सूरह अल-फ़ुरक़ान سورة الفرقان
मक्की 77 आयतें
नाम का मतलब
फुरकान (हक और बातिल में फर्क करने वाला, कुरआन की एक सिफत)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-फुरकान में कुरआन को हक-बातिल में फर्क करने वाला (फुरकान) कहा गया है। इसमें मुशरिकों के ऐतराज़ात का जवाब और रहमान के सच्चे बंदों की सिफात बयान हुई हैं।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह के आखिर में रहमान के बंदों की सिफात बयान की गई हैं, जो एक आदर्श मुसलमान के किरदार की बेहतरीन मिसाल मानी जाती हैं।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ تَبَارَكَ ٱلَّذِى نَزَّلَ ٱلْفُرْقَانَ عَلَىٰ عَبْدِهِۦ لِيَكُونَ لِلْعَـٰلَمِينَ نَذِيرًا
تَبَارَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱلَّذِى
वो जिसने
نَزَّلَ
नाज़िल किया
ٱلْفُرْقَانَ
फ़ुरक़ान
عَلَىٰ
upon
عَبْدِهِۦ
अपने बन्दे पर
لِيَكُونَ
ताकि वो हो जाए
لِلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
نَذِيرًا
डराने वाला
बड़ी बरकतवाला है वह जिसने यह फ़ुरक़ान अपने बन्दे पर अवतरित किया, ताकि वह सारे संसार के लिए सावधान करनेवाला हो
तफ़्सीर:
उस अस्तित्व की भलाई बहुत अधिक और बहुल है, जिसने अपने बंदे और रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सत्य और असत्य के बीच अंतर करने वाला क़ुरआन उतारा, ताकि वह मानव जाति और जिन्न की ओर, उन्हें अल्लाह की यातना से डराने वाला रसूल हो जाए।
आयत 2
ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًۭا وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ شَرِيكٌۭ فِى ٱلْمُلْكِ وَخَلَقَ كُلَّ شَىْءٍۢ فَقَدَّرَهُۥ تَقْدِيرًۭا
ٱلَّذِى
वो जो
لَهُۥ
उसी के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَلَمْ
और नहीं
يَتَّخِذْ
उसने बनाई
وَلَدًۭا
कोई औलाद
وَلَمْ
और नहीं
يَكُن
है
لَّهُۥ
उसके लिए
شَرِيكٌۭ
कोई शरीक
فِى
in
ٱلْمُلْكِ
बादशाहत में
وَخَلَقَ
और उसने पैदा किया
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
فَقَدَّرَهُۥ
पस उसने अन्दाज़ा किया उसका
تَقْدِيرًۭا
अन्दाज़ा करना
वह जिसका राज्य है आकाशों और धरती पर, और उसने न तो किसी को अपना बेटा बनाया और न राज्य में उसका कोई साझी है। उसने हर चीज़ को पैदा किया; फिर उसे ठीक अन्दाजें पर रखा
तफ़्सीर:
वह अस्तित्व कि केवल उसी के लिए आकाशों और धरती का राज्य है। उसने कोई संतान नहीं बनाई। और उसके राज्य में कभी उसका कोई शरीक नहीं रहा है। तथा उसने सारी चीज़ों को पैदा किया, और अपने ज्ञान एवं हिकमत के अनुसार उनकी रचना का ऐसा अंदाज़ा नियत किया, जो उनके लिए उपयुक्त हो।
आयत 3
وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةًۭ لَّا يَخْلُقُونَ شَيْـًۭٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ وَلَا يَمْلِكُونَ لِأَنفُسِهِمْ ضَرًّۭا وَلَا نَفْعًۭا وَلَا يَمْلِكُونَ مَوْتًۭا وَلَا حَيَوٰةًۭ وَلَا نُشُورًۭا
وَٱتَّخَذُوا۟
और उन्होंने बना लिए
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
ءَالِهَةًۭ
कुछ इलाह
لَّا
not
يَخْلُقُونَ
नहीं वो पैदा करते
شَيْـًۭٔا
कोई चीज़
وَهُمْ
और वो
يُخْلَقُونَ
वो पैदा किए जाते हैं
وَلَا
और नहीं
يَمْلِكُونَ
वो इख़्तियार रखते
لِأَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों के लिए
ضَرًّۭا
किसी नुक़्सान का
وَلَا
और ना
نَفْعًۭا
किसी नफ़ा का
وَلَا
और नहीं
يَمْلِكُونَ
वो इख़्तियार रखते
مَوْتًۭا
मौत का
وَلَا
और ना
حَيَوٰةًۭ
ज़िन्दगी का
وَلَا
और ना
نُشُورًۭا
दोबारा जी उठने का
फिर भी उन्होंने उससे हटकर ऐसे इष्ट -पूज्य बना लिए जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते, बल्कि वे स्वयं पैदा किए जाते है। उन्हें न तो अपनी हानि का अधिकार प्राप्त है और न लाभ का। और न उन्हें मृत्यु का अधिकार प्राप्त है और न जीवन का और न दोबारा जीवित होकर उठने का
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने अल्लाह को छोड़कर ऐसे पूज्य बना लिए, जो कोई भी छोटी या बड़ी चीज़ नहीं पैदा कर सकते। बल्कि वे स्वयं पैदा किए जाते हैं। अल्लाह ने उन्हें अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान किया है। वे अपने किसी हानि को दूर करने, या अपने लिए कोई लाभ प्राप्त करने की भी शक्ति नहीं रखते। वे न किसी जीवित को मार सकते और न किसी मृत को जीवित कर सकते। तथा वे मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा भी नहीं सकते।
आयत 4
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ إِفْكٌ ٱفْتَرَىٰهُ وَأَعَانَهُۥ عَلَيْهِ قَوْمٌ ءَاخَرُونَ ۖ فَقَدْ جَآءُو ظُلْمًۭا وَزُورًۭا
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये (क़ुरआन)
إِلَّآ
मगर
إِفْكٌ
एक झूठ
ٱفْتَرَىٰهُ
उसने गढ़ लिया उसे
وَأَعَانَهُۥ
और मदद की उसकी
عَلَيْهِ
उस पर
قَوْمٌ
people
ءَاخَرُونَ ۖ
एक दूसरी क़ौम ने
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
جَآءُو
वो लाए
ظُلْمًۭا
ज़ुल्म
وَزُورًۭا
और झूठ
जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है, "यह तो बस मनघड़ंत है जो उसने स्वयं ही घड़ लिया है। और कुछ दूसरे लोगों ने इस काम में उसकी सहायता की है।" वे तो ज़ुल्म और झूठ ही के ध्येय से आए
तफ़्सीर:
और अल्लाह एवं उसके रसूल के साथ कुफ़्र करने वालों ने कहा : यह क़ुरआन केवल एक झूठ है, जिसे मुह़म्मद ने गढ़ लिया है और झूठमूठ अल्लाह से संबद्ध कर दिया है। इसे गढ़ने में अन्य लोगों ने भी उसका साथ दिया है। निश्चय इन काफ़िरों ने एक असत्य बात गढ़ी है। क्योंकि क़ुरआन अल्लाह की वाणी है। कोई इनसान या जिन्न इस तरह की वाणी कदापि नहीं ला सकता।
आयत 5
وَقَالُوٓا۟ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ٱكْتَتَبَهَا فَهِىَ تُمْلَىٰ عَلَيْهِ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًۭا
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ हैं
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
ٱكْتَتَبَهَا
उसने लिखवा लिया है उन्हें
فَهِىَ
तो वो
تُمْلَىٰ
वो इमला की जाती हैं
عَلَيْهِ
उस पर
بُكْرَةًۭ
सुबह
وَأَصِيلًۭا
और शाम
कहते है, "ये अगलों की कहानियाँ है, जिनको उसने लिख लिया है तो वही उसके पास प्रभात काल और सन्ध्या समय लिखाई जाती है।"
तफ़्सीर:
और इन क़ुरआन को झुठलाने वालों ने कहा : क़ुरआन पहले लोगों की कहानियाँ और उनकी लिखी हुई बे सिर पैर की बातें हैं। मुहम्मद ने उन्हें लिखवा लिया है और वही उनके सामने सुबह-शाम पढ़ी जाती हैं।.
आयत 6
قُلْ أَنزَلَهُ ٱلَّذِى يَعْلَمُ ٱلسِّرَّ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
قُلْ
कह दीजिए
أَنزَلَهُ
नाज़िल किया है उसे
ٱلَّذِى
उसने जो
يَعْلَمُ
जानता है
ٱلسِّرَّ
छुपी बात को
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
कहो, "उसे अवतरित किया है उसने, जो आकाशों और धरती के रहस्य जानता है। निश्चय ही वह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन झुठलाने वालों से कह दें : क़ुरआन को उस अल्लाह ने उतारा है, जो आकाशों और धरती की हर बात को जानता है। क़ुरआन गढ़ा हुआ नहीं है, जैसा कि तुमने दावा किया है। फिर उन्हें तौबा की प्रेरणा देते हुए कहा : अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 7
وَقَالُوا۟ مَالِ هَـٰذَا ٱلرَّسُولِ يَأْكُلُ ٱلطَّعَامَ وَيَمْشِى فِى ٱلْأَسْوَاقِ ۙ لَوْلَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مَلَكٌۭ فَيَكُونَ مَعَهُۥ نَذِيرًا
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
مَالِ
क्या है
هَـٰذَا
इस
ٱلرَّسُولِ
रसूल को
يَأْكُلُ
कि वो खाता है
ٱلطَّعَامَ
खाना
وَيَمْشِى
और वो चलता है
فِى
in
ٱلْأَسْوَاقِ ۙ
बाज़ारों में
لَوْلَآ
क्यों नहीं
أُنزِلَ
उतारा गया
إِلَيْهِ
इस पर
مَلَكٌۭ
कोई फ़रिश्ता
فَيَكُونَ
तो वो होता
مَعَهُۥ
साथ उसके
نَذِيرًا
डराने वाला
उनका यह भी कहना है, "इस रसूल को क्या हुआ कि यह खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है? क्यों न इसकी ओर कोई फ़रिश्ता उतरा कि वह इसके साथ रहकर सावधान करता?
तफ़्सीर:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले मुश्रिकों ने कहा : यह व्यक्ति जो अल्लाह की ओर से रसूल होने का दावा करता है, इसे क्या है कि अन्य लोगों की तरह खाना खाता है और रोज़ी की तलाश में बाज़ारों में चलता-फिरता है? अल्लाह ने इसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों न उतारा, जो इसके साथ रहकर इसकी पुष्टि करता और इसका सहयोग करता?
आयत 8
أَوْ يُلْقَىٰٓ إِلَيْهِ كَنزٌ أَوْ تَكُونُ لَهُۥ جَنَّةٌۭ يَأْكُلُ مِنْهَا ۚ وَقَالَ ٱلظَّـٰلِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلًۭا مَّسْحُورًا
أَوْ
या
يُلْقَىٰٓ
डाला जाता
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
كَنزٌ
कोई ख़ज़ाना
أَوْ
या
تَكُونُ
होता
لَهُۥ
उसके लिए
جَنَّةٌۭ
कोई बाग़
يَأْكُلُ
वो खाता
مِنْهَا ۚ
उसमें से
وَقَالَ
और कहा
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़लिमों ने
إِن
नहीं
تَتَّبِعُونَ
तुम पैरवी करते
إِلَّا
मगर
رَجُلًۭا
एक मर्द की
مَّسْحُورًا
जो सहरज़दा है
या इसकी ओर कोई ख़ज़ाना ही डाल दिया जाता या इसके पास कोई बाग़ होता, जिससे यह खाता।" और इन ज़ालिमों का कहना है, "तुम लोग तो बस एक ऐसे व्यक्ति के पीछे चल रहे हो जो जादू का मारा हुआ है!"
तफ़्सीर:
या उसपर आकाश से कोई खज़ाना उतारा जाता, या उसके पास कोई बाग़ होता, जिसके वह फल खाता और रोज़ी की तलाश में बाज़ारों के चक्कर लगाने से बच जाता। तथा इन ज़ालिमों ने यह भी कहा : (ऐ मोमिनो!) तुम किसी रसूल का पालन नहीं करते। बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का अनुसरण कर रहे हो, जो जादू के असर से विवेकहीन हो गया है।
आयत 9
ٱنظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا۟ لَكَ ٱلْأَمْثَـٰلَ فَضَلُّوا۟ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ سَبِيلًۭا
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
ضَرَبُوا۟
उन्होंने बयान कीं
لَكَ
आपके लिए
ٱلْأَمْثَـٰلَ
मिसालें
فَضَلُّوا۟
तो वो भटक गए
فَلَا
पस नहीं
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते
سَبِيلًۭا
रास्ते की
देखों, उन्होंने तुमपर कैसी-कैसी फब्तियाँ कसीं। तो वे बहक गए है। अब उनमें इसकी सामर्थ्य नहीं कि कोई मार्ग पा सकें!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उनका यह आश्चर्यजनक रवैया देखिए कि उन्होंने कैसे आपके बारे में झूठी और बेबुनियाद बातें की हैं। चुनाँचे कभी उन्होंने आपको जादूगर कहा, कभी कहा कि आप जादू से प्रभावित हैं तथा कभी आपको पागल और दीवाना कहा। यही कारण है कि वे सत्य से भटक गए और अब वे हिदायत का मार्ग नहीं अपना सकते, तथा आपकी सच्चाई और अमानतदारी पर वार करने का भी कोई रास्ता नहीं पा सकते।
आयत 10
تَبَارَكَ ٱلَّذِىٓ إِن شَآءَ جَعَلَ لَكَ خَيْرًۭا مِّن ذَٰلِكَ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ وَيَجْعَل لَّكَ قُصُورًۢا
تَبَارَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱلَّذِىٓ
वो जो
إِن
अगर
شَآءَ
वो चाहे
جَعَلَ
वो बना दे
لَكَ
आपके लिए
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّن
than
ذَٰلِكَ
उस से
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात
تَجْرِى
बहती हों
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
وَيَجْعَل
और वो बना दे
لَّكَ
आपके लिए
قُصُورًۢا
महल्लात
बरकतवाला है वह जो यदि चाहे तो तुम्हारे लिए इससे भी उत्तम प्रदान करे, बहत-से बाग़ जिनके नीचे नहरें बह रही हों, और तुम्हारे लिए बहुत-से महल तैया कर दे
तफ़्सीर:
बहुत बरकत वाला है वह अल्लाह, जो यदि चाहे तो आपको उससे उत्तम चीज़ें प्रदान कर दे, जो उन्होंने आपके लिए प्रस्तावित किया है। इस प्रकार कि वह आपके लिए दुनिया में ऐसे बाग़ बना दे, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हों, जिनके आप फल खाएँ, और आपके लिए ऐसे महल बना दे, जिनमें आप सुख-सुविधा के साथ रहें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की अज़मत और कुफ्फार के ऐतराज़ात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक बात पर बेबुनियाद ऐतराज़ करने वालों को दलील से जवाब देना चाहिए, घबराने की ज़रूरत नहीं।
आयत 11
بَلْ كَذَّبُوا۟ بِٱلسَّاعَةِ ۖ وَأَعْتَدْنَا لِمَن كَذَّبَ بِٱلسَّاعَةِ سَعِيرًا
بَلْ
बल्कि
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِٱلسَّاعَةِ ۖ
घड़ी / क़यामत को
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखी है हमने
لِمَن
उसके लिए जो
كَذَّبَ
झुठलाए
بِٱلسَّاعَةِ
घड़ी /क़यामत को
سَعِيرًا
भड़कती आग
नहीं, बल्कि बात यह है कि वे लोग क़ियामत की घड़ी को झुठला चुके है। और जो उस घड़ी को झुठला दे, उसके लिए दहकती आग तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
उन्होंने ये बातें सत्य की खोज और प्रमाण की तलाश में नहीं कही हैं, बल्कि असल बात यह है कि उन्होंने क़ियामत के दिन को झुठलाया है। और हमने उस आदमी के लिए जो क़ियामत के दिन को झुठलाए, एक बहुत बड़ी अत्यंत भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है।
आयत 12
إِذَا رَأَتْهُم مِّن مَّكَانٍۭ بَعِيدٍۢ سَمِعُوا۟ لَهَا تَغَيُّظًۭا وَزَفِيرًۭا
إِذَا
जब
رَأَتْهُم
वो देखेगी उन्हें
مِّن
from
مَّكَانٍۭ
जगह से
بَعِيدٍۢ
दूर की
سَمِعُوا۟
वो सुनेंगे
لَهَا
उसकी
تَغَيُّظًۭا
सख़्त ग़ुस्से की आवाज़
وَزَفِيرًۭا
और चीख़ना चिल्लाना
जब वह उनको दूर से देखेगी तो वे उसके बिफरने और साँस खींचने की आवाज़ें सुनेंगे
तफ़्सीर:
जब जहन्नम काफ़िरों को देखेगी, जबकि वे एक दूर स्थान से उसकी ओर हाँककर ले जाए जा रहे होंगे, तो वे उसे ज़ोर से उबलते हुए, और उनपर उसके क्रोध की तीव्रता के कारण एक आकुल करने वाली आवाज़ सुनेंगे।
आयत 13
وَإِذَآ أُلْقُوا۟ مِنْهَا مَكَانًۭا ضَيِّقًۭا مُّقَرَّنِينَ دَعَوْا۟ هُنَالِكَ ثُبُورًۭا
وَإِذَآ
और जब
أُلْقُوا۟
वो डाले जाऐंगे
مِنْهَا
उसमें
مَكَانًۭا
किसी जगह पर
ضَيِّقًۭا
तंग
مُّقَرَّنِينَ
जकड़े हुए
دَعَوْا۟
वो पुकारेंगे
هُنَالِكَ
उस जगह
ثُبُورًۭا
हलाकत को
और जब वे उसकी किसी तंग जगह जकड़े हुए डाले जाएँगे, तो वहाँ विनाश को पुकारने लगेंगे
तफ़्सीर:
और जब इन काफ़िरों को जहन्नम के एक तंग स्थान में, उनके हाथों को गरदनों के साथ मिलाकर ज़ंजीरों से बाँधकर फेंका जाएगा, तो वे उससे छुटकारा पाने की आशा में ख़ुद के लिए विनाश का आह्वान करेंगे।
आयत 14
لَّا تَدْعُوا۟ ٱلْيَوْمَ ثُبُورًۭا وَٰحِدًۭا وَٱدْعُوا۟ ثُبُورًۭا كَثِيرًۭا
لَّا
(Do) not
تَدْعُوا۟
ना तुम पुकारो
ٱلْيَوْمَ
आज
ثُبُورًۭا
हलाकत
وَٰحِدًۭا
एक ही
وَٱدْعُوا۟
बल्कि पुकारो
ثُبُورًۭا
हलाकतें
كَثِيرًۭا
बहुत सी
(कहा जाएगा,) "आज एक विनाश को मत पुकारो, बल्कि बहुत-से विनाशों को पुकारो!"
तफ़्सीर:
(ऐ काफ़िरो!) आज एक विनाश को मत पुकारो, बल्कि बहुत अधिक विनाशों को पुकारो। लेकिन तुम्हारी फ़रियाद सुनी नहीं जाएगी, बल्कि तुम दर्दनाक यातना में हमेशा पड़े रहोगे।
आयत 15
قُلْ أَذَٰلِكَ خَيْرٌ أَمْ جَنَّةُ ٱلْخُلْدِ ٱلَّتِى وُعِدَ ٱلْمُتَّقُونَ ۚ كَانَتْ لَهُمْ جَزَآءًۭ وَمَصِيرًۭا
قُلْ
कह दीजिए
أَذَٰلِكَ
क्या ये
خَيْرٌ
बेहतर है
أَمْ
या
جَنَّةُ
जन्नत
ٱلْخُلْدِ
हमेशगी की
ٱلَّتِى
वो जो
وُعِدَ
वादा किए गए
ٱلْمُتَّقُونَ ۚ
मुत्तक़ी लोग
كَانَتْ
है
لَهُمْ
उनके लिए
جَزَآءًۭ
बदला
وَمَصِيرًۭا
और लौटने की जगह
कहो, "यह अच्छा है या वह शाश्वत जन्नत, जिसका वादा डर रखनेवालों से किया गया है? यह उनका बदला और अन्तिम मंज़िल होगी।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उनसे कह दें : क्या यह उक्त यातना, जिसका तुम्हारे सामने वर्णन किया गया है, बेहतर है या अमरता की जन्नत, जिसकी नेमतें सदा उपलब्ध रहेंगी और कभी भी ख़त्म नहीं होंगी? तथा यही वह जन्नत है, जिसका अल्लाह ने अपने मोमिन बंदों से वादा किया है कि वह उनके लिए प्रतिफल और ठिकाना होगी, जहाँ वे क़ियामत के दिन लौटकर जाएँगे।
आयत 16
لَّهُمْ فِيهَا مَا يَشَآءُونَ خَـٰلِدِينَ ۚ كَانَ عَلَىٰ رَبِّكَ وَعْدًۭا مَّسْـُٔولًۭا
لَّهُمْ
उनके लिए है
فِيهَا
उसमें
مَا
जो
يَشَآءُونَ
वो चाहेंगे
خَـٰلِدِينَ ۚ
हमेशा रहने वाले हैं
كَانَ
है
عَلَىٰ
on
رَبِّكَ
आपके रब पर
وَعْدًۭا
एक वादा
مَّسْـُٔولًۭا
पूछा जाने वाला
उनके लिए उसमें वह सबकुछ होगा, जो वे चाहेंगे। उसमें वे सदैव रहेंगे। यह तुम्हारे रब के ज़िम्मे एक ऐसा वादा है जो प्रार्थनीय है
तफ़्सीर:
उनके लिए इस जन्नत में वे सारी नेमतें होंगी, जो वे चाहेंगे। यह अल्लाह पर एक ऐसा वादा है, जिसकी उसके डरने वाले बंदे उससे माँग करेंगे। और अल्लाह का वादा पूरा होकर रहता है। क्योंकि वह अपना वादा कभी नहीं तोड़ता।
आयत 17
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَقُولُ ءَأَنتُمْ أَضْلَلْتُمْ عِبَادِى هَـٰٓؤُلَآءِ أَمْ هُمْ ضَلُّوا۟ ٱلسَّبِيلَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَحْشُرُهُمْ
वो इकट्ठा करेगा उन्हें
وَمَا
और जिनकी
يَعْبُدُونَ
वो इबादत करते हैं
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
فَيَقُولُ
तो वो फ़रमाएगा
ءَأَنتُمْ
क्या तुम ने
أَضْلَلْتُمْ
गुमराह किया तुम ने
عِبَادِى
मेरे बन्दों को
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन सबको
أَمْ
या
هُمْ
वो (ख़ुद)
ضَلُّوا۟
भटक गए थे
ٱلسَّبِيلَ
रास्ते से
और जिस दिन उन्हें इकट्ठा किया जाएगा और उनको भी जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते है, फिर वह कहेगा, "क्या मेरे बन्दों को तुमने पथभ्रष्ट किया था या वे स्वयं मार्ग छोड़ बैठे थे?"
तफ़्सीर:
जिस दिन अल्लाह झुठलाने वाले मुश्रिकों को एकत्र करेगा, तथा उन्हें भी एकत्र करेगा जिनकी वे अल्लाह के सिवा पूजा करते थे। फिर अल्लाह पूज्यों से, उनके पूजकों को फटकार लगाने हेतु, कहेगा : क्या तुमने मेरे बंदों को उन्हें अपनी पूजा का आदेश देकर पथभ्रष्ट किया था, या वे अपने आप भटक गए थे?!
आयत 18
قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ مَا كَانَ يَنۢبَغِى لَنَآ أَن نَّتَّخِذَ مِن دُونِكَ مِنْ أَوْلِيَآءَ وَلَـٰكِن مَّتَّعْتَهُمْ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ نَسُوا۟ ٱلذِّكْرَ وَكَانُوا۟ قَوْمًۢا بُورًۭا
قَالُوا۟
वो कहेंगे
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
مَا
नहीं
كَانَ
था
يَنۢبَغِى
जायज़
لَنَآ
हमारे लिए
أَن
कि
نَّتَّخِذَ
हम बनाते
مِن
besides You
دُونِكَ
तेरे सिवा
مِنْ
any
أَوْلِيَآءَ
कोई दोस्त
وَلَـٰكِن
और लेकिन
مَّتَّعْتَهُمْ
तू ने सामान ज़िन्दगी दिया उन्हें
وَءَابَآءَهُمْ
और उनके आबा ओ अजदाद को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
نَسُوا۟
वो भूल गए
ٱلذِّكْرَ
नसीहत
وَكَانُوا۟
और थे वो
قَوْمًۢا
लोग
بُورًۭا
हलाक होने वाले
वे कहेंगे, "महान और उच्च है तू! यह हमसे नहीं हो सकता था कि तुझे छोड़कर दूसरे संरक्षक बनाएँ। किन्तु हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को अत्यधिक सुख-सामग्री दी, यहाँ तक कि वे अनुस्मृति को भुला बैठे और विनष्ट होनेवाले लोग होकर रहे।"
तफ़्सीर:
वे पूज्य कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! तू इस बात से पवित्र है कि तेरा कोई साझी हो। हमारे लिए यह उचित नहीं था कि तुझे छोड़कर अन्य लोगों को संरक्षक बनाकर उनका संरक्षण ग्रहण करते, तो फिर हम तेरे बंदों से किस तरह आह्वान कर सकते थे कि वे तुझे छोड़कर हमारी पूजा करें?! लेकिन असल बात यह है कि तूने इन मुश्रिकों को दुनिया की सुख-सुविधाएँ प्रदान कीं और इनसे पहले इनके बाप-दादों को भी ढील देने के लिए धन-संपन्नता प्रदान की थी, यहाँ तक कि वे तेरी याद को भूला गए। इसलिए उन्होंने तेरे साथ दूसरों की पूजा की, तथा वे अपने दुर्भाग्य के कारण विनष्ट होने वाले लोग थे।
आयत 19
فَقَدْ كَذَّبُوكُم بِمَا تَقُولُونَ فَمَا تَسْتَطِيعُونَ صَرْفًۭا وَلَا نَصْرًۭا ۚ وَمَن يَظْلِم مِّنكُمْ نُذِقْهُ عَذَابًۭا كَبِيرًۭا
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
كَذَّبُوكُم
उन्होंने झुठलाया तुम्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
تَقُولُونَ
तुम कहते थे
فَمَا
तो नहीं
تَسْتَطِيعُونَ
तुम इस्तिताअत रखते
صَرْفًۭا
फेरने की (आज़ाब को)
وَلَا
और ना
نَصْرًۭا ۚ
मदद की
وَمَن
और जो कोई
يَظْلِم
ज़ुल्म करेगा
مِّنكُمْ
तुम में से
نُذِقْهُ
हम चखाऐंगे उसे
عَذَابًۭا
आज़ाब
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
अतः इस प्रकार वे तुम्हें उस बात में, जो तुम कहते हो झूठा ठहराए हुए है। अब न तो तुम यातना को फेर सकते हो और न कोई सहायता ही पा सकते हो। जो कोई तुममें से ज़ुल्म करे उसे हम बड़ी यातना का मज़ा चखाएँगे
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) तुम्हारे उन पूज्यों ने, जिनकी तुमने अल्लाह के अलावा पूजा की थी, तुम्हें उसमें झूठा ठहरा दिया, जो तुम उनपर दावा करते हो। अतः तुम अपनी अक्षमता के कारण अपने आपसे न यातना टाल सकते हो और न ही अपनी मदद कर सकते हो। तथा (ऐ मोमिनो!) तुम में से जो व्यक्ति अल्लाह का साझी बनाकर अत्याचार करेगा, हम उसे बहुत बड़ी यातना चखाएँगे, जैसा कि हम ऊपर उल्लिखित लोगों को चखा चुके हैं।
आयत 20
وَمَآ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ إِلَّآ إِنَّهُمْ لَيَأْكُلُونَ ٱلطَّعَامَ وَيَمْشُونَ فِى ٱلْأَسْوَاقِ ۗ وَجَعَلْنَا بَعْضَكُمْ لِبَعْضٍۢ فِتْنَةً أَتَصْبِرُونَ ۗ وَكَانَ رَبُّكَ بَصِيرًۭا
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
قَبْلَكَ
आपसे पहले
مِنَ
any
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों में से
إِلَّآ
मगर
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَيَأْكُلُونَ
अलबत्ता खाते थे
ٱلطَّعَامَ
खाना
وَيَمْشُونَ
और वो चलते थे
فِى
in
ٱلْأَسْوَاقِ ۗ
बाज़ारों में
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
بَعْضَكُمْ
तुम्हारे बाज़ को
لِبَعْضٍۢ
बाज़ के लिए
فِتْنَةً
आज़माइश
أَتَصْبِرُونَ ۗ
क्या तुम सब्र करोगे
وَكَانَ
और है
رَبُّكَ
रब आपका
بَصِيرًۭا
ख़ूब देखने वाला
और तुमसे पहले हमने जितने रसूल भी भेजे हैं, वे सब खाना खाते और बाज़ारों में चलते-फिरते थे। हमने तो तुम्हें परस्पर एक को दूसरे के लिए आज़माइश बना दिया है, "क्या तुम धैर्य दिखाते हो?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देखता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले जितने भी रसूल भेजे, वे सभी इनसान थे, जो खाना खाते थे और बाज़ारों में चलते-फिरते थे। अतः इस मामले में आप कोई अनूठे नबी नहीं हैं। तथा (ऐ लोगो!) हमने तुम्हें खुशहाली एवं ग़रीबी तथा स्वास्थ्य एवं बीमारी आदि अलग-अलग अवस्थाओं में रखकर, एक-दूसरे के लिए परीक्षण बनाया है। क्या तुम अपने इस परीक्षण में धैर्य से काम लोगे, कि अल्लाह तुम्हें तुम्हारे धैर्य का प्रतिफल प्रदान करे?! और तुम्हारा रब देख रहा है कि कौन सब्र करता है और कौन सब्र नहीं करता, तथा कौन उसका आज्ञापालन करता है और कौन उसकी अवज्ञा करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के मंज़र का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया में जिन चीज़ों की पूजा या पैरवी की जाती है, कयामत के दिन वही सबसे बड़ी मायूसी का सबब बनेंगी अगर वह गलत हों।
आयत 21
۞ وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ نَرَىٰ رَبَّنَا ۗ لَقَدِ ٱسْتَكْبَرُوا۟ فِىٓ أَنفُسِهِمْ وَعَتَوْ عُتُوًّۭا كَبِيرًۭا
۞ وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
لَا
(do) not
يَرْجُونَ
नहीं वो उम्मीद रखते
لِقَآءَنَا
हमारी मुलाक़ात की
لَوْلَآ
क्यों नहीं
أُنزِلَ
उतारे गए
عَلَيْنَا
हम पर
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
أَوْ
या
نَرَىٰ
हम देखते
رَبَّنَا ۗ
अपने रब को
لَقَدِ
अलबत्ता तहक़ीक़
ٱسْتَكْبَرُوا۟
उन्होंने तकब्बुर किया
فِىٓ
within
أَنفُسِهِمْ
अपने दिलों में
وَعَتَوْ
और उन्होंने सरकशी की
عُتُوًّۭا
सरकशी
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ी
जिन्हें हमसे मिलने की आशंका नहीं, वे कहते है, "क्यों न फ़रिश्ते हमपर उतरे या फिर हम अपने रब को देखते?" उन्होंने अपने जी में बड़ा घमंज किया और बड़ी सरकशी पर उतर आए
तफ़्सीर:
और जो काफ़िर हमसे मिलने की आशा नहीं रखते और हमारी सज़ा से नहीं डरते, उन्होंने कहा : अल्लाह ने हमारे पास फ़रिश्ते क्यों नहीं भेजे, जो हमें मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सत्यता के विषय में बताते, अथवा हम अपने पालनहार को अपनी आँखों से देख लेते और वह हमें इस विषय में सब कुछ बता देता? निश्चित रूप से इन लोगों के दिलों में अहंकार इतना बढ़ गया है कि उसने इन्हें ईमान से रोक दिया है और वे ऐसा कहकर कुफ़्र और सरकशी में सीमा को पार कर चुके हैं।
आयत 22
يَوْمَ يَرَوْنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ لَا بُشْرَىٰ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُجْرِمِينَ وَيَقُولُونَ حِجْرًۭا مَّحْجُورًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
يَرَوْنَ
वो देखेंगे
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
لَا
no
بُشْرَىٰ
नहीं कोई ख़ुशख़बरी
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لِّلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों के लिए
وَيَقُولُونَ
और वो (मुजरिम) कहेंगे
حِجْرًۭا
एक आड़ हो
مَّحْجُورًۭا
मज़बूत
जिस दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे उस दिन अपराधियों के लिए कोई ख़ुशख़बरी न होगी और वे पुकार उठेंगे, "पनाह! पनाह!!"
तफ़्सीर:
जिस दिन काफ़िर लोग फ़रिश्तों को देखेंगे अपनी मौत के समय, क़ब्र की ज़िंदगी में, दोबारा जीवित किए जाते समय तथा उस समय जब वे हिसाब-किताब के लिए धकेलकर ले जाए जाएँगे और जब वे जहन्नम में डाले जाएँगे- तो इन सभी स्थितियों में उनके लिए कोई अच्छी खबर नहीं होगी। जबकि ईमान वालों का मामला इसके विपरीत होगा। तथा फ़रिश्ते उन अपराधियों से कहेंगे : अल्लाह की ओर से तुम्हें कोई खुशख़बरी मिलने वाली नहीं है।
आयत 23
وَقَدِمْنَآ إِلَىٰ مَا عَمِلُوا۟ مِنْ عَمَلٍۢ فَجَعَلْنَـٰهُ هَبَآءًۭ مَّنثُورًا
وَقَدِمْنَآ
और आऐंगे हम
إِلَىٰ
to
مَا
तरफ़ उसके जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
مِنْ
of
عَمَلٍۢ
कोई भी अमल
فَجَعَلْنَـٰهُ
तो हम बना देंगे उसे
هَبَآءًۭ
ग़ुबार
مَّنثُورًا
परागन्दा
हम बढ़ेंगे उस कर्म की ओर जो उन्होंने किया होगा और उसे उड़ती धूल कर देंगे
तफ़्सीर:
तथा काफ़िरों ने इस दुनिया में नेकी और भलाई के जो कार्य किए होंगे, हम उसकी ओर बढ़कर उसे उनके कुफ़्र के कारण उस बिखरी हुई धूल की तरह अमान्य और बेकार कर देंगे, जिसे देखने वाला खिड़की से अंदर आने वाली सूर्य की किरणों में देखता है।
आयत 24
أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ يَوْمَئِذٍ خَيْرٌۭ مُّسْتَقَرًّۭا وَأَحْسَنُ مَقِيلًۭا
أَصْحَـٰبُ
(The) companions
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत वाले
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
خَيْرٌۭ
बेहतर होंगे
مُّسْتَقَرًّۭا
ठिकाने में
وَأَحْسَنُ
और ज़्यादा अच्छे
مَقِيلًۭا
दोपहर गुज़ारने की जगह में
उस दिन जन्नतवाले ठिकाने की दृष्टि से अच्छे होगे और आरामगाह की दृष्टि से भी अच्छे होंगे
तफ़्सीर:
उस दिन जन्नत वाले मोमिन इन काफ़िरों से बेहतर स्थिति और आराम की बेहतर जगह में होंगे। यह उनके अल्लाह पर ईमान और उनके अच्छे कर्मों के कारण होगा।
आयत 25
وَيَوْمَ تَشَقَّقُ ٱلسَّمَآءُ بِٱلْغَمَـٰمِ وَنُزِّلَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ تَنزِيلًا
وَيَوْمَ
और जिस दिन
تَشَقَّقُ
फट जाएगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
بِٱلْغَمَـٰمِ
साथ बादलों के
وَنُزِّلَ
और उतारे जाऐंगे
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
تَنزِيلًا
उतारा जाना
उस दिन आकाश एक बादल के साथ फटेगा और फ़रिश्ते भली प्रकार उतारे जाएँगे
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) उस दिन को याद करें, जब आकाश फट जाएगा और पतले सफ़ेद बादल दिखाई देंगे, तथा फ़रिश्तों को उनकी बड़ी संख्या के कारण निरंतर 'महशर' की भूमि में उतारा जाएगा।
आयत 26
ٱلْمُلْكُ يَوْمَئِذٍ ٱلْحَقُّ لِلرَّحْمَـٰنِ ۚ وَكَانَ يَوْمًا عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ عَسِيرًۭا
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
ٱلْحَقُّ
बरहक़ है
لِلرَّحْمَـٰنِ ۚ
रहमान के लिए
وَكَانَ
और होगा
يَوْمًا
वो दिन
عَلَى
for
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
عَسِيرًۭا
बहुत सख़्त
उस दिन वास्तविक राज्य रहमान का होगा और वह दिन इनकार करनेवालों के लिए बड़ा ही मुश्किल होगा
तफ़्सीर:
उस दिन वास्तविक राज्य एवं हक़ीक़ी बादशाहत केवल 'रहमान' की होगी और वह दिन काफ़िरों के लिए बड़ा कठिन होगा। जबकि ईमान वालों की स्थिति इसके विपरीत होगी। उनके लिए वह बहुत आसान होगा।
आयत 27
وَيَوْمَ يَعَضُّ ٱلظَّالِمُ عَلَىٰ يَدَيْهِ يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى ٱتَّخَذْتُ مَعَ ٱلرَّسُولِ سَبِيلًۭا
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَعَضُّ
दाँतों से काटेगा
ٱلظَّالِمُ
ज़ालिम
عَلَىٰ
[on]
يَدَيْهِ
अपने दोनों हाथों पर
يَقُولُ
वो कहेगा
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
ٱتَّخَذْتُ
बना लेता मैं
مَعَ
साथ
ٱلرَّسُولِ
रसूल के
سَبِيلًۭا
कुछ रास्ता
उस दिन अत्याचारी अत्याचारी अपने हाथ चबाएगा। कहेंगा, "ऐ काश! मैंने रसूल के साथ मार्ग अपनाया होता!
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस दिन को याद करें, जिस दिन अत्याचारी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण न करने के कारण, घोर पछतावे से अपने दोनों हाथ चबाएगा और कहेगा : ऐ काश! मैंने रसूल का उस चीज़ में पालन किया होता जो कुछ वह अपने पालनहार की ओर से लाए थे और उसके साथ उद्धार का मार्ग अपनाया होता।
आयत 28
يَـٰوَيْلَتَىٰ لَيْتَنِى لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًۭا
يَـٰوَيْلَتَىٰ
हाय अफ़सोस मुझ पर
لَيْتَنِى
काश कि मैं
لَمْ
ना
أَتَّخِذْ
मैं बनाता
فُلَانًا
फ़ुलाँ को
خَلِيلًۭا
दिली दोस्त
हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने अमुक व्यक्ति को मित्र न बनाया होता!
तफ़्सीर:
तथा वह बड़े अफसोस के साथ अपने आपको अभिशाप देते हुए कहेगा : हाय मेरा विनाश! काश मैंने फलाँ काफ़िर व्यक्ति को मित्र न बनाया होता।
आयत 29
لَّقَدْ أَضَلَّنِى عَنِ ٱلذِّكْرِ بَعْدَ إِذْ جَآءَنِى ۗ وَكَانَ ٱلشَّيْطَـٰنُ لِلْإِنسَـٰنِ خَذُولًۭا
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَضَلَّنِى
उसने भटका दिया मुझे
عَنِ
from
ٱلذِّكْرِ
ज़िक्र (क़ुरआन) से
بَعْدَ
बाद इसके कि
إِذْ
जब
جَآءَنِى ۗ
वो आया मेरे पास
وَكَانَ
और है
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान को
خَذُولًۭا
छोड़ देने वाला
उसने मुझे भटकाकर अनुस्मृति से विमुख कर दिया, इसके पश्चात कि वह मेरे पास आ चुकी थी। शैतान तो समय पर मनुष्य का साथ छोड़ ही देता है।"
तफ़्सीर:
निश्चय इस काफ़िर मित्र ने मुझे क़ुरआन से भटका दिया, जब कि वह रसूल के माध्यम से मेरे पास पहुँच चुका था। तथा शैतान मनुष्य को हमेशा छोड़ जाने वाला है। जब उसपर कोई मुसीबत आती है, तो उससे किनारा कर लेता है।
आयत 30
وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَـٰرَبِّ إِنَّ قَوْمِى ٱتَّخَذُوا۟ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ مَهْجُورًۭا
وَقَالَ
और कहेगा
ٱلرَّسُولُ
रसूल
يَـٰرَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّ
बेशक
قَوْمِى
मेरी क़ौम ने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिया था
هَـٰذَا
इस
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
مَهْجُورًۭا
छोड़ा हुआ
रसूल कहेगा, "ऐ मेरे रब! निस्संदेह मेरी क़ौम के लोगों ने इस क़ुरआन को व्यर्थ बकवास की चीज़ ठहरा लिया था।"
तफ़्सीर:
तथा उस दिन रसूल अपनी जाति की हालत के बारे में शिकायत करते हुए कहेगा : ऐ मेरे पालनहार! मेरी क़ौम के लोग, जिनकी ओर तूने मुझे भेजा था, इस क़ुरआन को को छोड़कर इससे दूर हो गए थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गुमराह दोस्त पर पछतावे का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दोस्तों का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए, गलत सोहबत आखिरत में पछतावे का सबब बनती है।
आयत 31
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِىٍّ عَدُوًّۭا مِّنَ ٱلْمُجْرِمِينَ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيًۭا وَنَصِيرًۭا
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
جَعَلْنَا
बनाया हमने
لِكُلِّ
for every
نَبِىٍّ
हर नबी के लिए
عَدُوًّۭا
दुश्मन
مِّنَ
among
ٱلْمُجْرِمِينَ ۗ
मुजरिमों में से
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِرَبِّكَ
आपका रब
هَادِيًۭا
हिदायत देने वाला
وَنَصِيرًۭا
और मदद करने वाला
और इसी तरह हमने अपराधियों में से प्रत्यॆक नबी के लिये शत्रु बनाया। मार्गदर्शन और सहायता कॆ लिए तॊ तुम्हारा रब ही काफ़ी है।
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! जिस प्रकार आपको आपके समुदाय द्वारा कष्ट दिया गया और लोगों को आपकी राह से रोका गया, उसी प्रकार हमने आपसे पूर्व नबियों में से प्रत्येक नबी के लिए उसके समुदाय के अपराधियों में से एक दुश्मन बना दिया। तथा आपका रब एक पथ-प्रदर्शक के रूप में पर्याप्त है जो सत्य का मार्गदर्शन करता है, तथा वह एक सहायक के रूप में पर्याप्त है, जो आपके शत्रु के विरुद्ध आपकी सहायता करता है।
आयत 32
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ ٱلْقُرْءَانُ جُمْلَةًۭ وَٰحِدَةًۭ ۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۖ وَرَتَّلْنَـٰهُ تَرْتِيلًۭا
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَوْلَا
क्यों नहीं
نُزِّلَ
नाज़िल किया गया
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरआन
جُمْلَةًۭ
इकट्ठा
وَٰحِدَةًۭ ۚ
एक ही बार
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
لِنُثَبِّتَ
ताकि हम मज़बूत कर दें
بِهِۦ
साथ इसके
فُؤَادَكَ ۖ
दिल आपका
وَرَتَّلْنَـٰهُ
और ठहर-ठहर कर पढ़ा हमने उसे
تَرْتِيلًۭا
ठहर-ठहर कर पढ़ना
और जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है कि "उसपर पूरा क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारा?" ऐसा इसलिए किया गया ताकि हम इसके द्वारा तुम्हारे दिल को मज़बूत रखें और हमने इसे एक उचित क्रम में रखा
तफ़्सीर:
और अल्लाह का इनकार करने वालों ने कहा : यह क़ुरआन रसूल पर एक ही बार में क्यों नहीं उतार दिया गया? इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके क्यों उतारा गया? (अल्लाह कहता है :) हमने क़ुरआन को ऐसे ही थोड़ा-थोड़ा करके इसलिए उतारा, ताकि (ऐ रसूल!) हम समय-समय पर इसे उतारकर आपके दिल को दृढ़ता प्रदान करें। तथा हमने इसे थोड़ा-थोड़ा इसलिए भी उतारा, ताकि इसे समझना और याद करना आसान हो जाए।
आयत 33
وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا
وَلَا
और नहीं
يَأْتُونَكَ
वो लाते आपके पास
بِمَثَلٍ
कोई मिसाल
إِلَّا
मगर
جِئْنَـٰكَ
लाते हैं हम आपके पास
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
وَأَحْسَنَ
और बेहतरीन
تَفْسِيرًا
तफ़सीर/ वज़ाहत को
और जब कभी भी वे तुम्हारे पास कोई आक्षेप की बात लेकर आएँगे तो हम तुम्हारे पास पक्की-सच्ची चीज़ लेकर आएँगे! इस दशा में कि वह स्पष्टीतकरण की स्पष्ट से उत्तम है
तफ़्सीर:
और ये शिर्क करने वाले लोग (ऐ रसूल!) आपके पास कोई प्रस्तावित उदाहरण नहीं लाते, परंतु हम आपके पास उसका सच्चा और सटीक जवाब ले आते हैं तथा आपके सामने उससे बेहतर व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं।
आयत 34
ٱلَّذِينَ يُحْشَرُونَ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ إِلَىٰ جَهَنَّمَ أُو۟لَـٰٓئِكَ شَرٌّۭ مَّكَانًۭا وَأَضَلُّ سَبِيلًۭا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُحْشَرُونَ
इकट्ठे किए जाऐंगे
عَلَىٰ
on
وُجُوهِهِمْ
अपने चेहरों के बल
إِلَىٰ
to
جَهَنَّمَ
तरफ़ जहन्नम के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग
شَرٌّۭ
बदतरीन हैं
مَّكَانًۭا
मक़ाम के ऐतबार से
وَأَضَلُّ
और ज़्यादा भटके हुए
سَبِيلًۭا
रास्ते के ऐतबार से
जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे वही स्थान की दृष्टि से बहुत बुरे है, और मार्ग की दृष्टि से भी बहुत भटके हुए है
तफ़्सीर:
जो लोग क़ियामत के दिन अपने मुख के बल नरक की ओर घसीटकर ले जाए जाएँगे, वही सबसे बुरे स्थान पर हैं; क्योंकि उनका स्थान नरक है। तथा वे सत्य के मार्ग से सबसे अधिक भटके हुए हैं; क्योंकि उनका मार्ग कुफ़्र और पथभ्रष्टता का मार्ग है।
आयत 35
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَجَعَلْنَا مَعَهُۥٓ أَخَاهُ هَـٰرُونَ وَزِيرًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
مَعَهُۥٓ
साथ उसके
أَخَاهُ
उसके भाई
هَـٰرُونَ
हारून को
وَزِيرًۭا
मददगार
हमने मूसा को किताब प्रदान की और उसके भाई हारून को सहायक के रूप में उसके साथ किया
तफ़्सीर:
हमने मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरात प्रदान की तथा उनके साथ उनके भाई हारून (अलैहिस्सलाम) को भी रसूल बना दिया, ताकि वह उनके सहायक बन जाएँ।
आयत 36
فَقُلْنَا ٱذْهَبَآ إِلَى ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا فَدَمَّرْنَـٰهُمْ تَدْمِيرًۭا
فَقُلْنَا
फिर कहा हमने
ٱذْهَبَآ
दोनों जाओ
إِلَى
to
ٱلْقَوْمِ
तरफ़ उस क़ौम के
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
فَدَمَّرْنَـٰهُمْ
तो हलाक कर दिया हमने उन्हें
تَدْمِيرًۭا
हलाक करना
और कहा कि "तुम दोनों उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया है।" अन्ततः हमने उन लोगों को विनष्ट करके रख दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने उन दोनों से कहा कि तुम फ़िरऔन तथा उसके समुदाय के पास जाओ, जिन्होंने मेरी आयतों को झुठलाया। चुनाँचे उन दोनों ने मेरा आज्ञापालन किया और उन लोगों के पास गए और उन्हें अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानने की ओर आमंत्रित किया। परंतु उन्होंने उन दोनों को झुठला दिया, इसलिए हमने उन्हें बुरी तरह नष्ट कर दिया।
आयत 37
وَقَوْمَ نُوحٍۢ لَّمَّا كَذَّبُوا۟ ٱلرُّسُلَ أَغْرَقْنَـٰهُمْ وَجَعَلْنَـٰهُمْ لِلنَّاسِ ءَايَةًۭ ۖ وَأَعْتَدْنَا لِلظَّـٰلِمِينَ عَذَابًا أَلِيمًۭا
وَقَوْمَ
और क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह
لَّمَّا
जब
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
ٱلرُّسُلَ
रसूलों को
أَغْرَقْنَـٰهُمْ
ग़र्क़ कर दिया हमने उन्हें
وَجَعَلْنَـٰهُمْ
और बना दिया हमने उन्हें
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
ءَايَةًۭ ۖ
एक निशानी
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़लिमों के लिए
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
और नूह की क़ौम को भी, जब उन्होंने रसूलों को झुठलाया तो हमने उन्हें डुबा दिया और लोगों के लिए उन्हें एक निशानी बना दिया, और उन ज़ालिमों के लिए हमने एक दुखद यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
और नूह की क़ौम को भी, जब उन्होंने नूह अलैहिस्सलाम को झुठलाकर, सभी रसूलों को झुठलाने का कार्य किया, तो हमने उन्हें समुद्र में डुबाकर नाश कर दिया और उनके विनाश को इस बात की निशानी बना दिया कि हम ज़ालिमों को जड़ से उखाड़ फेंकने की पूरी शक्ति रखते हैं। तथा हमने इन अत्याचारियों के लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है।
आयत 38
وَعَادًۭا وَثَمُودَا۟ وَأَصْحَـٰبَ ٱلرَّسِّ وَقُرُونًۢا بَيْنَ ذَٰلِكَ كَثِيرًۭا
وَعَادًۭا
और आद
وَثَمُودَا۟
और समूद
وَأَصْحَـٰبَ
and (the) dwellers
ٱلرَّسِّ
और कुएँ वाले
وَقُرُونًۢا
और क़ौमें
بَيْنَ
between
ذَٰلِكَ
दर्मियान उनके
كَثِيرًۭا
बहुत सी
और आद और समूद और अर-रस्सवालों और उस बीच की बहुत-सी नस्लों को भी विनष्ट किया।
तफ़्सीर:
तथा हमने विनष्ट कर दिया हूद के समुदाय आद को, सालेह के समुदाय समूद को और कुएँ वालों को। तथा हमने इन तीनों के बीच की अवधि में भी बहुत-से समुदायों को विनष्ट कर दिया।
आयत 39
وَكُلًّۭا ضَرَبْنَا لَهُ ٱلْأَمْثَـٰلَ ۖ وَكُلًّۭا تَبَّرْنَا تَتْبِيرًۭا
وَكُلًّۭا
और हर एक को
ضَرَبْنَا
बयान कीं हमने
لَهُ
उसके लिए
ٱلْأَمْثَـٰلَ ۖ
मिसालें
وَكُلًّۭا
और हर एक को
تَبَّرْنَا
हलाक किया हमने
تَتْبِيرًۭا
हलाक करना
प्रत्येक के लिए हमने मिसालें बयान कीं। अन्ततः प्रत्येक को हमने पूरी तरह विध्वस्त कर दिया
तफ़्सीर:
इन नष्ट किए गए समुदायों में से प्रत्येक समुदाय के समक्ष हमने पिछले समुदायों के विनाश और उसके कारणों का वर्णन किया, ताकि वे उपदेश ग्रहण करें। तथा हमने प्रत्येक समुदाय को उनके कुफ़्र एवं हठ के कारण बुरी तरह नष्ट कर दिया।
आयत 40
وَلَقَدْ أَتَوْا۟ عَلَى ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِىٓ أُمْطِرَتْ مَطَرَ ٱلسَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا۟ يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ نُشُورًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَتَوْا۟
वो आ चुके
عَلَى
upon
ٱلْقَرْيَةِ
उस बस्ती पर
ٱلَّتِىٓ
जिस पर
أُمْطِرَتْ
बरसाई गई थी
مَطَرَ
बारिश
ٱلسَّوْءِ ۚ
बुरी
أَفَلَمْ
क्या भला नहीं
يَكُونُوا۟
थे वो
يَرَوْنَهَا ۚ
वो देखते उसे
بَلْ
बल्कि
كَانُوا۟
थे वो
لَا
not
يَرْجُونَ
ना वो उम्मीद रखते
نُشُورًۭا
जी उठने की
और उस बस्ती पर से तो वे हो आए है जिसपर बुरी वर्षा बरसी; तो क्या वे उसे देखते नहीं रहे हैं? नहीं, बल्कि वे दोबारा जीवित होकर उठने की आशा ही नहीं रखते रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम!) आपके समुदाय के ये झुठलाने वाले लोग - शाम के देश की यात्रा के समय - लूत की जाति की बस्ती के पास से गुज़रते हैं, जिस पर, उसकी अभद्रता की सज़ा के रूप में पत्थरों की वर्षा हुई थी, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें। तो क्या उन्होंने इस बस्ती से आँखें मूंद लीं, इसलिए उन्होंने इसे नहीं देखा? नहीं, बल्कि वे मरने के बाद पुनः जीवित होकर उठने की आशा ही नहीं रखते थे जिसके बाद उनका हिसाब-किताब लिया जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबियों का मज़ाक उड़ाए जाने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर दौर में हक की दावत का मज़ाक उड़ाया गया है, मगर आखिरकार हक ही कामयाब रहा।
आयत 41
وَإِذَا رَأَوْكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَـٰذَا ٱلَّذِى بَعَثَ ٱللَّهُ رَسُولًا
وَإِذَا
और जब
رَأَوْكَ
वो देखते हैं आपको
إِن
नहीं
يَتَّخِذُونَكَ
वो बनाते आपको
إِلَّا
मगर
هُزُوًا
मज़ाक़
أَهَـٰذَا
क्या ये है
ٱلَّذِى
वो जिसे
بَعَثَ
भेजा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
رَسُولًا
रसूल बना कर
वे जब भी तुम्हें देखते हैं तो तुम्हारा मज़ाक़ बना लेते हैं कि "क्या यही, जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है?
तफ़्सीर:
और जब ये झुठलाने वाले (ऐ रसूल!) आपसे मिलते हैं, तो आपका उपहास करते हैं तथा ठट्ठा और इनकार के रूप में कहते हैं : क्या यही है, जिसे अल्लाह ने हमारी ओर रसूल बनाकर भेजा है?!
आयत 42
إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ ءَالِهَتِنَا لَوْلَآ أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ ٱلْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا
إِن
बेशक
كَادَ
वो क़रीब था
لَيُضِلُّنَا
कि वो भटका देता हमें
عَنْ
from
ءَالِهَتِنَا
हमारे इलाहों से
لَوْلَآ
अगर ना होती
أَن
ये (बात) कि
صَبَرْنَا
सब्र करते / जमे रहते हम
عَلَيْهَا ۚ
उन पर
وَسَوْفَ
और अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
حِينَ
जिस वक़्त
يَرَوْنَ
वो देखेंगे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
مَنْ
कि कौन
أَضَلُّ
ज़्यादा भटका हुआ है
سَبِيلًا
रास्ते से
इसने तो हमें भटकाकर हमको हमारे प्रभु-पूज्यों से फेर ही दिया होता, यदि हम उनपर मज़बूती से जम न गए होते।"
तफ़्सीर:
निश्चय यह हमें हमारे देवताओं की पूजा करने से दूर करने वाला था। यदि हम उनकी पूजा करने पर जमे न रहते, तो वह अपने तर्कों और सबूतों के साथ हमें उससे दूर कर देता। तथा जब वे अपनी क़ब्रों में और क़ियामत के दिन अज़ाब देखेंगे, तो जान लेंगे कि कौन सबसे अधिक रास्ते से भटका हुआ था? क्या वे लोग का अथवा रसूल? तथा यह भी जान लेंगे कि उनमें से कौन सबसे ज़्यादा गुमराह था।
आयत 43
أَرَءَيْتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَـٰهَهُۥ هَوَىٰهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا
أَرَءَيْتَ
क्या देखा आपने (उसे)
مَنِ
जिसने
ٱتَّخَذَ
बना लिया
إِلَـٰهَهُۥ
इलाह अपना
هَوَىٰهُ
अपनी ख़्वाहिशे नफ़्स को
أَفَأَنتَ
क्या भला आप
تَكُونُ
आप होंगे
عَلَيْهِ
उस पर
وَكِيلًا
ज़िम्मेदार
क्या तुमने उसको भी देखा, जिसने अपना प्रभु अपनी (तुच्छ) इच्छा को बना रखा है? तो क्या तुम उसका ज़िम्मा ले सकते हो
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल!) आपने उस व्यक्ति को देखा, जिसने अपनी इच्छा को अपना पूज्य बना लिया और उसकी आज्ञा का पालन किया, तो क्या आप उसके संरक्षक होंगे कि उसे ईमान की ओर लौटा लें और उसे कुफ़्र से रोक दें?!
आयत 44
أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَٱلْأَنْعَـٰمِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا
أَمْ
या
تَحْسَبُ
आप समझते हैं
أَنَّ
कि बेशक
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
يَسْمَعُونَ
वो सुनते हैं
أَوْ
या
يَعْقِلُونَ ۚ
वो समझते हैं
إِنْ
नहीं हैं
هُمْ
वो
إِلَّا
मगर
كَٱلْأَنْعَـٰمِ ۖ
जानवरों की तरह
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
أَضَلُّ
ज़्यादा भटके हुए हैं
سَبِيلًا
रास्ते से
या तुम समझते हो कि उनमें अधिकतर सुनते और समझते है? वे तो बस चौपायों की तरह हैं, बल्कि उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट!
तफ़्सीर:
बल्कि, क्या (ऐ रसूल!) आप यह समझते हैं कि जिन लोगों को आप अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसकी आज्ञाकारिता की ओर बुला रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोग आपकी बात को स्वीकार करने के लिए सुनते या तर्कों और प्रमाणों को समझते हैं?! वे सुनने एवं समझने के मामले में पशुओं के समान हैं, बल्कि वे पशुओं से भी अधिक पथभ्रष्ट हैं।
आयत 45
أَلَمْ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيْفَ مَدَّ ٱلظِّلَّ وَلَوْ شَآءَ لَجَعَلَهُۥ سَاكِنًۭا ثُمَّ جَعَلْنَا ٱلشَّمْسَ عَلَيْهِ دَلِيلًۭا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَىٰ
[to]
رَبِّكَ
तरफ़ अपने रब के
كَيْفَ
किस तरह
مَدَّ
उसने फैला दिया
ٱلظِّلَّ
साय को
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
वो चाहता
لَجَعَلَهُۥ
अलबत्ता वो बना देता उसे
سَاكِنًۭا
साकिन / ठहरा हुआ
ثُمَّ
फिर
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلشَّمْسَ
सूरज को
عَلَيْهِ
उस पर
دَلِيلًۭا
दलील/राहनुमा
क्या तुमने अपने रब को नहीं देखा कि कैसे फैलाई छाया? यदि चाहता तो उसे स्थिर रखता। फिर हमने सूर्य को उसका पता देनेवाला बनाया,
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल!) क्या आपने अल्लाह की रचना की निशानियों को नहीं देखा, जब उसने धरती के चेहरे पर छाया फैला दी। यदि वह चाहता कि उसे स्थिर कर दे और वह न हिले, तो निश्चय वह उसे ऐसा ही बनाता। फिर हमने सूर्य को उसका संकेत देने वाला बना दिया, जिसके साथ वह लंबा और छोटा होता है।
आयत 46
ثُمَّ قَبَضْنَـٰهُ إِلَيْنَا قَبْضًۭا يَسِيرًۭا
ثُمَّ
फिर
قَبَضْنَـٰهُ
समेट लिया हमने उसे
إِلَيْنَا
अपनी तरफ़
قَبْضًۭا
समेटना
يَسِيرًۭا
आहिस्ता-आहिस्ता
फिर हम उसको धीरे-धीरे अपनी ओर समेट लेते है
तफ़्सीर:
फिर जैसे-जैसे सूरज बुलंद होता है, हम छाया को धीरे-धीरे कम करते हुए समेट लेते हैं।
आयत 47
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا وَٱلنَّوْمَ سُبَاتًۭا وَجَعَلَ ٱلنَّهَارَ نُشُورًۭا
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात को
لِبَاسًۭا
लिबास
وَٱلنَّوْمَ
और नींद को
سُبَاتًۭا
बाइसे आराम
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
ٱلنَّهَارَ
दिन को
نُشُورًۭا
उठने का वक़्त
वही है जिसने रात्रि को तुम्हारे लिए वस्त्र और निद्रा को सर्वथा विश्राम एवं शान्ति बनाया और दिन को जी उठने का समय बनाया
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही वह हस्ती है, जिसने तुम्हारे लिए रात को वस्त्र के समान बनाया, जो तुम्हें ढाँप लेता है तथा अन्य चीज़ों को छिपाता है। तथा वही है जिसने तुम्हारे लिए नींद को विश्राम बनाया, जिसके आग़ोश में तुम अपने कार्यों से आराम करते हो तथा वही है जिसने दिन को तुम्हारे लिए अपने कामों पर जाने का समय बनाया।
आयत 48
وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ ٱلرِّيَـٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ طَهُورًۭا
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَرْسَلَ
भेजा
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
بُشْرًۢا
ख़ुशख़बरी बना कर
بَيْنَ
आगे-आगे
يَدَىْ
before
رَحْمَتِهِۦ ۚ
अपनी रहमत के
وَأَنزَلْنَا
और उतारा हमने
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
طَهُورًۭا
पाक
और वही है जिसने अपनी दयालुता (वर्षा) के आगे-आगे हवाओं को शुभ सूचना बनाकर भेजता है, और हम ही आकाश से स्वच्छ जल उतारते है
तफ़्सीर:
वही है जिसने हवाओं को बारिश की शुभ सूचना देने वाली बनाकर भेजा, जो अल्लाह की अपने बंदों पर दया में से है। तथा हमने आकाश से बारिश का साफ पानी उतारा, जिससे वे अपने आप को शुद्ध (पाक) करते हैं।
आयत 49
لِّنُحْـِۧىَ بِهِۦ بَلْدَةًۭ مَّيْتًۭا وَنُسْقِيَهُۥ مِمَّا خَلَقْنَآ أَنْعَـٰمًۭا وَأَنَاسِىَّ كَثِيرًۭا
لِّنُحْـِۧىَ
ताकि हम ज़िन्दा करें
بِهِۦ
साथ उसके
بَلْدَةًۭ
शहर
مَّيْتًۭا
मुर्दा को
وَنُسْقِيَهُۥ
और हम पिलाऐं उसे
مِمَّا
उनमें से जो
خَلَقْنَآ
पैदा किए हमने
أَنْعَـٰمًۭا
मवेशी
وَأَنَاسِىَّ
और इन्सान
كَثِيرًۭا
बहुत से
ताकि हम उसके द्वारा निर्जीव भू-भाग को जीवन प्रदान करें और उसे अपने पैदा किए हुए बहुत-से चौपायों और मनुष्यों को पिलाएँ
तफ़्सीर:
ताकि हम उस उतरने वाले पानी से पौधे रहित बंजर भूमि को, विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों के साथ उगाकर और उसमें हरियाली फैलाकर, पुनर्जीवित करें और ताकि उस पानी से हम अपने पैदा किए हुए बहुत-से पशुओं और इनसानों को सेराब करें।
आयत 50
وَلَقَدْ صَرَّفْنَـٰهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا۟ فَأَبَىٰٓ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا كُفُورًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَرَّفْنَـٰهُ
फेर-फेर कर लाए हैं हम उसे
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
لِيَذَّكَّرُوا۟
ताकि वो नसीहत पकड़ें
فَأَبَىٰٓ
तो इन्कार किया
أَكْثَرُ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोगों ने
إِلَّا
सिवाए
كُفُورًۭا
नाशुक्री करने के
उसे हमने उनके बीच विभिन्न ढ़ंग से पेश किया है, ताकि वे ध्यान दें। परन्तु अधिकतर लोगों ने इनकार और अकृतज्ञता के अतिरिक्त दूसरी नीति अपनाने से इनकार ही किया
तफ़्सीर:
हमने क़ुरआन में उन तर्कों और प्रमाणों को विविध रूप से वर्णन किया, ताकि वे सीख ग्रहण करें। परंतु अधिकांश लोगों ने सत्य को नकारने और उससे अनजान बनने ही की नीति अपनाई।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात में अल्लाह की निशानियों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सूरज, चांद, रात-दिन का निज़ाम गौर करने वालों के लिए बड़ी नसीहत है।
आयत 51
وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِى كُلِّ قَرْيَةٍۢ نَّذِيرًۭا
وَلَوْ
और अगर
شِئْنَا
चाहते हम
لَبَعَثْنَا
अलबत्ता भेज देते हम
فِى
in
كُلِّ
every
قَرْيَةٍۢ
हर बस्ती में
نَّذِيرًۭا
एक डराने वाला
यदि हम चाहते तो हर बस्ती में एक डरानेवाला भेज देते
तफ़्सीर:
और यदि हम चाहते तो प्रत्येक बस्ती में उन्हें चेतावनी देने और अल्लाह की सज़ा से डराने के लिए एक रसूल भेज देते। लेकिन हमने ऐसा नहीं चाहा। बल्कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सभी लोगों के लिए रसूल बनाकर भेज दिया।
आयत 52
فَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَجَـٰهِدْهُم بِهِۦ جِهَادًۭا كَبِيرًۭا
فَلَا
तो ना
تُطِعِ
आप इताअत कीजिए
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
وَجَـٰهِدْهُم
और जिहाद कीजिए उनसे
بِهِۦ
साथ इसके
جِهَادًۭا
जिहाद
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
अतः इनकार करनेवालों की बात न मानता और इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे जिहाद करो, बड़ा जिहाद! (जी तोड़ कोशिश)
तफ़्सीर:
अतः आप काफ़िरों की उनके साथ नरमी करने की माँग और उनके दिए गए सुझावों को न मानें। तथा अपने ऊपर अवतरित इस क़ुरआन के द्वारा उनसे बड़ा जिहाद (संघर्ष) करें, उनके कष्ट पर धैर्य रखते हुए तथा उन्हें अल्लाह की ओर बुलाने में कठिनाइयों को सहते हुए।
आयत 53
۞ وَهُوَ ٱلَّذِى مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ هَـٰذَا عَذْبٌۭ فُرَاتٌۭ وَهَـٰذَا مِلْحٌ أُجَاجٌۭ وَجَعَلَ بَيْنَهُمَا بَرْزَخًۭا وَحِجْرًۭا مَّحْجُورًۭا
۞ وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
مَرَجَ
मिला दिया
ٱلْبَحْرَيْنِ
दो समुन्दरों को
هَـٰذَا
ये
عَذْبٌۭ
मीठा है
فُرَاتٌۭ
ख़ुश मज़ा
وَهَـٰذَا
और ये
مِلْحٌ
नमकीन है
أُجَاجٌۭ
कड़वा
وَجَعَلَ
और उसने बना दिया
بَيْنَهُمَا
उन दोनों के दर्मियान
بَرْزَخًۭا
एक परदा
وَحِجْرًۭا
और एक आड़
مَّحْجُورًۭا
मज़बूत
वही है जिसने दो समुद्रों को मिलाया। यह स्वादिष्ट और मीठा है और यह खारी और कडुआ। और दोनों के बीच उसने एक परदा डाल दिया है और एक पृथक करनेवाली रोक रख दी है
तफ़्सीर:
पवित्र अल्लाह ही है, जिसने दो समुद्रों के पानी को मिला दिया। उसने उनमें से मीठे को नमकीन के साथ मिलाया और उन दोनों के बीच एक पर्दा और मज़बूत आड़ बना दिया, जो दोनों के पानी को आपस में मिलने से रोकता है।
आयत 54
وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ مِنَ ٱلْمَآءِ بَشَرًۭا فَجَعَلَهُۥ نَسَبًۭا وَصِهْرًۭا ۗ وَكَانَ رَبُّكَ قَدِيرًۭا
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
مِنَ
from
ٱلْمَآءِ
पानी से
بَشَرًۭا
एक इन्सान को
فَجَعَلَهُۥ
फिर उसने बना दिया उसे
نَسَبًۭا
नसब
وَصِهْرًۭا ۗ
और ससुराल (वाला)
وَكَانَ
और है
رَبُّكَ
रब आपका
قَدِيرًۭا
बहुत क़ुदरत वाला
और वही है जिसने पानी से एक मनुष्य पैदा किया। फिर उसे वंशगत सम्बन्धों और ससुराली रिश्तेवाला बनाया। तुम्हारा रब बड़ा ही सामर्थ्यवान है
तफ़्सीर:
वही है, जिसने पुरुष एवं स्त्री के वीर्य से मनुष्य को पैदा किया। तथा जिसने मनुष्यों को पैदा किया, उसने उनके बीच वंशगत रिश्ता तथा ससुराली रिश्ता बनाया। और (ऐ रसूल!) आपका पालनहार सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती। उसकी शक्ति का एक प्रतीक यह है कि उसने पुरुष एवं स्त्री के वीर्य से मनुष्य को पैदा किया।
आयत 55
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمْ وَلَا يَضُرُّهُمْ ۗ وَكَانَ ٱلْكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِۦ ظَهِيرًۭا
وَيَعْبُدُونَ
और वो इबादत करते हैं
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उनकी जो
لَا
not profits them
يَنفَعُهُمْ
ना वो नफ़ा दे सकते हैं उन्हें
وَلَا
और ना
يَضُرُّهُمْ ۗ
वो नुक़्सान दे सकते हैं उन्हें
وَكَانَ
और है
ٱلْكَافِرُ
काफ़िर
عَلَىٰ
against
رَبِّهِۦ
ख़िलाफ़ अपने रब के
ظَهِيرًۭا
मददगार
अल्लाह से इतर वे उनको पूजते है जो न उन्हें लाभ पहुँचा सकते है और न ही उन्हें हानि पहुँचा सकते है। और ऊपर से यह भी कि इनकार करनेवाला अपने रब का विरोधी और उसके मुक़ाबले में दूसरों का सहायक बना हुआ है
तफ़्सीर:
ये काफ़िर लोग अल्लाह के अलावा उन मूर्तियों की पूजा करते हैं, जो उनकी आज्ञा मानने से उन्हें लाभ नहीं देती हैं और यदि वे उनकी अवज्ञा करते हैं तो उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाती हैं। तथा काफ़िर ऐसे कार्यों में शैतान का अनुयायी है, जो अल्लाह को क्रोधित करते हैं।
आयत 56
وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا مُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
إِلَّا
मगर
مُبَشِّرًۭا
ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला (बनाकर)
और हमने तो तुमको शुभ-सूचना देनेवाला और सचेतकर्ता बनाकर भेजा है।
तफ़्सीर:
और हमने (ऐ रसूल!) आपको, ईमान एवं अच्छे कार्यों के द्वारा अल्लाह का आज्ञापालन करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी देने वाला तथा कुफ़्र और पाप के द्वारा उसकी अवज्ञा करने वालों के लिए सावधान करने वाला बनाकर भेजा है।
आयत 57
قُلْ مَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ إِلَّا مَن شَآءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًۭا
قُلْ
कह दीजिए
مَآ
नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं माँगता तुम से
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ
कोई अजर
إِلَّا
मगर
مَن
जो
شَآءَ
चाहे
أَن
कि
يَتَّخِذَ
वो बना ले
إِلَىٰ
to
رَبِّهِۦ
तरफ़ अपने रब के
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
कह दो, "मैं इस काम पर तुमसे कोई बदला नहीं माँगता सिवाय इसके कि जो कोई चाहे अपने रब की ओर ले जानेवाला मार्ग अपना ले।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : मैं तुमसे अल्लाह का संदेश पहुँचाने पर कोई बदला नहीं माँगता। परंतु तुममें से जो व्यक्ति कुछ ख़र्च करके अल्लाह की प्रसन्नता का रास्ता अपनाना चाहे, उसे ऐसा करना चाहिए।
आयत 58
وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْحَىِّ ٱلَّذِى لَا يَمُوتُ وَسَبِّحْ بِحَمْدِهِۦ ۚ وَكَفَىٰ بِهِۦ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرًا
وَتَوَكَّلْ
और तवक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱلْحَىِّ
हमेशा ज़िन्दा रहने वाले पर
ٱلَّذِى
वो जो
لَا
does not die
يَمُوتُ
नहीं मरेगा
وَسَبِّحْ
और तस्बीह बयान कीजिए
بِحَمْدِهِۦ ۚ
साथ उसकी हम्द के
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِهِۦ
उसका
بِذُنُوبِ
गुनाहों से
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों के
خَبِيرًا
ख़ूब बाख़बर होना
और उस अल्लाह पर भरोसा करो जो जीवन्त और अमर है और उसका गुणगान करो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप अपने सभी मामलों में उस नित्य जीवी पर भरोसा कीजिए, जिसे कभी मौत नहीं आएगी और उसकी प्रशंसा करते हुए हर प्रकार की कमी से उसकी पवित्रता बयान कीजिए। वह अपने बंदों के गुनाहों की पूरी ख़बर रखने के लिए काफ़ी है। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 59
ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۚ ٱلرَّحْمَـٰنُ فَسْـَٔلْ بِهِۦ خَبِيرًۭا
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किए
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमान
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है इन दोनों के
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छ: दिनों में
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰ
वो बुलन्द हुआ
عَلَى
over
ٱلْعَرْشِ ۚ
अर्श पर
ٱلرَّحْمَـٰنُ
जो रहमान है
فَسْـَٔلْ
पस पूछिए
بِهِۦ
उसके बारे में
خَبِيرًۭا
किसी ख़ूब ख़बर रखने वाले से
जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के बीच है छह दिनों में पैदा किया, फिर सिंहासन पर विराजमान हुआ। रहमान है वह! अतः पूछो उससे जो उसकी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
जिसने आकाशों तथा धरती और उनके बीच मौजूद सारी वस्तुओं को छह दिनों में पैदा किया। फिर वह अपनी महिमा के योग्य अर्श पर बुलंद हुआ। और वह अत्यंत दयावान् है। अतः (ऐ रसूल!) आप उसके बारे में किसी ज्ञाता से पूछिए। और वह अल्लाह है जो सब कुछ जानता है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 60
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱسْجُدُوا۟ لِلرَّحْمَـٰنِ قَالُوا۟ وَمَا ٱلرَّحْمَـٰنُ أَنَسْجُدُ لِمَا تَأْمُرُنَا وَزَادَهُمْ نُفُورًۭا ۩
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمُ
उन्हें
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान को
قَالُوا۟
वो कहते हैं
وَمَا
और क्या है
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
أَنَسْجُدُ
क्या हम सजदा करें
لِمَا
उसे जो
تَأْمُرُنَا
तुम हुक्म देते हो हमें
وَزَادَهُمْ
और उसने ज़्यादा कर दिया उन्हें
نُفُورًۭا ۩
नफ़रत में
उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहमान को सजदा करो" तो वे कहते है, "और रहमान क्या होता है? क्या जिसे तू हमसे कह दे उसी को हम सजदा करने लगें?" और यह चीज़ उनकी घृणा को और बढ़ा देती है
तफ़्सीर:
और जब काफ़िरों से कहा जाता है कि रह़मान (अत्यंत दयावान्) को सजदा करो, तो वे कहते हैं कि हम रहमान को सजदा नहीं करते और रह़मान क्या चीज़ है? हम उसे नहीं जानते और न ही उसे स्वीकार करते हैं। क्या हम उसे सजदा करने लगें, जिसे सजदा करने का तू हमें आदेश देता है जबकि हम उसे नहीं जानते हैं?! तथा उसका उन्हें सजदा करने के आदेश ने उन्हें अल्लाह पर ईमान लाने से दूरी में और बढ़ा दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पानी की नेमत और रहमान पर भरोसे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मीठे और खारे पानी का फर्क भी अल्लाह की कुदरत की एक बड़ी निशानी है, जिसकी कद्र करनी चाहिए।
आयत 61
تَبَارَكَ ٱلَّذِى جَعَلَ فِى ٱلسَّمَآءِ بُرُوجًۭا وَجَعَلَ فِيهَا سِرَٰجًۭا وَقَمَرًۭا مُّنِيرًۭا
تَبَارَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱلَّذِى
वो जिसने
جَعَلَ
बनाया
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
بُرُوجًۭا
बुर्जों को
وَجَعَلَ
और बनाया
فِيهَا
उसमें
سِرَٰجًۭا
चिराग़ / सूरज
وَقَمَرًۭا
और चाँद को
مُّنِيرًۭا
रौशन
बड़ी बरकतवाला है वह, जिसने आकाश में बुर्ज (नक्षत्र) बनाए और उसमें एक चिराग़ और एक चमकता चाँद बनाया
तफ़्सीर:
बड़ी बरकत वाला है वह, जिसने ग्रहों और गतिमान तारों के लिए आकाश में घर बनाए, तथा आकाश में एक ऐसा सूर्य बनाया जो प्रकाश बिखेरता है, तथा उसमें एक चंद्रमा बनाया जो सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करके धरती को रोशन करता है।
आयत 62
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ خِلْفَةًۭ لِّمَنْ أَرَادَ أَن يَذَّكَّرَ أَوْ أَرَادَ شُكُورًۭا
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाया
ٱلَّيْلَ
रात को
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
خِلْفَةًۭ
एक दूसरे के पीछे आने वाला
لِّمَنْ
उसके लिए जो
أَرَادَ
इरादा करे
أَن
कि
يَذَّكَّرَ
वो नसीहत पकड़े
أَوْ
या
أَرَادَ
वो इरादा करे
شُكُورًۭا
शुक्रगुज़ारी का
और वही है जिसने रात और दिन को एक-दूसरे के पीछे आनेवाला बनाया, उस व्यक्ति के लिए (निशानी) जो चेतना चाहे या कृतज्ञ होना चाहे
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही है, जिसने रात और दिन को एक-दूसरे के आगे-पीछे आने वाला बना दिया, उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह की आयतों से उपदेश ग्रहण करना चाहे ताकि उसे मार्गदर्शन प्राप्त हो, अथवा अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करना चाहे।
आयत 63
وَعِبَادُ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى ٱلْأَرْضِ هَوْنًۭا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ ٱلْجَـٰهِلُونَ قَالُوا۟ سَلَـٰمًۭا
وَعِبَادُ
और बन्दे
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
ٱلَّذِينَ
वो हैं जो
يَمْشُونَ
चलते हैं
عَلَى
on
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन पर
هَوْنًۭا
आहिस्तगी से
وَإِذَا
और जब
خَاطَبَهُمُ
मुख़ातिब होते हैं उनसे
ٱلْجَـٰهِلُونَ
जाहिल लोग
قَالُوا۟
वो कहते हैं
سَلَـٰمًۭا
सलाम
रहमान के (प्रिय) बन्दें वहीं है जो धरती पर नम्रतापूर्वक चलते है और जब जाहिल उनके मुँह आएँ तो कह देते है, "तुमको सलाम!"
तफ़्सीर:
और 'रह़मान' (अत्यंत दयावान् अल्लाह) के मोमिन बंदे वे हैं, जो धरती पर गरिमा और नम्रता के साथ चलते हैं, तथा जब अज्ञानी (अक्खड़) लोग उन्हें संबोधित करते हैं, तो वे उन्हें बदला नहीं देते। बल्कि, वे उनसे ऐसी भली बात कहते हैं, जिसमें वे अक्खड़पन नहीं दिखाते हैं।
आयत 64
وَٱلَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًۭا وَقِيَـٰمًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَبِيتُونَ
रात गुज़ारते हैं
لِرَبِّهِمْ
अपने रब के लिए
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
وَقِيَـٰمًۭا
और क़याम करते हुए
जो अपने रब के आगे सजदे में और खड़े रातें गुज़ारते है;
तफ़्सीर:
और जो लोग अपने रब के सामने, अपने माथे पर सजदा करते हुए और अपने पैरों पर खड़े हुए, नमाज़ पढ़ते हुए रात बिताते हैं।
आयत 65
وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَقُولُونَ
कहते हैं
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱصْرِفْ
फेर दे
عَنَّا
हम से
عَذَابَ
अज़ाब
جَهَنَّمَ ۖ
जहन्नम का
إِنَّ
बेशक
عَذَابَهَا
अज़ाब उसका
كَانَ
है
غَرَامًا
लाज़िम होने वाला
जो कहते है कि "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे हटा दे।" निश्चय ही उनकी यातना चिमटकर रहनेवाली है
तफ़्सीर:
तथा जो अपने पालनहार से अपनी प्रार्थना में कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! हमसे जहन्न की यातना को हटा दे। निःसंदेह जहन्नम की यातना उस व्यक्ति से चिपक जाने वाली है जो काफ़िर होकर मरता है।
आयत 66
إِنَّهَا سَآءَتْ مُسْتَقَرًّۭا وَمُقَامًۭا
إِنَّهَا
बेशक वो
سَآءَتْ
बहुत बुरा है
مُسْتَقَرًّۭا
ठिकाना
وَمُقَامًۭا
और क़यामगाह
निश्चय ही वह जगह ठहरने की दृष्टि! से भी बुरी है और स्थान की दृष्टि से भी
तफ़्सीर:
वह (जहन्नम) बहुत ही बुरी जगह है उसमें ठहरने वालों के लिए तथा बहुत बुरा निवास स्थान है उसमें निवास करने वालों के लिए।
आयत 67
وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَنفَقُوا۟ لَمْ يُسْرِفُوا۟ وَلَمْ يَقْتُرُوا۟ وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग
إِذَآ
जब
أَنفَقُوا۟
वो ख़र्च करते हैं
لَمْ
ना
يُسْرِفُوا۟
वो इसराफ़ करते हैं
وَلَمْ
और ना
يَقْتُرُوا۟
वो बुख़्ल करते हैं
وَكَانَ
और होता है
بَيْنَ
between
ذَٰلِكَ
दर्मियान उसके
قَوَامًۭا
मोअतदल (तरीक़ा)
जो ख़र्च करते है तो न अपव्यय करते है और न ही तंगी से काम लेते है, बल्कि वे इनके बीच मध्यमार्ग पर रहते है
तफ़्सीर:
और वे लोग कि जब अपना धन खर्च करते हैं, तो फ़िज़ूलखर्ची की सीमा तक नहीं पहुँचते और जिनपर ख़र्च करने के लिए वे बाध्य हैं, उनपर ख़र्च करने में तंगी नहीं करते हैं। बल्कि खर्च करने के मामले में फ़िज़ूलख़र्ची और कंजूसी के बीच संतुलित राह अपनाते हैं।
आयत 68
وَٱلَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
لَا
(do) not
يَدْعُونَ
नहीं वो पुकारते
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
وَلَا
और नहीं
يَقْتُلُونَ
वो क़त्ल करते
ٱلنَّفْسَ
किसी जान को
ٱلَّتِى
वो जो
حَرَّمَ
हराम की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَلَا
और नहीं
يَزْنُونَ ۚ
वो ज़िना करते
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْ
करेगा
ذَٰلِكَ
ऐसा
يَلْقَ
वो पाएगा
أَثَامًۭا
गुनाह (की सज़ा) को
जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे इष्ट-पूज्य को नहीं पुकारते और न नाहक़ किसी जीव को जिस (के क़त्ल) को अल्लाह ने हराम किया है, क़त्ल करते है। और न वे व्यभिचार करते है - जो कोई यह काम करे तो वह गुनाह के वबाल से दोचार होगा
तफ़्सीर:
तथा जो लोग अल्लाह के अलावा किसी अन्य पूज्य को नहीं पुकारते। तथा उस व्यक्ति को क़त्ल नहीं करते, जिसके क़त्ल को अल्लाह ने हराम किया है, सिवाय इसके कि जिसके क़त्ल को अल्लाह ने अधिकृत किया है, जैसे कि हत्यारे, या धर्मत्यागी (मुर्तद्द), या विवाहित व्यभिचारी को क़त्ल करना। तथा वे व्यभिचार नहीं करते हैं। और जो व्यक्ति इन बड़े-बड़े गुनाहों में से कोई गुनाह करेगा, वह क़ियामत के दिन उसकी सज़ा भुगतेगा।
आयत 69
يُضَـٰعَفْ لَهُ ٱلْعَذَابُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِۦ مُهَانًا
يُضَـٰعَفْ
दोगुना किया जाएगा
لَهُ
उसके लिए
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
وَيَخْلُدْ
और वो हमेशा रहेगा
فِيهِۦ
उसमें
مُهَانًا
ज़लील हो कर
क़ियामत के दिन उसकी यातना बढ़ती चली जाएगी॥ और वह उसी में अपमानित होकर स्थायी रूप से पड़ा रहेगा
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन उसकी यातना दुगनी कर दी जाएगी और वह उस यातना में अपमानित और तिरस्कृत होकर सदा बना रहेगा।
आयत 70
إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلًۭا صَـٰلِحًۭا فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمْ حَسَنَـٰتٍۢ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
إِلَّا
मगर
مَن
जिसने
تَابَ
तौबा की
وَءَامَنَ
और वो ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल करे
عَمَلًۭا
अमल
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
يُبَدِّلُ
बदल देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
سَيِّـَٔاتِهِمْ
उनकी बुराइयों को
حَسَنَـٰتٍۢ ۗ
भलाइयों से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़शने वाला
رَّحِيمًۭا
बहुत रहम करने वाला
सिवाय उसके जो पलट आया और ईमान लाया और अच्छा कर्म किया, तो ऐसे लोगों की बुराइयों को अल्लाह भलाइयों से बदल देगा। और अल्लाह है भी अत्यन्त क्षमाशील, दयावान
तफ़्सीर:
लेकिन जिसने अल्लाह के सामने तौबा कर ली, ईमान ले आया और अच्छा कर्म किया, जो उसकी सच्ची तौबा को इंगित करता है, तो अल्लाह ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अच्छे कर्मों से बदल देगा। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रहमान के बंदों की सिफात (तवाज़ो, रात की इबादत) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़मीन पर नर्मी से चलना, जाहिलों से उलझने की बजाय सलाम कहकर गुज़र जाना और रात में इबादत करना असली मोमिन की पहचान है।
आयत 71
وَمَن تَابَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَإِنَّهُۥ يَتُوبُ إِلَى ٱللَّهِ مَتَابًۭا
وَمَن
और जो कोई
تَابَ
तौबा करे
وَعَمِلَ
और वो अमल करे
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
يَتُوبُ
वो पलट आता है
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
مَتَابًۭا
पलटना
और जिसने तौबा की और अच्छा कर्म किया, तो निश्चय ही वह अल्लाह की ओर पलटता है, जैसा कि पलटने का हक़ है
तफ़्सीर:
और जो अल्लाह के सामने तौबा करता है और आज्ञाकारिता के कार्य करके तथा अवज्ञा को त्यागकर अपनी सच्ची तौबा को साबित करता है, तो निश्चय उसकी तौबा स्वीकार की जाती है।
आयत 72
وَٱلَّذِينَ لَا يَشْهَدُونَ ٱلزُّورَ وَإِذَا مَرُّوا۟ بِٱللَّغْوِ مَرُّوا۟ كِرَامًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वे जो
لَا
(do) not
يَشْهَدُونَ
नहीं वो गवाह बनते
ٱلزُّورَ
झूठ के
وَإِذَا
और जब
مَرُّوا۟
वो गुज़र ते है
بِٱللَّغْوِ
लग़्व पर
مَرُّوا۟
वो गुज़र जाते हैं
كِرَامًۭا
इज़्ज़त से
जो किसी झूठ और असत्य में सम्मिलित नहीं होते और जब किसी व्यर्थ के कामों के पास से गुज़रते है, तो श्रेष्ठतापूर्वक गुज़र जाते है,
तफ़्सीर:
तथा जो लोग असत्य में भाग नहीं लेते; जैसे पाप और और निषिद्ध मनोरंजन के स्थानों (पर उपस्थित नहीं होते)। और जब वे बेकार की बात और काम से गुज़रते हैं, तो अपने आपको उससे बचाते हुए सज्जनतापूर्वक गुज़र जाते हैं।
आयत 73
وَٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ لَمْ يَخِرُّوا۟ عَلَيْهَا صُمًّۭا وَعُمْيَانًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
إِذَا
जब
ذُكِّرُوا۟
वो नसीहत किए जाते हैं
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
رَبِّهِمْ
अपने रब की
لَمْ
नहीं
يَخِرُّوا۟
वो गिर पड़ते
عَلَيْهَا
उन पर
صُمًّۭا
बहरे
وَعُمْيَانًۭا
और अँधे बन कर
जो ऐसे हैं कि जब उनके रब की आयतों के द्वारा उन्हें याददिहानी कराई जाती है तो उन (आयतों) पर वे अंधे और बहरे होकर नहीं गिरते।
तफ़्सीर:
और वे लोग कि जब उन्हें अल्लाह की सुनाई देने योग्य तथा देखने योग्य निशानियों के साथ उपदेश दिया जाता है, तो वे सुनाई देने योग्य निशानियों को सुनने से बहरे नहीं बनते, न ही देखने योग्य निशानियों को देखने से अंधे बनते हैं।
आयत 74
وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَٰجِنَا وَذُرِّيَّـٰتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍۢ وَٱجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَقُولُونَ
कहते हैं
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
هَبْ
अता कर
لَنَا
हमें
مِنْ
from
أَزْوَٰجِنَا
हमारी बीवियों से
وَذُرِّيَّـٰتِنَا
और हमारी औलाद से
قُرَّةَ
ठंडक
أَعْيُنٍۢ
आँखों की
وَٱجْعَلْنَا
और बना हमें
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों का
إِمَامًا
इमाम / राहनुमा
और जो कहते है, "ऐ हमारे रब! हमें हमारी अपनी पत्नियों और हमारी संतान से आँखों की ठंडक प्रदान कर और हमें डर रखनेवालों का नायक बना दे।"
तफ़्सीर:
तथा जो लोग अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! हमें हमारी पत्नियों में से और हमारी संतान में से कोई ऐसा प्रदान कर, जो अपनी धर्मपरायणता और सत्य पर दृढ़ता के कारण हमारी आँखों को सुकून दे। और हमें सच्चाई में परहेज़गारों का 'इमाम' (अग्रगामी) बना कि हमारा अनुसरण किया जाए।
आयत 75
أُو۟لَـٰٓئِكَ يُجْزَوْنَ ٱلْغُرْفَةَ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيُلَقَّوْنَ فِيهَا تَحِيَّةًۭ وَسَلَـٰمًا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُجْزَوْنَ
जो बदले में दिए जाऐंगे
ٱلْغُرْفَةَ
बालाख़ाने
بِمَا
बवजह उसके जो
صَبَرُوا۟
उन्होंने सब्र किया
وَيُلَقَّوْنَ
और वो इस्तक़बाल किए जाऐंगे
فِيهَا
उसमें
تَحِيَّةًۭ
दुआए ख़ैर
وَسَلَـٰمًا
और सलाम से
यही वे लोग है जिन्हें, इसके बदले में कि वे जमे रहे, उच्च भवन प्राप्त होगा, तथा ज़िन्दाबाद और सलाम से उनका वहाँ स्वागत होगा
तफ़्सीर:
उक्त विशेषताएँ रखने वाले ये लोग, अल्लाह की आज्ञा मानने में धैर्य रखने के कारण, जन्नतुल फ़िरदौस के अंदर उच्च भवन दिए जाएँगे और वहाँ फ़रिश्तों द्वारा अभिवादन और सलाम के साथ उनका स्वागत किया जाएगा, और वे हर प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित रहेंगे।
आयत 76
خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ حَسُنَتْ مُسْتَقَرًّۭا وَمُقَامًۭا
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उसमें
حَسُنَتْ
कितना अच्छा है
مُسْتَقَرًّۭا
ठिकाना
وَمُقَامًۭا
और क़यामगाह
वहाँ वे सदैव रहेंगे। बहुत ही अच्छी है वह ठहरने की जगह और स्थान;
तफ़्सीर:
वे वहाँ हमेशा के लिए रहेंगे। वह बहुत ही अच्छी ठहरने की जगह है, जहाँ वे ठहरेंगे और बहुत अच्छा निवास स्थान है, जहाँ वे निवास करेंगे।
आयत 77
قُلْ مَا يَعْبَؤُا۟ بِكُمْ رَبِّى لَوْلَا دُعَآؤُكُمْ ۖ فَقَدْ كَذَّبْتُمْ فَسَوْفَ يَكُونُ لِزَامًۢا
قُلْ
कह दीजिए
مَا
ना
يَعْبَؤُا۟
परवाह करता
بِكُمْ
तुम्हारी
رَبِّى
रब मेरा
لَوْلَا
अगर ना होती
دُعَآؤُكُمْ ۖ
दुआ तुम्हारी
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
كَذَّبْتُمْ
झुठला दिया तुम ने
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يَكُونُ
होगा
لِزَامًۢا
चिमट जाने वाला (अज़ाब)
कह दो, "मेरे रब को तुम्हारी कोई परवाह नहीं अगर तुम (उसको) न पुकारो। अब जबकि तुम झुठला चुके हो, तो शीघ्र ही वह चीज़ चिमट जानेवाली होगी।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कुफ़्र पर अड़े रहने वाले काफ़िरों से कह दें : मेरा पालनहार तुम्हारी परवाह नहीं करता कि उसे तुम्हारे आज्ञापालन से कोई लाभ मिलने वाला है। यदि उसके कुछ बंदे ऐसे न होते, जो उसे इबादत के तौर पर और कुछ माँगने के लिए पुकारते रहते हैं, तो वह तुम्हारी कभी परवाह न करता। क्योंकि रसूल तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे पास जो कुछ लाए हैं, उसमें तुमने रसूल को झुठलाया है। अतः उस झुठलाने का दंड तो तुम्हें मिलकर ही रहेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तौबा करने वालों की कद्र और दुआ के जज़्बे के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि गुनाह से तौबा करने वाले को अल्लाह नेकियों में बदल देता है, इसलिए मायूस होने की कोई वजह नहीं। अपनी औलाद और नस्लों के लिए हिदायत की दुआ मांगते रहना चाहिए।
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