास भी उनके लिए चाल मौजूद थी, यद्यपि उनकी चाल ऐसी ही क्यों न रही हो जिससे पर्वत भी अपने स्थान से टल जाएँ
तफ़्सीर:
अत्याचारी संप्रदायों के रहने के स्थानों में उतरने वाले इन लोगों ने अल्लाह के नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या करने और आपके आमंत्रण (मिशन) को समाप्त करने की साज़िश रची। हालाँकि अल्लाह उनके उपाय से अवगत है, उससे कोई बात छिपी नहीं है। तथा इन लोगों का उपाय बहुत कमज़ोर है। चुनाँचे वह कमज़ोर होने के कारण पर्वत को या उसके अलावा किसी चीज़ को उसके स्थान से नहीं टाल सकता। जबकि उनके साथ अल्लाह के उपाय का मामला इसके विपरीत है।
आयत 47
فَلَا تَحْسَبَنَّ ٱللَّهَ مُخْلِفَ وَعْدِهِۦ رُسُلَهُۥٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌۭ ذُو ٱنتِقَامٍۢ
فَلَا
तो ना
تَحْسَبَنَّ
तुम हरगिज़ समझो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
مُخْلِفَ
ख़िलाफ़ करने वाला
وَعْدِهِۦ
अपने वादे का
رُسُلَهُۥٓ ۗ
अपने रसूलों से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌۭ
बहुत ज़बरदस्त है
ذُو
Owner (of) Retribution
ٱنتِقَامٍۢ
इन्तिक़ाम लेने वाला है
अतः यह न समझना कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए अपने वादे के विरुद्ध जाएगा। अल्लाह तो अपार शक्तिवाला, प्रतिशोधक है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप हरगिज़ यह न समझें कि अल्लाह, जिसने अपने रसूलों से विजय और धर्म को प्रभुत्व प्रदान करने का वादा किया था, रसूलों से अपने किए हुए वादे के ख़िलाफ़ करने वाला है। निःसंदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी चीज़ का ज़ोर नहीं चलता और वह अपने दोस्तों को अवश्य प्रभुत्व प्रदान करेगा। वह अपने दुश्मनों तथा अपने रसूलों के दुश्मनों से सख़्त बदला लेने वाला है।
आयत 48
يَوْمَ تُبَدَّلُ ٱلْأَرْضُ غَيْرَ ٱلْأَرْضِ وَٱلسَّمَـٰوَٰتُ ۖ وَبَرَزُوا۟ لِلَّهِ ٱلْوَٰحِدِ ٱلْقَهَّارِ
يَوْمَ
जिस दिन
تُبَدَّلُ
बदल दी जाएगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
غَيْرَ
सिवाय
ٱلْأَرْضِ
इस ज़मीन के
وَٱلسَّمَـٰوَٰتُ ۖ
और आसमान (भी)
وَبَرَزُوا۟
और वो सामने आ जाऐंगे
لِلَّهِ
अल्लाह के
ٱلْوَٰحِدِ
जो अकेला है
ٱلْقَهَّارِ
बहुत ज़बरदस्त है
जिस दिन यह धरती दूसरी धरती से बदल दी जाएगी और आकाश भी। और वे सब के सब अल्लाह के सामने खुलकर आ जाएँगे, जो अकेला है, सबपर जिसका आधिपत्य है
तफ़्सीर:
काफ़िरों से यह बदला क़ियामत के दिन लिया जाएगा, जिस दिन इस धरती को एक अन्य शुद्ध सफेद धरती से बदल दिया जाएगा, और आसमानों को दूसरे आसमानों से बदल दिया जाएगा। और लोग अपनी क़ब्रों से अपने शरीर और कर्मों के साथ प्रकट होंगे, उस अल्लाह के सामने खड़े होने के लिए, जो अपने राज्य और अपनी महिमा में अकेला है, ऐसा प्रभुत्वशाली है, जो सबको पराजित करता है और उसे पराजित नहीं किया जा सकता, तथा सब पर उसका प्रभुत्व है और उसपर किसी का प्रभुत्व नहीं हो सकता।
आयत 49
وَتَرَى ٱلْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍۢ مُّقَرَّنِينَ فِى ٱلْأَصْفَادِ
وَتَرَى
और आप देखेंगे
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों को
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
مُّقَرَّنِينَ
जकड़े हुए होंगे
فِى
in
ٱلْأَصْفَادِ
बेड़ियों में
और उस दिन तुम अपराधियों को देखोगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जिस दिन इस धरती को दूसरी धरती से बदल दिया जाएगा और आकाशों को बदल दिया जाएगा, उस दिन आप काफ़िरों और मुश्रिकों को देखेंगे कि एक-दूसरे के साथ बेड़ियों में जकड़े हुए होंगे। उनके हाथ और पैर जंजीरों के साथ उनके गले में बाँध दिए जाएँगे। उनके कपड़े जो वे पहनेंगे, तारकोल (एक अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ) के बने होंगे। और उनके विकृत चेहरे आग से झुलस रहे होंगे।
आयत 50
سَرَابِيلُهُم مِّن قَطِرَانٍۢ وَتَغْشَىٰ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ
سَرَابِيلُهُم
कुर्ते उनके
مِّن
of
قَطِرَانٍۢ
तारकोल के होंगे
وَتَغْشَىٰ
और ढाँपे हुए होगी
وُجُوهَهُمُ
उनके चेहरों को
ٱلنَّارُ
आग
उनके परिधान तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों पर छा रही होगी,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जिस दिन इस धरती को दूसरी धरती से बदल दिया जाएगा और आकाशों को बदल दिया जाएगा, उस दिन आप काफ़िरों और मुश्रिकों को देखेंगे कि एक-दूसरे के साथ बेड़ियों में जकड़े हुए होंगे। उनके हाथ और पैर जंजीरों के साथ उनके गले में बाँध दिए जाएँगे। उनके कपड़े जो वे पहनेंगे, तारकोल (एक अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ) के बने होंगे। और उनके विकृत चेहरे आग से झुलस रहे होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ज़ालिमों के अंजाम से खबरदार किया गया है। यह हमें सिखाता है कि ज़ुल्म करने वाले को मोहलत मिलना उसकी माफी नहीं, बल्कि सज़ा टलना है।
आयत 51
لِيَجْزِىَ ٱللَّهُ كُلَّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
لِيَجْزِىَ
ताकि बदला दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
كُلَّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स को
مَّا
उसका जो
كَسَبَتْ ۚ
उसने कमाई की
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
ताकि अल्लाह प्रत्येक जीव को उसकी कमाई का बदला दे। निश्चय ही अल्लाह जल्द हिसाब लेनेवाला है
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह हर प्राणी को उसका बदला दे, जो भी उसने अच्छा या बुरा किया है। निःसंदेह अल्लाह कार्यों का शीघ्र हिसाब लेने वाला है।
आयत 52
هَـٰذَا بَلَـٰغٌۭ لِّلنَّاسِ وَلِيُنذَرُوا۟ بِهِۦ وَلِيَعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَا هُوَ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ وَلِيَذَّكَّرَ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ
هَـٰذَا
ये
بَلَـٰغٌۭ
पैग़ाम है
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَلِيُنذَرُوا۟
और ताकि वो डराए जाऐं
بِهِۦ
साथ उसके
وَلِيَعْلَمُوٓا۟
और ताकि वो जान लें
أَنَّمَا
बेशक
هُوَ
वो
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ
एक ही
وَلِيَذَّكَّرَ
और ताकि नसीहत पकड़ें
أُو۟لُوا۟
men
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वाले
यह लोगों को सन्देश पहुँचा देना है (ताकि वे इसे ध्यानपूर्वक सुनें) और ताकि उन्हें इसके द्वारा सावधान कर दिया जाए और ताकि वे जान लें कि वही अकेला पूज्य है और ताकि वे सचेत हो जाएँ, तो बुद्धि और समझ रखते है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से लोगों को सूचना देना (एक संदेश) है। और ताकि उन्हें इसमें मौजूद गंभीर धमकियों और भयभीत करने वाली चीज़ों से डराया जाए, और ताकि वे यह जान लें कि सत्य पूज्य अकेला अल्लाह ही है, फिर वे उसकी इबादत करें और उसके साथ किसी को साझी न बनाएँ। और ताकि सद्बुद्धि वाले लोग इससे सीख लें। क्योंकि वही लोग हैं जो उपदेशों और पाठों से लाभान्वित होते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को पूरी इंसानियत के लिए एक पैगाम बताने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन की तालीम पूरी इंसानियत के लिए नसीहत और अक्ल वालों के लिए याद-दहानी है।
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