सूरह अल-अनकबूत سورة العنكبوت
मक्की 69 आयतें
नाम का मतलब
मकड़ी (गैर-अल्लाह के सहारे की मिसाल मकड़ी के जाले से दी गई है)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अंकबूत में ईमान की आज़माइश और सब्र का मौज़ूअ मरकज़ी हैसियत रखता है। इसका नाम उस मिसाल से लिया गया है जिसमें गैर-अल्लाह के सहारे को मकड़ी के कमज़ोर जाले से तशबीह दी गई है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह ईमान वालों को यह तसल्ली देती है कि आज़माइश के बगैर ईमान का दावा मुकम्मल नहीं होता, हर सच्चे ईमान वाले को इम्तिहान से गुज़रना पड़ता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓ
الٓمٓ
ا ل م
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(अलिफ़, लाम, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
أَحَسِبَ ٱلنَّاسُ أَن يُتْرَكُوٓا۟ أَن يَقُولُوٓا۟ ءَامَنَّا وَهُمْ لَا يُفْتَنُونَ
أَحَسِبَ
क्या समझ लिया है
ٱلنَّاسُ
लोगों ने
أَن
कि
يُتْرَكُوٓا۟
वो छोड़ दिए जाऐंगे
أَن
ये कि
يَقُولُوٓا۟
वो कह दें
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
وَهُمْ
और वो
لَا
will not be tested
يُفْتَنُونَ
ना वो आज़माए जाऐंगे
क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे इतना कह देने मात्र से छोड़ दिए जाएँगे कि "हम ईमान लाए" और उनकी परीक्षा न की जाएगी?
तफ़्सीर:
क्या लोगों ने यह सोच रखा है कि वे केवल यह कहने से छोड़ दिए जाएँगे कि : हम ईमान लाए और उनकी ऐसी परीक्षा नहीं की जाएगी, जो उनकी कही हुई बात की सच्चाई को स्पष्ट कर दे, कि क्या वे वास्तव में मोमिन हैं?! मामला ऐसा नहीं है जो उन्होंने सोचा है।
आयत 3
وَلَقَدْ فَتَنَّا ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۖ فَلَيَعْلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱلْكَـٰذِبِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
فَتَنَّا
आज़माया हमने
ٱلَّذِينَ
उनको जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۖ
उनसे पहले थे
فَلَيَعْلَمَنَّ
पस अलबत्ता ज़रूर जान लेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जिन्होंने
صَدَقُوا۟
सच कहा
وَلَيَعْلَمَنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर जान लेगा
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों को
हालाँकि हम उन लोगों की परीक्षा कर चुके है जो इनसे पहले गुज़र चुके है। अल्लाह तो उन लोगों को मालूम करके रहेगा, जो सच्चे है। और वह झूठों को भी मालूम करके रहेगा
तफ़्सीर:
हालाँकि निश्चय हमने इनसे पहले के लोगों की परीक्षा की। अतः अल्लाह अवश्य स्पष्ट रूप से जान लेगा और तुम्हारे सामने उजागर कर देगा कि उनमें से कौन लोग अपने ईमान में सच्चे हैं और कौन लोग झूठे हैं।
आयत 4
أَمْ حَسِبَ ٱلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَسْبِقُونَا ۚ سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ
أَمْ
या
حَسِبَ
समझ लिया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
يَعْمَلُونَ
अमल करते हैं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरे
أَن
कि
يَسْبِقُونَا ۚ
वो सबक़त ले जाऐंगे हमसे
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
يَحْكُمُونَ
वो फ़ैसला कर रहे हैं
या उन लोगों ने, जो बुरे कर्म करते है, यह समझ रखा है कि वे हमारे क़ाबू से बाहर निकल जाएँगे? बहुत बुरा है जो फ़ैसला वे कर रहे है
तफ़्सीर:
बल्कि, क्या उन लोगों ने जो शिर्क और अन्य पाप करते हैं, यह समझ रखा है कि वे हमें विवश कर देंगे और हमारी सज़ा से बच जाएँगे? बहुत ही बुरा है वह फ़ैसला, जो वे कर रहे हैं। क्योंकि वे अल्लाह को विवश नहीं कर सकते और और यदि वे अपने कुफ़्र ही की हालत पर मर गए, तो वे उसकी सज़ा से नहीं बच सकते।
आयत 5
مَن كَانَ يَرْجُوا۟ لِقَآءَ ٱللَّهِ فَإِنَّ أَجَلَ ٱللَّهِ لَـَٔاتٍۢ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
مَن
जो कोई
كَانَ
हो
يَرْجُوا۟
उम्मीद रखता
لِقَآءَ
(for the) meeting
ٱللَّهِ
अल्लाह से मुलाक़ात की
فَإِنَّ
तो बेशक
أَجَلَ
मुक़र्ररह वक़्त
ٱللَّهِ
अल्लाह का
لَـَٔاتٍۢ ۚ
अलबत्ता आने वाला है
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
जो व्यक्ति अल्लाह से मिलने का आशा रखता है तो अल्लाह का नियत समय तो आने ही वाला है। और वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति क़ियामत के दिन बदला पाने के लिए अल्लाह से मिलने की आशा रखता हो, उसे जान लेना चाहिए कि अल्लाह ने उसके लिए जो नियमित समय नियत किया है, वह शीघ्र ही आने वाला है। और वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कार्यों को जानने वाला है। उससे इनमें से कोई भी चीज़ छूट नहीं सकती और वह उन्हें इसका बदला देगा।
आयत 6
وَمَن جَـٰهَدَ فَإِنَّمَا يُجَـٰهِدُ لِنَفْسِهِۦٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِىٌّ عَنِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَن
और जो कोई
جَـٰهَدَ
जिहाद करे
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يُجَـٰهِدُ
वो जिहाद करता है
لِنَفْسِهِۦٓ ۚ
अपने नफ़्स के लिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَغَنِىٌّ
अलबत्ता बहुत बेनियाज़ है
عَنِ
of
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों से
और जो व्यक्ति (अल्लाह के मार्ग में) संघर्ष करता है वह तो स्वयं अपने ही लिए संघर्ष करता है। निश्चय ही अल्लाह सारे संसार से निस्पृह है
तफ़्सीर:
जिस व्यक्ति ने स्वयं को आज्ञाकारिता पर उभार कर और अवज्ञा से दूर रहकर अपने आपसे संघर्ष किया और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया, तो वह अपने ही लिए जिहाद (संघर्ष) करता है; क्योंकि उसका लाभ उसी को मिलने वाला है। और अल्लाह सभी प्राणियों से बेनियाज़ है। अतः उनकी आज्ञाकारिता उसे बढ़ाती नहीं है और न ही उनकी अवज्ञा उसे कम करती है।
आयत 7
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَحْسَنَ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَنُكَفِّرَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर दूर कर देंगे
عَنْهُمْ
उनसे
سَيِّـَٔاتِهِمْ
बुराइयाँ उनकी
وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ
और अलबत्ता हम ज़रूर बदला देंगे उन्हें
أَحْسَنَ
बेहतरीन
ٱلَّذِى
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छा कर्म किए हम उनसे उनकी बुराइयों को दूर कर देंगे और उन्हें अवश्य ही उसका प्रतिदान प्रदान करेंगे, जो कुछ अच्छे कर्म वे करते रहे होंगे
तफ़्सीर:
और जो लोग ईमान लाए और हमारी परीक्षाओं पर सब्र किए, तथा उन्होंने नेक कार्य किए, निश्चय हम उनके अच्छे कामों के कारण उनके गुनाहों को ज़रूर मिटा देंगे और निश्चय उन्हें आख़िरत में उन कार्यों का बेहतरीन बदला अवश्य देंगे जो वे दुनिया में किया करते थे।
आयत 8
وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ حُسْنًۭا ۖ وَإِن جَـٰهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِى مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌۭ فَلَا تُطِعْهُمَآ ۚ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَوَصَّيْنَا
और ताकीद की हमने
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
بِوَٰلِدَيْهِ
अपने वालिदैन के साथ
حُسْنًۭا ۖ
भलाई (करने) की
وَإِن
और अगर
جَـٰهَدَاكَ
वो दोनों ज़ोर डालें तुम पर
لِتُشْرِكَ
ताकि तुम शरीक करो
بِى
मेरे साथ
مَا
उसको जो
لَيْسَ
नहीं है
لَكَ
तुम्हें
بِهِۦ
जिसका
عِلْمٌۭ
कोई इल्म
فَلَا
तो ना
تُطِعْهُمَآ ۚ
तुम इताअत करो उन दोनों की
إِلَىَّ
मेरी ही तरफ़
مَرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
فَأُنَبِّئُكُم
तो मैं बताऊँगा तुम्हें
بِمَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल किया करते
और हमने मनुष्यों को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद की है। किन्तु यदि वे तुमपर ज़ोर डालें कि तू किसी ऐसी चीज़ को मेरा साक्षी ठहराए, जिसका तुझे कोई ज्ञान नहीं, तो उनकी बात न मान। मेरी ही ओर तुम सबको पलटकर आना है, फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ कुम करते रहे होगे
तफ़्सीर:
और हमने मनुष्य को आदेश दिया है कि अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार और भलाई करे। और यदि (ऐ मनुष्य!) तेरे माता-पिता तुझपर दबाव डालें कि तू उस चीज़ को मेरा साझी बनाए, जिसको साझी बनाने का तुझे कोई ज्ञान नहीं (जैसा कि सअद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु की माँ ने उनके साथ किया था), तो उसमें उनकी बात मत मान। क्योंकि सृष्टिकर्ता की अवज्ञा में किसी भी प्राणी की आज्ञाकारिता नहीं है। क़ियामत के दिन तुम्हारी वापसी केवल मेरी ओर है, फिर मैं तुम्हें बताऊँगा कि तुम दुनिया में क्या करते थे और मैं तुम्हें उसका बदला दूँगा।
आयत 9
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُدْخِلَنَّهُمْ فِى ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَنُدْخِلَنَّهُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर दाख़िल करेंगे उन्हें
فِى
among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए हम उन्हें अवश्य अच्छे लोगों में सम्मिलित करेंगे
तफ़्सीर:
और जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और नेक काम किए, हम उन्हें क़ियामत के दिन अवश्य नेक लोगों में दाख़िल करेंगे। चुनाँचे हम उन्हें उनके साथ इकट्ठा करेंगे और उन्हीं के जैसा बदला देंगे।
आयत 10
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ فَإِذَآ أُوذِىَ فِى ٱللَّهِ جَعَلَ فِتْنَةَ ٱلنَّاسِ كَعَذَابِ ٱللَّهِ وَلَئِن جَآءَ نَصْرٌۭ مِّن رَّبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمْ ۚ أَوَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَعْلَمَ بِمَا فِى صُدُورِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمِنَ
And of
ٱلنَّاسِ
और लोगों में से कोई है
مَن
जो
يَقُولُ
कहता है
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
فَإِذَآ
फिर जब
أُوذِىَ
वो अज़ियत दिया जाता है
فِى
in
ٱللَّهِ
अल्लाह (की राह) में
جَعَلَ
वो बना लेता है
فِتْنَةَ
आज़माइश को
ٱلنَّاسِ
लोगों की
كَعَذَابِ
as (the) punishment
ٱللَّهِ
अल्लाह के आज़ाब की तरह
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
جَآءَ
आ गई
نَصْرٌۭ
मदद
مِّن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
مَعَكُمْ ۚ
साथ तुम्हारे
أَوَلَيْسَ
क्या भला नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِأَعْلَمَ
ख़ूब जानता
بِمَا
उसे जो
فِى
(is) in
صُدُورِ
सीनों में है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के
लोगों में ऐसे भी है जो कहते है कि "हम अल्लाह पर ईमान लाए," किन्तु जब अल्लाह के मामले में वे सताए गए तो उन्होंने लोगों की ओर से आई हुई आज़माइश को अल्लाह की यातना समझ लिया। अब यदि तेरे रब की ओर से सहायता पहुँच गई तो कहेंगे, "हम तो तुम्हारे साथ थे।" क्या जो कुछ दुनियावालों के सीनों में है उसे अल्लाह भली-भाँति नहीं जानता?
तफ़्सीर:
और लोगों में कुछ ऐसे हैं, जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर ईमान लाए। फिर जब उसके ईमान के कारण काफ़िर लोग उसे कष्ट पहुँचाते हैं, तो वह काफ़िरों की प्रताड़ना को अल्लाह की यातना के समान समझ लेता है। इसलिए वह काफ़िरों की मुवाफ़क़त में ईमान से पलट जाता है। और यदि (ऐ रसूल!) आपको आपके रब की ओर से विजय प्राप्त हो जाए, तो वे अवश्य कहेंगे : हम तो (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे साथ ईमान पर क़ायम थे। क्या अल्लाह उसे सबसे अधिक जानने वाला नहीं जो लोगों के सीनों में है?! उनमें जो कुछ भी कुफ़्र और ईमान है, उससे छिपा नहीं है। फिर वे अल्लाह को कैसे बता रहे हैं कि उनके दिलों में क्या है, जबकि वह उनसे अधिक जानने वाला है कि उनमें क्या है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईमान की आज़माइश का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ ज़बानी ईमान का दावा काफी नहीं, अल्लाह हर ईमान वाले को आज़माता है ताकि सच्चे-झूठे में फर्क हो जाए।
आयत 11
وَلَيَعْلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
وَلَيَعْلَمَنَّ
और अलबत्ता ज़रूर जान लेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَلَيَعْلَمَنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर जान लेगा
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों को
और अल्लाह तो उन लोगों को मालूम करके रहेगा जो ईमान लाए, और वह कपटाचारियों को भी मालूम करके रहेगा
तफ़्सीर:
और निश्चय अल्लाह उन लोगों को अवश्य जान लेगा जो वास्तव में उसपर ईमान लाए तथा निश्चय उन मुनाफ़िक़ों को भी ज़रूर जान लेगा, जो ईमान का दिखावा करते हैं और दिल में कुफ़्र छिपाए होते हैं।
आयत 12
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّبِعُوا۟ سَبِيلَنَا وَلْنَحْمِلْ خَطَـٰيَـٰكُمْ وَمَا هُم بِحَـٰمِلِينَ مِنْ خَطَـٰيَـٰهُم مِّن شَىْءٍ ۖ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلَّذِينَ
उन लोगों से जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
ٱتَّبِعُوا۟
पैरवी कर
سَبِيلَنَا
हमारे रास्ते की
وَلْنَحْمِلْ
और हम ज़रूर उठा लेंगे
خَطَـٰيَـٰكُمْ
ख़ताऐं तुम्हारी
وَمَا
हालाँकि नहीं
هُم
वो
بِحَـٰمِلِينَ
उठाने वाले
مِنْ
of
خَطَـٰيَـٰهُم
उनकी ख़ताओं में से
مِّن
any
شَىْءٍ ۖ
कोई चीज़
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
और इनकार करनेवाले ईमान लानेवालों से कहते है, "तुम हमारे मार्ग पर चलो, हम तुम्हारी ख़ताओं का बोझ उठा लेंगे।" हालाँकि वे उनकी ख़ताओं में से कुछ भी उठानेवाले नहीं है। वे निश्चय ही झूठे है
तफ़्सीर:
और काफ़िरों ने केवल एक अल्लाह पर ईमान लाने वालों से कहा : तुम हमारे धर्म और हमारे मार्ग पर चलो, और तुम्हारी ओर से तुम्हारे पापों को हम उठालेंगे, इसलिए तुम्हारे बजाय उनका बदला हम दिए जाएँगे। हालाँकि वे उनके पापों में से कुछ भी उठाने वाले नहीं हैं और निश्चय वे अपने इस कथन में झूठे हैं।
आयत 13
وَلَيَحْمِلُنَّ أَثْقَالَهُمْ وَأَثْقَالًۭا مَّعَ أَثْقَالِهِمْ ۖ وَلَيُسْـَٔلُنَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ عَمَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
وَلَيَحْمِلُنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर उठाऐंगे
أَثْقَالَهُمْ
बोझ अपने
وَأَثْقَالًۭا
और कई बोझ
مَّعَ
साथ
أَثْقَالِهِمْ ۖ
अपने बोझों के
وَلَيُسْـَٔلُنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर पूछे जाऐंगे
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
عَمَّا
उस चीज़ के बारे में जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ा करते
हाँ, अवश्य ही वे अपने बोझ भी उठाएँगे और अपने बोझों के साथ और बहुत-से बोझ भी। और क़ियामत के दिन अवश्य उनसे उसके विषय में पूछा जाएगा जो कुछ झूठ वे घड़ते रहे होंगे
तफ़्सीर:
निश्चय अपने झूठ की ओर बुलाने वाले ये मुश्रिक अपने किए हुए पापों का बोझ ज़रूर उठाएँगे तथा निश्चय उन लोगों के पापों का भी बोझ अवश्य उठाएँगे जिन्होंने उनके आह्वान का पालन किया, जबकि उनका पालन करने वालों के पापों में कोई कमी नहीं की जाएगी। तथा निश्चय क़ियामत के दिन उनसे उन झूठी बातों के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा, जो वे दुनिया में गढ़ा करते थे।
आयत 14
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَلَبِثَ فِيهِمْ أَلْفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمْسِينَ عَامًۭا فَأَخَذَهُمُ ٱلطُّوفَانُ وَهُمْ ظَـٰلِمُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
نُوحًا
नूह को
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
तरफ़ उसकी क़ौम के
فَلَبِثَ
तो वो रहा
فِيهِمْ
उनमें
أَلْفَ
एक हज़ार
سَنَةٍ
साल
إِلَّا
मगर
خَمْسِينَ
पचास
عَامًۭا
साल (कम)
فَأَخَذَهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلطُّوفَانُ
तूफ़ान ने
وَهُمْ
जबकि वे
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम थे
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा। और वह पचास साल कम एक हजार वर्ष उनके बीच रहा। अन्ततः उनको तूफ़ान ने इस दशा में आ पकड़ा कि वे अत्याचारी था
तफ़्सीर:
हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी जाति की ओर रसूल बनाकर भेजा, तो वह उनके बीच नौ सौ पचास (950) वर्ष तक रहे और उन्हें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाते रहे। परंतु उन लोगों ने उन्हें झुठला दिया और अपने कुफ़्र पर बने रहे। अतः तूफ़ान (जलप्रलय) ने उन्हें पकड़ लिया, जबकि वे अल्लाह का इनकार करने और उसके रसूलों को झुठलाने के कारण अत्याचारी थे, और वे डूबकर मर गए।
आयत 15
فَأَنجَيْنَـٰهُ وَأَصْحَـٰبَ ٱلسَّفِينَةِ وَجَعَلْنَـٰهَآ ءَايَةًۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
فَأَنجَيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَأَصْحَـٰبَ
and (the) people
ٱلسَّفِينَةِ
और कश्ती वालों को
وَجَعَلْنَـٰهَآ
और बना दिया हमने उसे
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
फिर उसको और नौकावालों को हमने बचा लिया और उसे सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने नूह तथा नाव में उनके साथ मौजूद ईमान वालों को डूबने से बचा लिया तथा नाव को लोगों के लिए इबरत की एक निशानी बना दिया, जिससे वे इबरत हासिल कर सकें।
आयत 16
وَإِبْرَٰهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱتَّقُوهُ ۖ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَإِبْرَٰهِيمَ
और इब्राहीम को
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِ
अपनी क़ौम से
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱتَّقُوهُ ۖ
और डरो उससे
ذَٰلِكُمْ
ये
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
और इबराहीम को भी भेजा, जबकि उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो और उसका डर रखो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम जानो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) इबराहीम अलैहिस्सलाम की कहानी को याद करें, जिस समय उन्होंने अपनी जाति के लोगों से कहा : तुम केवल अल्लाह की इबादत करो और उसके आदेशों का पालन करके तथा उसके निषेधों से बचकर उसकी सज़ा से डरो। यह आदेश तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।
आयत 17
إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوْثَـٰنًۭا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًۭا فَٱبْتَغُوا۟ عِندَ ٱللَّهِ ٱلرِّزْقَ وَٱعْبُدُوهُ وَٱشْكُرُوا۟ لَهُۥٓ ۖ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
إِنَّمَا
बेशक
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَوْثَـٰنًۭا
कुछ बुतों की
وَتَخْلُقُونَ
और तुम गढ़ते हो
إِفْكًا ۚ
झूट
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لَا
(do) not
يَمْلِكُونَ
नहीं वो मालिक हो सकते
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رِزْقًۭا
रिज़्क़ के
فَٱبْتَغُوا۟
पस तलाश करो
عِندَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़
وَٱعْبُدُوهُ
और इबादत करो उसकी
وَٱشْكُرُوا۟
और शुक्र अदा करो
لَهُۥٓ ۖ
उसका
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
तुम तो अल्लाह से हटकर बस मूर्तियों को पूज रहे हो और झूठ घड़ रहे हो। तुम अल्लाह से हटकर जिनको पूजते हो वे तुम्हारे लिए रोज़ी का भी अधिकार नहीं रखते। अतः तुम अल्लाह ही के यहाँ रोज़ी तलाश करो और उसी की बन्दगी करो और उसके आभारी बनो। तुम्हें उसी की ओर लौटकर जाना है
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) तुम (अल्लाह के सिवा) मात्र ऐसी मूर्तियों की पूजा करते हो, जो लाभ या हानि नहीं पहुँचाती हैं, तथा तुम झूठ गढ़ते हो जब यह दावा करते हो कि वे पूजा के योग्य हैं। निःसंदेह अल्लाह के सिवा जिनकी तुम पूजा करते हो, वे तुम्हारे लिए किसी रोज़ी के मालिक नहीं हैं, कि वे तुम्हें रोज़ी प्रदान करें। इसलिए तुम अल्लाह ही से रोज़ी माँगो, क्योंकि वही रोज़ी देने वाला है। तथा केवल उसी की इबादत करो और उसने तुम्हें जो रोज़ी प्रदान की है उसके लिए उसका शुक्रिया अदा करो। क़ियामत के दिन हिसाब और बदला के लिए तुम केवल उसी की ओर लौटाए जाओगे, न कि अपनी मूर्तियों की ओर।
आयत 18
وَإِن تُكَذِّبُوا۟ فَقَدْ كَذَّبَ أُمَمٌۭ مِّن قَبْلِكُمْ ۖ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ
وَإِن
और अगर
تُكَذِّبُوا۟
तुम झुठलाते हो
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
كَذَّبَ
झुठलाया
أُمَمٌۭ
उम्मतों ने
مِّن
before you
قَبْلِكُمْ ۖ
जो तुम से पहले थीं
وَمَا
और नहीं
عَلَى
(is) on
ٱلرَّسُولِ
रसूल पर
إِلَّا
मगर
ٱلْبَلَـٰغُ
पहुँचा देना
ٱلْمُبِينُ
वाज़ेह तौर पर
और यदि तुम झुठलाते हो तो तुमसे पहले कितने ही समुदाय झुठला चुके है। रसूल पर तो बस केवल स्पष्ट रूप से (सत्य संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है।"
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ मुश्रिको!) तुम उसे झुठलाते हो, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए हैं, तो (याद रखो कि) तुमसे पहले बहुत-से समुदायों, जैसे कि नूह, आद और समूद के लोगों ने (अपने पैगंबरों को) झुठलाया। और रसूल का दायित्व केवल स्पष्ट रूप से अल्लाह का संदेश पहुँचा देना है। और जो कुछ उसके रब ने उसे तुम तक पहुँचाने का आदेश दिया था, वह उसने तुम्हें पहुँचा दिया है।
आयत 19
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ كَيْفَ يُبْدِئُ ٱللَّهُ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥٓ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٌۭ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
كَيْفَ
किस तरह
يُبْدِئُ
इब्तिदा करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْخَلْقَ
मख़लूक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥٓ ۚ
वो एआदा करेगा उसका
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرٌۭ
बहुत आसान है
क्या उन्होंने देखा नहीं कि अल्लाह किस प्रकार पैदाइश का आरम्भ करता है और फिर उसकी पुनरावृत्ति करता है? निस्संदेह यह अल्लाह के लिए अत्यन्त सरल है
तफ़्सीर:
क्या इन झुठलाने वालों ने नहीं देखा कि किस तरह अल्लाह शुरुआत में सृष्टि की रचना करता है, फिर उसके विनाश के बाद उसे पुनर्स्थापित करेगा?! निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है, उसे कोई भी चीज़ असमर्थ नहीं कर सकती।
आयत 20
قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ بَدَأَ ٱلْخَلْقَ ۚ ثُمَّ ٱللَّهُ يُنشِئُ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
سِيرُوا۟
चलो-फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱنظُرُوا۟
फिर देखो
كَيْفَ
किस तरह
بَدَأَ
उसने इब्तिदा की
ٱلْخَلْقَ ۚ
मख़लूक़ की
ثُمَّ
फिर
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُنشِئُ
वो उठाएगा
ٱلنَّشْأَةَ
उठाना
ٱلْـَٔاخِرَةَ ۚ
आख़िरी बार
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखना वाला है
कहो कि, "धरती में चलो-फिरो और देखो कि उसने किस प्रकार पैदाइश का आरम्भ किया। फिर अल्लाह पश्चात्वर्ती उठान उठाएगा। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप मृत्यु के पश्चात पुनः जीवित कर उठाए जाने को झुठलाने वालों से कह दें : धरती में चलो-फिरो, फिर चिंतन करो कि अल्लाह ने किस प्रकार उत्पत्ति का आरंभ किया। फिर अल्लाह ही लोगों को उनकी मृत्यु के बाद ह़श्र के मैदान में एकत्र करने तथा हिसाब-किताब के लिए दूसरा जीवन प्रदान करेगा। निःसंदेह अल्लाह प्रत्येक वस्तु पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई भी वस्तु असमर्थ नहीं कर सकती। अतः वह लोगों को पुनः जीवित कर उठाने में असमर्थ नहीं हो सकता जिस प्रकार कि वह लोगों को पहली बार पैदा करने में असमर्थ नहीं हुआ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की लंबी दावत और उनके सब्र का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नतीजा फौरन न मिले तब भी हक की दावत में मुसलसल कोशिश जारी रखनी चाहिए।
आयत 21
يُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ وَيَرْحَمُ مَن يَشَآءُ ۖ وَإِلَيْهِ تُقْلَبُونَ
يُعَذِّبُ
वो अज़ाब देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَرْحَمُ
और वो रहम करता है
مَن
जिस पर
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
وَإِلَيْهِ
और उसी की तरफ़
تُقْلَبُونَ
तुम लौटाए जाओगे
वह जिसे चाहे यातना दे और जिसपर चाहे दया करे। और उसी की ओर तुम्हें पलटकर जाना है।"
तफ़्सीर:
वह अपनी सृष्टि में से जिसे चाहता है अपने न्याय से दंड देता है, तथा अपनी सृष्टि में से जिसपर चाहता है अपनी कृपा से दया करता है। और तुम क़ियामत के दिन हिसाब-किताब के लिए केवल उसी की ओर लौटाए जाओगे, जब वह तुम्हें तुम्हारी कब्रों से जीवित उठाएगा।
आयत 22
وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍۢ
وَمَآ
और नहीं
أَنتُم
तुम
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ ۖ
आसमान में
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍۢ
कोई मददगार
तुम न तो धरती में क़ाबू से बाहर निकल सकते हो और न आकाश में। और अल्लाह से हटकर न तो तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक
तफ़्सीर:
और तुम धरती या आकाश में कहीं भी, न अपने रब से बचकर निकल सकते हो, और न ही उसकी यातना से भागने में सफल हो सकते हो। तथा अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई संरक्षक नहीं, जो तुम्हारे मामले को संभाल सके, और न अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई सहायक है, जो तुमसे उसकी यातना को दूर कर सके।
आयत 23
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَلِقَآئِهِۦٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَئِسُوا۟ مِن رَّحْمَتِى وَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِ
in (the) Signs
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का
وَلِقَآئِهِۦٓ
और उसकी मुलाक़ात का
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يَئِسُوا۟
जो मायूस हो गए
مِن
of
رَّحْمَتِى
मेरी रहमत से
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों और उससे मिलने का इनकार किया, वही लोग है जो मेरी दयालुता से निराश हुए और वही है जिनके लिए दुखद यातना है। -
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने पवित्र अल्लाह की आयतों तथा क़ियामत के दिन उससे मिलने का इनकार किया, वे हमरी दया से निराश हो चुके हैं। अतः वे अपने कुफ़्र के कारण कभी भी जन्नत में प्रवेश नहीं करेंगे। और यही लोग हैं जिनके लिए दर्दनाक यातना है, जो आख़िरत में उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 24
فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ ٱقْتُلُوهُ أَوْ حَرِّقُوهُ فَأَنجَىٰهُ ٱللَّهُ مِنَ ٱلنَّارِ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
فَمَا
तो ना
كَانَ
था
جَوَابَ
जवाब
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम का
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱقْتُلُوهُ
क़त्ल कर दो उसे
أَوْ
या
حَرِّقُوهُ
जला डालो उसे
فَأَنجَىٰهُ
तो निजात दी उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنَ
from
ٱلنَّارِ ۚ
आग से
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
फिर उनकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके सिवा और कुछ न था कि उन्होंने कहा, "मार डालो उसे या जला दो उसे!" अंततः अल्लाह ने उसको आग से बचा लिया। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति को केवल अल्लाह की इबादत करने तथा उसके अलावा मूर्तियों की पूजा छोड़ने का आदेश दिया, तो उनका उत्तर इसके सिवा कुछ न था कि उन्होंने कहा : अपने पूज्यों का समर्थन करने के लिए उसे मार डालो या उसे आग में फेंक दो। तो अल्लाह ने उन्हें आग से बचा लिया। निःसंदेह उनके आग में फेंके जाने के पश्चात उन्हें उससे बचा लेने में ईमान वालों के लिए बहुत-से उपदेश है, क्योंकि यही लोग हैं, जो उपदेशों से लाभ उठाते हैं।
आयत 25
وَقَالَ إِنَّمَا ٱتَّخَذْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ أَوْثَـٰنًۭا مَّوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ ثُمَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُم بِبَعْضٍۢ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُم بَعْضًۭا وَمَأْوَىٰكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
وَقَالَ
और उसने कहा
إِنَّمَا
बेशक
ٱتَّخَذْتُم
बना लिया तुमने
مِّن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَوْثَـٰنًۭا
बुतों को
مَّوَدَّةَ
मोहब्बत का ज़रिया
بَيْنِكُمْ
आपस में
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
ثُمَّ
फिर
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يَكْفُرُ
इन्कार करेगा
بَعْضُكُم
बाज़ तुम्हारा
بِبَعْضٍۢ
बाज़ का
وَيَلْعَنُ
और लानत करेगा
بَعْضُكُم
बाज़ तुम्हारा
بَعْضًۭا
बाज़ को
وَمَأْوَىٰكُمُ
और ठिकाना तुम्हारा
ٱلنَّارُ
आग है
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
कोई मददगार
और उसने कहा, "अल्लाह से हटकर तुमने कुछ मूर्तियों को केवल सांसारिक जीवन में अपने पारस्परिक प्रेम के कारण पकड़ रखा है। फिर क़ियामत के दिन तुममें से एक-दूसरे का इनकार करेगा और तुममें से एक-दूसरे पर लानत करेगा। तुम्हारा ठौर-ठिकाना आग है और तुम्हारा कोई सहायक न होगा।"
तफ़्सीर:
और इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति से कहा : तुमने मूर्तियों को पूज्य बना लिया है, जिनकी तुम पूजा करते हो, ताकि इस दुनिया के जीवन में उनकी पूजा को एक-दूसरे को जानने और आपस में प्रेम रखने का आधार बना लो। फिर क़ियामत के दिन तुम्हारे बीच का यह प्रेम समाप्त हो जाएगा, तथा यातना को देखकर तुम एक-दूसरे से अलग हो जाओगे और एक-दूसरे को धिक्कारने लगोगे। और तुम्हारा ठिकाना जहाँ तुम शरण लोगे, आग ही है और तुम्हारे लिए कोई सहायक नहीं होंगे जो तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा सकें, न तो तुम्हारे उन पूज्यों में से जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर पूजा करते हो और न ही उनके अलावा अन्य लोगों में से।
आयत 26
۞ فَـَٔامَنَ لَهُۥ لُوطٌۭ ۘ وَقَالَ إِنِّى مُهَاجِرٌ إِلَىٰ رَبِّىٓ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
۞ فَـَٔامَنَ
तो ईमान लाया
لَهُۥ
उस पर
لُوطٌۭ ۘ
लूत
وَقَالَ
और उसने कहा
إِنِّى
बेशक
مُهَاجِرٌ
हिजरत करने वाला हूँ
إِلَىٰ
to
رَبِّىٓ ۖ
तरफ़ अपने रब के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
फिर लूत ने उसकी बात मानी औऱ उसने कहा, "निस्संदेह मैं अपने रब की ओर हिजरत करता हूँ। निस्संदेह वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम उनपर ईमान ले आए। और इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : मैं अपने रब के लिए शाम की शुभ भूमि की ओर हिजरत करने वाला हूँ। निश्चय वही सब पर प्रभुत्वशाली है, जो पराजित नहीं होता और उसकी ओर हिजरत करने वाला कभी अपमानित नहीं होता। वह अपनी नियति और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 27
وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِى ذُرِّيَّتِهِ ٱلنُّبُوَّةَ وَٱلْكِتَـٰبَ وَءَاتَيْنَـٰهُ أَجْرَهُۥ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَوَهَبْنَا
और अता कर दिया हमने
لَهُۥٓ
उसे
إِسْحَـٰقَ
इस्हाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
وَجَعَلْنَا
और रख दी हमने
فِى
in
ذُرِّيَّتِهِ
उसकी औलाद में
ٱلنُّبُوَّةَ
नुबूव्वत
وَٱلْكِتَـٰبَ
और किताब
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और अता किया हमने उसे
أَجْرَهُۥ
अजर उसका
فِى
in
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया में
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
لَمِنَ
(is) surely, among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
अलबत्ता सालेह लोगों में से है
और हमने उसे इसहाक़ और याक़ूब प्रदान किए और उसकी संतति में नुबूवत (पैग़म्बरी) और किताब का सिलसिला जारी किया और हमने उसे संसार में भी उसका अच्छा प्रतिदान प्रदान किया। और निश्चय ही वह आख़िरत में अच्छे लोगों में से होगा
तफ़्सीर:
और हमने इबराहीम को इसह़ाक़ तथा उनका पुत्र याक़ूब प्रदान किया। और उनकी संतान में नुबुव्वत तथा अल्लाह की ओर से अवतरित होने वाले ग्रंथ रख दिए। और हमने उन्हें उनके सत्य पर धैर्य रखने का प्रतिफल दुनिया में उनकी संतान को सदाचारी बनाने और अच्छी प्रशंसा के द्वारा दिया, तथा आख़िरत में उन्हें सदाचारियों का प्रतिफल मिलेगा। दुनिया में जो कुछ उन्हें दिया गया, वह आख़िरत में उनके लिए तैयार किए गए उदार प्रतिफल में कोई कमी नहीं करेगा।
आयत 28
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلْفَـٰحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍۢ مِّنَ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَلُوطًا
और लूत को
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِۦٓ
अपनी क़ौम से
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَتَأْتُونَ
अलबत्ता तुम आते हो
ٱلْفَـٰحِشَةَ
बेहयाई को
مَا
नहीं
سَبَقَكُم
सबक़त की तुम पर
بِهَا
साथ इसके
مِنْ
any
أَحَدٍۢ
किसी एक ने
مِّنَ
from
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों में से
और हमने लूत को भेजा, जबकि उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम जो वह अश्लील कर्म करते हो, जिसे तुमसे पहले सारे संसार में किसी ने नहीं किया
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) लूत को याद करें, जिस समय उन्होंने अपने समुदाय से कहा : निश्चय तुम ऐसा घृणित पाप करते हो, जो तुमसे पहले दुनिया वालों में से किसी ने भी नहीं किया। अतः तुम इस कुकर्म का आविष्कार करने वाले पहले लोग हो, जिससे विशुद्ध प्रकृति घृणा करती है।
आयत 29
أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلرِّجَالَ وَتَقْطَعُونَ ٱلسَّبِيلَ وَتَأْتُونَ فِى نَادِيكُمُ ٱلْمُنكَرَ ۖ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ ٱئْتِنَا بِعَذَابِ ٱللَّهِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
أَئِنَّكُمْ
क्या बेशक तुम
لَتَأْتُونَ
अलबत्ता तुम आते हो
ٱلرِّجَالَ
मर्दों को
وَتَقْطَعُونَ
और तुम काटते हो
ٱلسَّبِيلَ
रास्ते
وَتَأْتُونَ
और तुम आते हो
فِى
in
نَادِيكُمُ
अपनी मजलिसों में
ٱلْمُنكَرَ ۖ
बुरे कामों को
فَمَا
तो ना
كَانَ
था
جَوَابَ
जवाब
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम का
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱئْتِنَا
ले आ हम पर
بِعَذَابِ
अज़ाब
ٱللَّهِ
अल्लाह का
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
क्या तुम पुरुषों के पास जाते हो और बटमारी करते हो औऱ अपनी मजलिस में बुरा कर्म करते हो?" फिर उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर बस यही था कि उन्होंने कहा, "ले आ हमपर अल्लाह की यातना, यदि तू सच्चा है।"
तफ़्सीर:
क्या तुम अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए पुरुषों की पिछली शर्मगाह में आते हो और यात्रियों का रास्ता रोकते हो, कि वे तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले अनैतिक कृत्य के डर से तुम्हारे पास से नहीं गुज़रते हैं, तथा तुम अपनी सभाओं में नग्नता और अपने पास से गुज़रने वालों को वचन एवं कर्म द्वारा कष्ट पहुँचाने जैसे निंदनीय कार्य करते हो? तो लूत अलैहिस्सलाम के उन्हें बुराई करने से मना करने के बाद उनका उत्तर इसके सिवा कुछ नहीं था कि उन्होंने कहा : तुम हमपर अल्लाह की वह यातना ले आओ, जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 30
قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْمُفْسِدِينَ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱنصُرْنِى
मदद फ़रमा मेरी
عَلَى
ऊपर
ٱلْقَوْمِ
इन लोगों के
ٱلْمُفْسِدِينَ
जो मुफ़सिद हैं
उसने कहास "ऐ मेरे रब! बिगाड़ पैदा करनेवाले लोगों के मुक़ावले में मेरी सहायता कर।"
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के हठ तथा अल्लाह की यातना को हलके में लेते हुए उसके लाने की माँग करने बाद, अपने रब से प्रार्थना करते हुए कहा : ऐ मेरे रब! उन लोगों के विरुद्ध मेरी सहायता कर, जो कुफ़्र और निंदनीय पाप फैलाकर धरती में बिगाड़ पैदा करने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम और लूत अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बुराई फैलाने वाले माहौल से अलग रहकर हक पर कायम रहना चाहिए।
आयत 31
وَلَمَّا جَآءَتْ رُسُلُنَآ إِبْرَٰهِيمَ بِٱلْبُشْرَىٰ قَالُوٓا۟ إِنَّا مُهْلِكُوٓا۟ أَهْلِ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةِ ۖ إِنَّ أَهْلَهَا كَانُوا۟ ظَـٰلِمِينَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَتْ
आए
رُسُلُنَآ
भेजे हुए(फ़रिश्ते)हमारे
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के पास
بِٱلْبُشْرَىٰ
ख़ुशख़बरी लेकर
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
مُهْلِكُوٓا۟
हलाक करने वाले हैं
أَهْلِ
रहने वालों को
هَـٰذِهِ
इस
ٱلْقَرْيَةِ ۖ
बस्ती के
إِنَّ
बेशक
أَهْلَهَا
इसके रहने वाले
كَانُوا۟
हैं वो
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
हमारे भेजे हुए जब इबराहीम के पास शुभ सूचना लेकर आए तो उन्होंने कहा, "हम इस बस्ती के लोगों को विनष्ट करनेवाले है। निस्संदेह इस बस्ती के लोग ज़ालिम है।"
तफ़्सीर:
और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते इबराहीम को इसहाक़ की तथा उनके पश्चात उनके पुत्र याक़ूब की शुभ सूचना देने के लिए आए, तो उन्होंने उनसे कहा : हम लूत की जाति की बस्ती 'सदूम' के लोगों को विनष्ट करने वाले हैं; क्योंकि इसके लोग अनैतिकता का कार्य करने के कारण अत्याचारी रहे हैं।
आयत 32
قَالَ إِنَّ فِيهَا لُوطًۭا ۚ قَالُوا۟ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَن فِيهَا ۖ لَنُنَجِّيَنَّهُۥ وَأَهْلَهُۥٓ إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
قَالَ
इब्राहीम ने कहा
إِنَّ
बेशक
فِيهَا
इसमें
لُوطًۭا ۚ
लूत है
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
نَحْنُ
हम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानते हैं
بِمَن
उसे जो
فِيهَا ۖ
इस में है
لَنُنَجِّيَنَّهُۥ
अलबत्ता हम ज़रूर निजात देंगे उसे
وَأَهْلَهُۥٓ
और उसके घर वालों को
إِلَّا
सिवाए
ٱمْرَأَتَهُۥ
उसकी बीवी के
كَانَتْ
है वो
مِنَ
(is) of
ٱلْغَـٰبِرِينَ
पीछे रहने वालों में से
उसने कहाँ, "वहाँ तो लूत मौजूद है।" वे बोले, "जो कोई भी वहाँ है, हम भली-भाँति जानते है। हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उसकी स्त्री के। वह पीछे रह जानेवालों में से है।"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रिश्तों से कहा : इस बस्ती में, जिसके लोगों को तुम विनष्ट करना चाहते हो, लूत (भी) हैं और वह अत्याचारियों में से नहीं हैं। फ़रिश्तों ने कहा : हम उसे अधिक जानने वाले हैं, जो उसमें है। हम उन्हें और उनके परिवार को उस विनाश से अवश्य बचा लेंगे जो बस्ती के लोगों पर उतरने वाला है, सिवाय उनकी स्त्री के, जो विनाश होने वाले शेष लोगों में से है। अतः हम उसे (भी) उनके साथ नष्ट कर देंगे।
आयत 33
وَلَمَّآ أَن جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًۭا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًۭا وَقَالُوا۟ لَا تَخَفْ وَلَا تَحْزَنْ ۖ إِنَّا مُنَجُّوكَ وَأَهْلَكَ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
وَلَمَّآ
और जब
أَن
ये कि
جَآءَتْ
आ गए
رُسُلُنَا
भेजे हुए(फ़रिश्ते)हमारे
لُوطًۭا
लूत के पास
سِىٓءَ
वो परेशान हुआ
بِهِمْ
उनसे
وَضَاقَ
और वो तंग हुआ
بِهِمْ
उनसे
ذَرْعًۭا
दिल में
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَخَفْ
ना तुम डरो
وَلَا
और ना
تَحْزَنْ ۖ
तुम ग़म करो
إِنَّا
बेशक हम
مُنَجُّوكَ
निजात देने वाले हैं तुझे
وَأَهْلَكَ
और तेरे घर वालों को
إِلَّا
सिवाए
ٱمْرَأَتَكَ
तेरी बीवी के
كَانَتْ
है वो
مِنَ
(is) of
ٱلْغَـٰبِرِينَ
पीछे रहने वालों में से
जब यह हुआ कि हमारे भेजे हुए लूत के पास आए तो उनका आना उसे नागवार हुआ और उनके प्रति दिल को तंग पाया। किन्तु उन्होंने कहा, "डरो मत और न शोकाकुल हो। हम तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को बचा लेंगे सिवाय तुम्हारी स्त्री के। वह पीछे रह जानेवालों में से है
तफ़्सीर:
और जब लूत अलैहिस्सलाम की जाति को विनष्ट करने के लिए हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत अलैहिस्सलाम के पास आए, तो वह उनपर अपने समुदाय के दुराचरण के डर से उनके आने से दुःखी और ग़मगीन हो गए। क्योंकि फ़रिश्ते पुरुषों के रूप में आए थे और उनके समुदाय वाले कामवासना के लिए स्त्रियों के बजाय पुरुषों के पास आते थे। फ़रिश्तों ने उनसे कहा : मत डरो, तुम्हारी जाति के लोग तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। तथा जो कुछ हमने तुम्हें उनके विनाश के विषय में बतलाया है, उसपर शोक न करें। निःसंदेह हम तुम्हें तथा तुम्हारे परिवार को विनाश से बचा लेंगे, सिवाय तुम्हारी स्त्री के, जो विनाश के लिए शेष रह जाने वालों में से है। अतः हम उसे (भी) उनके साथ नष्ट कर देंगे।
आयत 34
إِنَّا مُنزِلُونَ عَلَىٰٓ أَهْلِ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةِ رِجْزًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ
إِنَّا
बेशक हम
مُنزِلُونَ
नाज़िल करने वाले हैं
عَلَىٰٓ
ऊपर
أَهْلِ
रहने वालों के
هَـٰذِهِ
इस
ٱلْقَرْيَةِ
बस्ती के
رِجْزًۭا
एक अज़ाब
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْسُقُونَ
वो नाफ़रमानी करते
निश्चय ही हम इस बस्ती के लोगों पर आकाश से एक यातना उतारनेवाले है, इस कारण कि वे बन्दगी की सीमा से निकलते रहे है।"
तफ़्सीर:
हम इस बस्ती वालों पर, जो कुकर्म किया करते थे, आकाश से एक यातना उतारने वाले हैं, जो कि पके हुए गर्म पत्थरों की यातना है; यह उनके घृणित कुकर्म करके अल्लाह की अवज्ञा करने पर सज़ा के रूप में है, वह कुकर्म उनका महिलाओं के बजाय पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाना है।
आयत 35
وَلَقَد تَّرَكْنَا مِنْهَآ ءَايَةًۢ بَيِّنَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
وَلَقَد
और अलबत्ता तहक़ीक़
تَّرَكْنَا
छोड़ दी हमने
مِنْهَآ
इसमें
ءَايَةًۢ
एक निशानी
بَيِّنَةًۭ
खुली
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
और हमने उस बस्ती से प्राप्त होनेवाली एक खुली निशानी उन लोगों के लिए छोड़ दी है, जो बुद्धि से काम लेना चाहे
तफ़्सीर:
निश्चय हमने इस बस्ती से, जिसे हमने मिटा दिया, उन लोगों के लिए एक स्पष्ट निशानी छोड़ दी, जो समझबूझ रखते हैं; क्योंकि वही लोग हैं जो निशानियों से सीख ग्रहण करते हैं।
आयत 36
وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًۭا فَقَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱرْجُوا۟ ٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
وَإِلَىٰ
और तरफ़
مَدْيَنَ
मदयन के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
شُعَيْبًۭا
शुऐब को(भेजा)
فَقَالَ
तो उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱرْجُوا۟
और उम्मीद रखो
ٱلْيَوْمَ
the Day
ٱلْـَٔاخِرَ
आख़िरी दिन की
وَلَا
और ना
تَعْثَوْا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُفْسِدِينَ
मुफ़सिद बन कर
और मदयन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो। और अंतिम दिन की आशा रखो और धरती में बिगाड़ फैलाते मत फिरो।"
तफ़्सीर:
और हमने मदयन की ओर उनके नसबी भाई शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा, तो उन्होंने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत करो और उसकी इबादत करके अंतिम दिन के प्रतिफल की आशा रखो, तथा पाप करके और उसे फैलाकर धरती में बिगाड़ न पैदा करो।
आयत 37
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دَارِهِمْ جَـٰثِمِينَ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठला दिया उसे
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلرَّجْفَةُ
एक ज़लज़ले ने
فَأَصْبَحُوا۟
तो सुबह की उन्होंने
فِى
in
دَارِهِمْ
अपने घरों में
جَـٰثِمِينَ
घुटनों के बल गिरने वाले
किन्तु उन्होंने उसे झुठला दिया। अन्ततः भूकम्प ने उन्हें आ लिया। और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए
तफ़्सीर:
लेकिन उनके समुदाय ने उनको झुठला दिया। अंततः भूकंप ने उनको आ लिया और वे अपने घरों में अपने मुँह के बल ऐसे गिरकर पड़े रह गए कि उनके मुख मिट्टी से चिपके हुए थे, वे हिल नहीं सकते थे।
आयत 38
وَعَادًۭا وَثَمُودَا۟ وَقَد تَّبَيَّنَ لَكُم مِّن مَّسَـٰكِنِهِمْ ۖ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَكَانُوا۟ مُسْتَبْصِرِينَ
وَعَادًۭا
और आद
وَثَمُودَا۟
और समूद को (हलाक किया)
وَقَد
और तहक़ीक़
تَّبَيَّنَ
वाज़ेह हो गई (हालत)
لَكُم
तुम पर
مِّن
from
مَّسَـٰكِنِهِمْ ۖ
उनके घरों से
وَزَيَّنَ
और मुज़य्यन कर दिए
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
فَصَدَّهُمْ
तो उसने रोक दिया उन्हें
عَنِ
from
ٱلسَّبِيلِ
रास्ते से
وَكَانُوا۟
और थे वो
مُسْتَبْصِرِينَ
बहुत देखने वाले / समझदार
और आद और समूद को भी हमने विनष्ट किया। और उनके घरों और बस्तियों के अवशेषों से तुमपर स्पष्ट हो चुका है। शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए सुहाना बना दिया और उन्हें संमार्ग से रोक दिया। यद्यपि वे बड़े तीक्ष्ण स्पष्ट वाले थे
तफ़्सीर:
तथा हमने हूद अलैहिस्सलाम की जाति आद और सालेह अलैहिस्सलाम की जाति समूद को भी विनष्ट किया। और (ऐ मक्का वालो!) तुम्हारे लिए हिज्र तथा हज़रामौत के शिह्र नामी स्थान में उनके आवासों से यह स्पष्ट हो चुका है, जो तुम्हें उनके विनाश का संकेत देता है। चुनाँचे उनके खाली आवास इस बात की गवाही देते हैं। तथा शैतान ने उनके कुफ़्र और अन्य पापों को जिनमें वे पड़े हुए थे, उनके लिए सुंदर बना दिया और उन्हें सीधे रास्ते से हटा दिया। हालाँकि उनके रसूलों के उन्हें सिखाने के कारण वे सत्य, पथभ्रष्टता, मार्गदर्शन तथा गुमराही की समझ रखने वाले थे। लेकिन उन्होंने मार्गदर्शन के पालन पर इच्छा के पालन को चुना।
आयत 39
وَقَـٰرُونَ وَفِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كَانُوا۟ سَـٰبِقِينَ
وَقَـٰرُونَ
और क़ारून
وَفِرْعَوْنَ
और फ़िरऔन
وَهَـٰمَـٰنَ ۖ
और हामान
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَهُم
आए उनके पास
مُّوسَىٰ
मूसा
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह निशानियों के
فَٱسْتَكْبَرُوا۟
तो उन्होंने तकब्बुर किया
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
سَـٰبِقِينَ
भाग जाने वाले (हमसे)
और क़ारून और फ़िरऔन और हामान को हमने विनष्ट किया। मूसा उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आया। किन्तु उन्होंने धरती में घमंड किया, हालाँकि वे हमसे निकल जानेवाले न थे
तफ़्सीर:
और (जब क़ारून ने मूसा अलैहिस्सलाम की जाति पर अत्याचार किया, तो) हमने उसे तथा उसके घर को धरती में धँसाकर नाश कर दिया। तथा फ़िरऔन और उसके मंत्री हामान को समुद्र में डुबोकर नाश किया। निःसंदेह मूसा अलैहिस्सलाम उनके पास अपनी सच्चाई को दर्शाने वाली स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए। परंतु उन लोगों ने मिस्र की भूमि में उनपर ईमान लाने से अभिमान दिखाया। और वे हमसे छूटकर हमारे दंड से बच नहीं सकते थे।
आयत 40
فَكُلًّا أَخَذْنَا بِذَنۢبِهِۦ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِ حَاصِبًۭا وَمِنْهُم مَّنْ أَخَذَتْهُ ٱلصَّيْحَةُ وَمِنْهُم مَّنْ خَسَفْنَا بِهِ ٱلْأَرْضَ وَمِنْهُم مَّنْ أَغْرَقْنَا ۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
فَكُلًّا
तो हर एक को
أَخَذْنَا
पकड़ लिया हमने
بِذَنۢبِهِۦ ۖ
बवजह उसके गुनाह के
فَمِنْهُم
तो उनमें से कोई है
مَّنْ
जो
أَرْسَلْنَا
भेजी हमने
عَلَيْهِ
जिस पर
حَاصِبًۭا
पत्थरों की आँधी
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّنْ
जो
أَخَذَتْهُ
पकड़ लिया उसको
ٱلصَّيْحَةُ
चिंघाड़ ने
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّنْ
जो
خَسَفْنَا
धँसा दिया हमने
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّنْ
जिसे
أَغْرَقْنَا ۚ
ग़र्क़ कर दिया हमने
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَظْلِمَهُمْ
कि वो ज़ुल्म करे उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी ही जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
अन्ततः हमने हरेक को उसके अपने गुनाह के कारण पकड़ लिया। फिर उनमें से कुछ पर तो हमने पथराव करनेवाली वायु भेजी और उनमें से कुछ को एक प्रचंड चीत्कार न आ लिया। और उनमें से कुछ को हमने धरती में धँसा दिया। और उनमें से कुछ को हमने डूबो दिया। अल्लाह तो ऐसा न था कि उनपर ज़ुल्म करता, किन्तु वे स्वयं अपने आपपर ज़ुल्म कर रहे थे
तफ़्सीर:
अतः हमने उक्त समुदायों में से प्रत्येक को अपनी विनाशकारी यातना के द्वारा पकड़ लिया। उनमें लूत के समुदाय के लोग थे, जिनपर हमने ताबड़-तोड़ कंकरीले पत्थर बरसाए, उनमें सालेह के समुदाय और शुऐब के समुदाय थे, जिन्हें चीख ने पकड़ लिया, उनमें क़ारून था जिसे हमने उसके घर समेत धरती में धँसा दिया, तथा उनमें नूह के समुदाय के लोग, फ़िरऔन और हामान भी थे, जिन्हें हमने डुबो कर विनष्ट कर दिया। अल्लाह ऐसा न था कि उन्हें बिना पाप के नष्ट करके उन पर अत्याचार करे, परंतु वे पाप करके स्वयं अपने आपपर अत्याचार कर रहे थे, इसलिए वे दंड के पात्र थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत की कौम की तबाही और कई कौमों का मुख्तसर ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर कौम को उसके अमल के मुताबिक अंजाम मिला, यह हमें अपने अमल पर गौर करने की तरगीब देता है।
आयत 41
مَثَلُ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوْلِيَآءَ كَمَثَلِ ٱلْعَنكَبُوتِ ٱتَّخَذَتْ بَيْتًۭا ۖ وَإِنَّ أَوْهَنَ ٱلْبُيُوتِ لَبَيْتُ ٱلْعَنكَبُوتِ ۖ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
مَثَلُ
मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिए
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَوْلِيَآءَ
कुछ वली/ दोस्त
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
ٱلْعَنكَبُوتِ
एक मकड़ी के है
ٱتَّخَذَتْ
जिसने बना लिया
بَيْتًۭا ۖ
एक घर
وَإِنَّ
और बेशक
أَوْهَنَ
सब से कमज़ोर
ٱلْبُيُوتِ
घरों में
لَبَيْتُ
अलबत्ता घर है
ٱلْعَنكَبُوتِ ۖ
मकड़ी का
لَوْ
काश कि
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो इल्म रखते
जिन लोगों ने अल्लाह से हटकर अपने दूसरे संरक्षक बना लिए है उनकी मिसाल मकड़ी जैसी है, जिसने अपना एक घर बनाया, और यह सच है कि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का घर ही होता है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते!
तफ़्सीर:
उन मुश्रिकों का उदाहरण, जो अल्लाह के अलावा मूर्तियाँ बनाकर उनके लाभ या उनकी सिफारिश की आशा में उनकी पूजा करते हैं, मकड़ी के उदाहरण के समान है, जिसने एक घर बनाया ताकि उसे आक्रमण से बचाए। हालाँकि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का घर है, इसलिए वह उसे शत्रु से सुरक्षा प्रदान नहीं करता। यही हाल उनकी मूर्तियों का है, वे न लाभ पहुँचाती हैं, न हानि और न ही सिफ़ारिश कर सकती हैं। यदि मुश्रिक लोग इसे जानते होते, तो वे मूर्तियाँ बनाकर अल्लाह के सिवा उनकी पूजा नहीं करते।
आयत 42
إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍۢ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जिसे
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
مِن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مِن
any
شَىْءٍۢ ۚ
किसी भी चीज़ को
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
निस्संदेह अल्लाह उन चीज़ों को भली-भाँति जानता है, जिन्हें ये उससे हटकर पुकारते है। वह तो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
निश्चय पवित्र एवं सर्वोच्च अल्लाह जनता है जिसे वे उसके अलावा पूजते हैं। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। तथा वह सबपर प्रभुत्वशाली है जिसे पराजित नहीं किया जा सकता, अपनी रचना, नियति और प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 43
وَتِلْكَ ٱلْأَمْثَـٰلُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ ۖ وَمَا يَعْقِلُهَآ إِلَّا ٱلْعَـٰلِمُونَ
وَتِلْكَ
और ये
ٱلْأَمْثَـٰلُ
मिसालें हैं
نَضْرِبُهَا
हम बयान करते हैं उन्हें
لِلنَّاسِ ۖ
लोगों के लिए
وَمَا
और नहीं
يَعْقِلُهَآ
समझते उन्हें
إِلَّا
मगर
ٱلْعَـٰلِمُونَ
इल्म रखने वाले
ये मिसालें हम लोगों के लिए पेश करते है, परन्तु इनको ज्ञानवान ही समझते है
तफ़्सीर:
हम इन उदाहरणों को लोगों के लिए प्रस्तुत करते हैं, ताकि उन्हें जगाया जा सके, उन्हें सच्चाई से अवगत कराया जा सके और उसकी ओर उनका मार्गदर्शन किया जा सके। और इन्हें ठीक से वही समझ सकते हैं, जो अल्लाह की शरीयत और उसकी हिकमतों को जानने वाले हैं।
आयत 44
خَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों को
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
अल्लाह ने आकाशों और धरती को सत्य के साथ पैदा किया। निश्चय ही इसमें ईमानवालों के लिए एक बड़ी निशानी है
तफ़्सीर:
पवित्र एवं सर्वोच्च अल्लाह ने आकाशों तथा धरती को सत्य के साथ पैदा किया, उसने उन्हें असत्य के साथ और व्यर्थ नहीं बनाया। निश्चय इस रचना में मोमिनों के लिए अल्लाह की शक्ति की स्पष्ट निशानी है। क्योंकि केवल ईमानवाले ही अल्लाह की सृष्टि को पवित्र सृष्टिकर्ता के अस्तित्व के लिए प्रमाण बनाते हैं। रही बात काफिरों की, तो वे क्षितिज (ब्रह्मांड) में तथा स्वंय अपने भीतर मौजूद निशानियों से यूँ ही गुज़र जाते हैं, वे सृष्टिकर्ता की महानता और उसकी क्षमता की ओर उनका ध्यान आकर्षित नहीं करती हैं।
आयत 45
ٱتْلُ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ ۖ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ تَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ ۗ وَلَذِكْرُ ٱللَّهِ أَكْبَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَصْنَعُونَ
ٱتْلُ
तिलावत कीजिए
مَآ
जो
أُوحِىَ
वही किया गया
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
مِنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
وَأَقِمِ
और क़ायम कीजिए
ٱلصَّلَوٰةَ ۖ
नमाज़
إِنَّ
बेशक
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
تَنْهَىٰ
रोकती है
عَنِ
from
ٱلْفَحْشَآءِ
बेहयाई से
وَٱلْمُنكَرِ ۗ
और बुराई से
وَلَذِكْرُ
और अलबत्ता ज़िक्र
ٱللَّهِ
अल्लाह का
أَكْبَرُ ۗ
सबसे बड़ा है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
تَصْنَعُونَ
तुम करते हो
उस किताब को पढ़ो जो तुम्हारी ओर प्रकाशना के द्वारा भेजी गई है, और नमाज़ का आयोजन करो। निस्संदेह नमाज़ अश्लीलता और बुराई से रोकती है। और अल्लाह का याद करना तो बहुत बड़ी चीज़ है। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम रचते और बनाते हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप लोगों के समक्ष उस क़ुरआन को पढ़ें, जिसकी अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य की है, तथा सबसे पूर्ण तरीके से नमाज़ अदा करें। बेशक पूर्ण विधि के साथ पढ़ी जाने वाली नमाज़ उसके पढ़ने वाले को पापों तथा बुराइयों में पड़ने से रोकती है; क्योंकि यह दिल के अंदर एक प्रकाश पैदा कर देती है, जो पाप करने से रोकता है और अच्छे कर्म करने के लिए मार्गदर्शन करता है। और निश्चय अल्लाह का स्मरण हर चीज से बड़ा और महान है। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे जानता है, तुम्हारे कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का प्रतिफल देगा, यदि भला है, तो भला (बदला) और यदि बुरा है, तो बुरा (बदला)।
आयत 46
۞ وَلَا تُجَـٰدِلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ ۖ وَقُولُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱلَّذِىٓ أُنزِلَ إِلَيْنَا وَأُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَـٰهُنَا وَإِلَـٰهُكُمْ وَٰحِدٌۭ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ
۞ وَلَا
और ना
تُجَـٰدِلُوٓا۟
तुम झगड़ा करो
أَهْلَ
(with the) People of the Book
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब से
إِلَّا
मगर
بِٱلَّتِى
उस तरीक़े से जो
هِىَ
वो
أَحْسَنُ
सबसे अच्छा है
إِلَّا
सिवाए
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مِنْهُمْ ۖ
उनमें से
وَقُولُوٓا۟
और कहो
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱلَّذِىٓ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْنَا
हमारी तरफ़
وَأُنزِلَ
और नाज़िल किया गया
إِلَيْكُمْ
तुम्हारी तरफ़
وَإِلَـٰهُنَا
और इलाह हमारा
وَإِلَـٰهُكُمْ
और इलाह तुम्हारा
وَٰحِدٌۭ
एक ही है
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी के
مُسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
और किताबवालों से बस उत्तम रीति ही से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमें ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है - और कहो - "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो अवतरित हुई और तुम्हारी ओर भी अवतरित हुई। और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी है।"
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) तुम यहूदियों और ईसाइयों के साथ सबसे अच्छे एवं आदर्श तरीक़े से ही संवाद और वाद-विवाद करो, और वह उपदेश और स्पष्ट तर्कों के साथ इस्लाम की ओर बुलाना है। परंतु उनमें से जिन लोगों ने हठ और अहंकार के साथ अन्याय किया और तुम्हारे ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी, तो तुम उनसे लड़ाई करो, यहाँ तक कि वे इस्लाम ग्रहण कर लें या अपमानित होकर 'जिज़्या' अदा करें। तथा यहूदियों एवं ईसाइयों से कहो : हम उस क़ुरआन पर ईमान रखते हैं, जो अल्लाह ने हमारी ओर उतारा है, तथा हम उस तौरात एवं इंजील पर भी ईमान रखते हैं, जो तुम्हारी ओर उतारे गए हैं। तथा हमारा और तुम्हारा पूज्य एक ही है, जिसकी पूज्यता, परमेश्वरत्व और पूर्णता में उसका कोई साझीदार नहीं है। और हम अकेले उसी के प्रति आज्ञाकारी और विनम्र हैं।
आयत 47
وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ ۚ فَٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَمِنْ هَـٰٓؤُلَآءِ مَن يُؤْمِنُ بِهِۦ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَّا ٱلْكَـٰفِرُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَنزَلْنَآ
नाज़िल की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ٱلْكِتَـٰبَ ۚ
किताब
فَٱلَّذِينَ
पस वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
بِهِۦ ۖ
उस पर
وَمِنْ
And among
هَـٰٓؤُلَآءِ
और उनमें से भी हैं
مَن
जो
يُؤْمِنُ
ईमान लाते हैं
بِهِۦ ۚ
इस पर
وَمَا
और नहीं
يَجْحَدُ
इन्कार करते
بِـَٔايَـٰتِنَآ
हमारी आयात का
إِلَّا
मगर
ٱلْكَـٰفِرُونَ
जो काफ़िर हैं
इसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर किताब अवतरित की है, तो जिन्हें हमने किताब प्रदान की है वे उसपर ईमान लाएँगे। उनमें से कुछ उसपर ईमान ला भी रहे है। हमारी आयतों का इनकार तो केवल न माननेवाले ही करते है
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने आपसे पहले के नबियों पर किताबें उतारी थीं, उसी तरह हमने आप पर क़ुरआन उतारा है। तो तौरात पढ़ने वालों में से कुछ लोग (जैसे कि अब्दुल्लाह बिन सलाम) इसपर ईमान रखते हैं; क्योंकि वे अपनी किताबों में आपका विवरण पाते हैं। तथा इन मुश्रिकों में से भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो इसपर ईमान रखते हैं। और हमारी आयतों का इनकार केवल वही काफ़िर करते हैं, जो सत्य के स्पष्ट होने के बावजूद उसके इनकार के रास्ते पर चलने के आदी हैं।
आयत 48
وَمَا كُنتَ تَتْلُوا۟ مِن قَبْلِهِۦ مِن كِتَـٰبٍۢ وَلَا تَخُطُّهُۥ بِيَمِينِكَ ۖ إِذًۭا لَّٱرْتَابَ ٱلْمُبْطِلُونَ
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
تَتْلُوا۟
आप पढ़ते
مِن
before it
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
مِن
any
كِتَـٰبٍۢ
कोई किताब
وَلَا
और ना
تَخُطُّهُۥ
आप लिखते थे उसे
بِيَمِينِكَ ۖ
अपने दाऐं हाथ से
إِذًۭا
तब
لَّٱرْتَابَ
अलबत्ता शक में पड़ जाते
ٱلْمُبْطِلُونَ
बातिल परस्त
इससे पहले तुम न कोई किताब पढ़ते थे और न उसे अपने हाथ से लिखते ही थे। ऐसा होता तो ये मिथ्यावादी सन्देह में पड़ सकते थे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप क़ुरआन से पहले न कोई किताब पढ़ेते थे और न अपने दाहिने हाथ से कुछ लिखते थे। क्योंकि आप 'उम्मी' (अनपढ़) हैं, लिखना और पढ़ना नहीं जानते हैं।और अगर आप पढ़ना और लिखना जानते होते, तो अज्ञानी लोग आपकी नुबुव्वत के बारे में अवश्य संदेह करते और यह तर्क देते कि आप पिछली किताबों की बातें लिखा करते थे।
आयत 49
بَلْ هُوَ ءَايَـٰتٌۢ بَيِّنَـٰتٌۭ فِى صُدُورِ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَّا ٱلظَّـٰلِمُونَ
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो
ءَايَـٰتٌۢ
आयात हैं
بَيِّنَـٰتٌۭ
वाज़ेह
فِى
in
صُدُورِ
सीनों में
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ ۚ
इल्म
وَمَا
और नहीं
يَجْحَدُ
इन्कार करते
بِـَٔايَـٰتِنَآ
हमारी आयात का
إِلَّا
मगर
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
नहीं, बल्कि वे तो उन लोगों के सीनों में विद्यमान खुली निशानियाँ है, जिन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ है। हमारी आयतों का इनकार तो केवल ज़ालिम ही करते है
तफ़्सीर:
बल्कि आप पर उतरने वाला क़ुरआन स्पष्ट आयतों पर आधारित है, जो उन ईमान वाले लोगों के दिलों में सुरक्षित है, जिन्हें ज्ञान दिया गया है। और हमारी आयतों का इनकार केवल वही लोग करते हैं, जो अल्लाह के साथ कुफ़्र और शिर्क करके अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 50
وَقَالُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ ءَايَـٰتٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ ۖ قُلْ إِنَّمَا ٱلْـَٔايَـٰتُ عِندَ ٱللَّهِ وَإِنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَوْلَآ
क्यों नहीं
أُنزِلَ
उतारी गईं
عَلَيْهِ
उस पर
ءَايَـٰتٌۭ
निशानियाँ
مِّن
from
رَّبِّهِۦ ۖ
उसके रब की तरफ़ से
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْـَٔايَـٰتُ
निशानियाँ
عِندَ
पास हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَإِنَّمَآ
और बेशक
أَنَا۠
मैं तो
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
उनका कहना है कि "उसपर उसके रब की ओर से निशानियाँ क्यों नहीं अवतरित हुई?" कह दो, "निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास है। मैं तो केवल स्पष्ट रूप से सचेत करनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
और मुश्रिकों ने कहा : मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उनके पालनहार की ओर से कुछ निशानियाँ (चमत्कार) क्यों नहीं उतारी गईं, जैसे कि उनसे पहले के रसूलों पर उतारी गई थीं? (ऐ रसूल!) आप इन प्रस्तावकों से कह दें : निशानियाँ तो केवल अल्लाह के हाथ में हैं, वह जब चाहे उन्हें उतारता है। उन्हें उतारना मेरा काम नहीं है। मैं तो मात्र तुम्हें, स्पष्ट रूप से, अल्लाह की यातना से डराने वाला हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मकड़ी के जाले की मशहूर मिसाल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के सिवा किसी और पर भरोसा रखना मकड़ी के कमज़ोर जाले जैसा है, जो असल में कोई मज़बूत सहारा नहीं देता।
आयत 51
أَوَلَمْ يَكْفِهِمْ أَنَّآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَرَحْمَةًۭ وَذِكْرَىٰ لِقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَكْفِهِمْ
काफ़ी उन्हें
أَنَّآ
बेशक हम
أَنزَلْنَا
नाज़िल की हमने
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يُتْلَىٰ
जो पढ़ी जाती है
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इस में
لَرَحْمَةًۭ
अलबत्ता रहमत
وَذِكْرَىٰ
और नसीहत है
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुमपर किताब अवतरित की, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? निस्संदेह उसमें उन लोगों के लिए दयालुता है और अनुस्मृति है जो ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
क्या निशानियों का प्रस्ताव देने वाले इन लोगों के लिए यह काफ़ी नहीं है कि हमने (ऐ रसूल) आपपर क़ुरआन उतारा है, जो उनके सामने पढ़ा जाता है? निःसंदेह उनपर उतरने वाले क़ुरआन में उन लोगों के लिए दया और उपदेश है, जो ईमान रखते हैं। क्योंकि वही लोग क़ुरआन की शिक्षाओं से लाभान्वित होते हैं। इसलिए जो कुछ उनपर उतारा गया है, वह उनके द्वारा सुझाई गई पिछले रसूलों पर उतरने वाली निशानियों से कहीं बेहतर है।
आयत 52
قُلْ كَفَىٰ بِٱللَّهِ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ شَهِيدًۭا ۖ يَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱلْبَـٰطِلِ وَكَفَرُوا۟ بِٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
كَفَىٰ
काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكُمْ
और दर्मियान तुम्हारे
شَهِيدًۭا ۖ
गवाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन में है
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱلْبَـٰطِلِ
बातिल पर
وَكَفَرُوا۟
और उन्होंने कुफ़्र किया
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह के रूप में काफ़ी है।" वह जानता है जो कुछ आकाशों और धरती में है। जो लोग असत्य पर ईमान लाए और अल्लाह का इनकार किया वही है जो घाटे में है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दें : मैं जो कुछ लेकर आया हूँ, उसमें मेरी सच्चाई पर तथा तुम्हारे उसे झुठलाने पर अल्लाह गवाह के तौर पर काफ़ी है। वह आकाशों में मौजूद सारी चीज़ों और धरती की सारी चीज़ों को जानता है। उन दोनों में से कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। तथा जिन लोगों ने असत्य अर्थात् अल्लाह के अलावा पूजी जाने वाली प्रत्येक चीज़ को माना और एकमात्र इबादत के हक़दार अल्लाह का इनकार किया, वही लोग घाटे में पड़ने वाले हैं, क्योंकि उन्होंने ईमान के बदले कुफ़्र को चुना है।
आयत 53
وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِٱلْعَذَابِ ۚ وَلَوْلَآ أَجَلٌۭ مُّسَمًّۭى لَّجَآءَهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَيَأْتِيَنَّهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
وَيَسْتَعْجِلُونَكَ
और वो जल्दी माँगते हैं आपसे
بِٱلْعَذَابِ ۚ
अज़ाब
وَلَوْلَآ
और अगर ना होती
أَجَلٌۭ
मुद्दत
مُّسَمًّۭى
मुक़र्रर
لَّجَآءَهُمُ
अलबत्ता आ जाता उनके पास
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
وَلَيَأْتِيَنَّهُم
और अलबत्ता वो ज़रूर आएगा उनके पास
بَغْتَةًۭ
अचानक
وَهُمْ
इस हाल में कि
لَا
(do) not
يَشْعُرُونَ
वो शऊर ना रखते होंगे
वे तुमसे यातना के लिए जल्दी मचा रहे है। यदि इसका एक नियत समय न होता तो उनपर अवश्य ही यातना आ जाती। वह तो अचानक उनपर आकर रहेगी कि उन्हें ख़बर भी न होगी
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आपने मुश्रिकों को जिस यातना से डराया है, वे आपसे उसके लिए जल्दी मचा रहे हैं। अगर अल्लाह ने उनकी यातना के लिए एक समय निर्धारित न किया होता, जिससे वह आगे-पीछे नहीं हो सकती, तो उनके पास वह यातना अवश्य आ जाती, जिसकी वे माँग कर रहे हैं। तथा निश्चित रूप से वह उनपर अचानक अवश्य आएगी, जबकि उन्हें उसका अनुमान भी न होगा।
आयत 54
يَسْتَعْجِلُونَكَ بِٱلْعَذَابِ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ
يَسْتَعْجِلُونَكَ
वो जल्दी माँगते हैं आपसे
بِٱلْعَذَابِ
अज़ाब
وَإِنَّ
और बेशक
جَهَنَّمَ
जहन्नम
لَمُحِيطَةٌۢ
अलबत्ता घेरने वाली है
بِٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
वे तुमसे यातना के लिए जल्दी मचा रहे है, हालाँकि जहन्नम इनकार करनेवालों को अपने घेरे में लिए हुए है
तफ़्सीर:
वे लोग आपसे उस यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं, जिसका आपने उनसे वादा किया है। हालाँकि जहन्नम, जिसका अल्लाह ने काफ़िरों से वादा किया है, निश्चित रूप से उन्हें घेरने वाला है, जिसकी यातना से वे बच नहीं सकते।
आयत 55
يَوْمَ يَغْشَىٰهُمُ ٱلْعَذَابُ مِن فَوْقِهِمْ وَمِن تَحْتِ أَرْجُلِهِمْ وَيَقُولُ ذُوقُوا۟ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
يَغْشَىٰهُمُ
ढाँप लेगा उन्हें
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
مِن
from
فَوْقِهِمْ
उनके ऊपर से
وَمِن
and from
تَحْتِ
और नीचे से
أَرْجُلِهِمْ
उनके पाँव के
وَيَقُولُ
और वो फ़रमाएगा
ذُوقُوا۟
चखो
مَا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
जिस दिन यातना उन्हें उनके ऊपर से ढाँक लेगी और उनके पाँव के नीचे से भी, और वह कहेगा, "चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम करते रहे हो!"
तफ़्सीर:
जिस दिन यातना उन्हें उनके ऊपर से ढाँप लेगी और उनके पैरों के नीचे उनके लिए बिस्तर बन जाएगी, और अल्लाह उन्हें फटकारते हुए कहेगा : तुम जो शिर्क और पाप किया करते थे, उसका प्रतिफल चखो।
आयत 56
يَـٰعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ أَرْضِى وَٰسِعَةٌۭ فَإِيَّـٰىَ فَٱعْبُدُونِ
يَـٰعِبَادِىَ
ऐ मेरे बन्दों
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِنَّ
बेशक
أَرْضِى
मेरी ज़मीन
وَٰسِعَةٌۭ
वसीअ है
فَإِيَّـٰىَ
पस सिर्फ़ मेरी ही
فَٱعْبُدُونِ
पस तुम इबादत करो मेरी
ऐ मेरे बन्दों, जो ईमान लाए हो! निस्संदेह मेरी धरती विशाल है। अतः तुम मेरी ही बन्दगी करो
तफ़्सीर:
ऐ मेरे बंदो जो मुझपर ईमान लाए हो, उस धरती से हिजरत (पलायन) कर जाओ, जहाँ तुम मेरी इबादत नहीं कर सकते। निःसंदेह मेरी धरती विशाल है। इसलिए अकेले मेरी ही इबादत करो और किसी को भी मेरा साझी न बनाओ।
आयत 57
كُلُّ نَفْسٍۢ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۖ ثُمَّ إِلَيْنَا تُرْجَعُونَ
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
ذَآئِقَةُ
चखने वाला है
ٱلْمَوْتِ ۖ
मौत को
ثُمَّ
फिर
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे ही
تُرْجَعُونَ
तुम सब लौटाए जाओगे
प्रत्येक जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। फिर तुम हमारी ओर वापस लौटोगे
तफ़्सीर:
मृत्यु का डर तुम्हें हिजरत से न रोके। क्योंकि हर प्राणी मृत्यु का स्वाद चखने वाला है। फिर तुम्हें क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए हमारे ही पास लौटकर आना है।
आयत 58
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُبَوِّئَنَّهُم مِّنَ ٱلْجَنَّةِ غُرَفًۭا تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ نِعْمَ أَجْرُ ٱلْعَـٰمِلِينَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَنُبَوِّئَنَّهُم
अलबत्ता हम ज़रूर ठिकाना देंगे उन्हें
مِّنَ
in
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत के
غُرَفًۭا
बालाख़ाने
تَجْرِى
बहती होंगी
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उनमें
نِعْمَ
कितना अच्छा है
أَجْرُ
अजर
ٱلْعَـٰمِلِينَ
अमल करने वालों का
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें हम जन्नत की ऊपरी मंज़िल के कक्षों में जगह देंगे, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। वे उसमें सदैव रहेंगे। क्या ही अच्छा प्रतिदान है कर्म करनेवालों का!
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उससे निकट करने वाले अच्छे कार्य किए, हम उन्हें जन्नत में ऊँचे-ऊँचे भवनों में निवास देंगे, जिनके नीचे से नहरे बहती हैं। वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे, उनमें उन्हें विनाश का सामना नहीं होगा। अल्लाह की आज्ञा के अनुसार काम करने वालों का यह क्या ही अच्छा बदला है।
आयत 59
ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
صَبَرُوا۟
सब्र किया
وَعَلَىٰ
and upon
رَبِّهِمْ
और अपने रब पर ही
يَتَوَكَّلُونَ
वो तवक्कल करते हैं
जिन्होंने धैर्य से काम लिया और जो अपने रब पर भरोसा रखते है
तफ़्सीर:
अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाले उन लोगों का बदला क्या ही अच्छा है, जिन्होंने उसकी आज्ञाकारिता पर और उसकी अवज्ञा से बचने पर धैर्य से काम लिया, तथा वे अपने सभी कामों में केवल अपने पालनहार ही पर भरोसा रखते हैं।
आयत 60
وَكَأَيِّن مِّن دَآبَّةٍۢ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا ٱللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
وَكَأَيِّن
और कितने ही
مِّن
of
دَآبَّةٍۢ
जानदार हैं
لَّا
(does) not
تَحْمِلُ
नहीं वो उठाते
رِزْقَهَا
रिज़्क़ अपना
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَرْزُقُهَا
रिज़्क़ देता है उन्हें
وَإِيَّاكُمْ ۚ
और तुम्हें भी
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
कितने ही चलनेवाले जीवधारी है, जो अपनी रोज़ी उठाए नहीं फिरते। अल्लाह ही उन्हें रोज़ी देता है और तुम्हें भी! वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
धरती पर चलने वाले सभी जानवर - अपनी बहुतायत के बावजूद - जो अपनी रोज़ी एकत्र नहीं कर सकते और न ही उसे उठा सकते हैं, अल्लाह उन्हें जीविका प्रदान करता है और तुम्हें भी जीविका प्रदान करता है। इसलिए तुम्हारे लिए भूख के डर से हिजरत छोड़ने के लिए कोई बहाना नहीं है। वह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे इरादों और कार्यों को जानने वाला है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन के एक निशानी के तौर पर काफी होने और हिजरत करने वालों की फ़ज़ीलत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बेहतर दीनी माहौल की तलाश में उठाया गया कदम अल्लाह के यहां कीमती है।
आयत 61
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
سَأَلْتَهُم
पूछें आप उनसे
مَّنْ
किस ने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र किया
ٱلشَّمْسَ
सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से
يُؤْفَكُونَ
वो फेरे जाते हैं
और यदि तुम उनसे पूछो कि "किसने आकाशों और धरती को पैदा किया और सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगाया?" तो वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह ने!" फिर वे किधर उलटे फिरे जाते है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) यदि आप इन मुश्रिकों से पूछें कि आकाशों को किसने पैदा किया? और धरती को किसने पैदा किया? तथा सूर्य और चाँद को किसने वशीभूत किया, जो एक-दूसरे के बाद आते-जाते हैं? तो वे अवश्य कहेंगे : उन्हें अल्लाह ने पैदा किया है। तो फिर वे अकेले अल्लाह पर ईमान लाने से कैसे फेर दिए जाते हैं और उसके सिवा ऐसे देवताओं की पूजा करते हैं, जो किसी लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं?
आयत 62
ٱللَّهُ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ لَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَبْسُطُ
वो फैलाता देता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़ को
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों में से
وَيَقْدِرُ
और वो तंग कर देता है
لَهُۥٓ ۚ
उसके लिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
अल्लाह अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है आजीविका विस्तीर्ण कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। निस्संदेह अल्लाह हरेक चीज़ को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने बंदों में से जिसपर चाहता है जीविका का विस्तार कर देता है और जिसपर चाहता है जीविका तंग कर देता है; वह ऐसा किसी हिकमत के तहत करता है जिसे वही जानता है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ को अच्छी तरह जानने वाला है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। इसलिए उसके बंदों के लिए उपयुक्त कोई भी उपाय उससे गुप्त नहीं है।
आयत 63
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۚ قُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
سَأَلْتَهُم
पूछें आप उनसे
مَّن
किसने
نَّزَّلَ
नाज़िल किया
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَحْيَا
फिर उसने ज़िन्दा किया
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
مَوْتِهَا
उसकी मौत के
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
قُلِ
कह दीजिए
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह के लिए है
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल रखते
और यदि तुम उनसे पूछो कि "किसने आकाश से पानी बरसाया; फिर उसके द्वारा धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित किया?" तो वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह ने!" कहो, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है।" किन्तु उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) यदि आप मुश्रिकों से पूछें : किसने आकाश से बारिश बरसाई, फिर उसके द्वारा धरती पर पौधे उगा दिए, जबकि वह बंजर पड़ी थी? तो वे अवश्य कहेंगे : आसमान से बारिश बरसाने वाला और धरती पर पौधे उगाने वाला अल्लाह है। (ऐ रसलू) आप कह दें : हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने तुम्हारे खिलाफ तर्क को स्पष्ट कर दिया। बल्कि बात यह है कि उनमें से अधिकतर लोग नहीं समझते हैं। क्योंकि अगर वे समझते होते, तो उन मूर्तियों को अल्लाह का साझी न बनाते, जो न लाभ पहुँचा सकती हैं और न हानि।
आयत 64
وَمَا هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا لَهْوٌۭ وَلَعِبٌۭ ۚ وَإِنَّ ٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ لَهِىَ ٱلْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
وَمَا
और नहीं
هَـٰذِهِ
ये
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَآ
दुनिया की
إِلَّا
मगर
لَهْوٌۭ
शुग़ल
وَلَعِبٌۭ ۚ
और खेल
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلدَّارَ
घर
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत का
لَهِىَ
अलबत्ता वो ही
ٱلْحَيَوَانُ ۚ
ज़िन्दगी है
لَوْ
काश
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो इल्म रखते
और यह सांसारिक जीवन तो केवल दिल का बहलावा और खेल है। निस्संदेह पश्चात्वर्ती घर (का जीवन) ही वास्तविक जीवन है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते!
तफ़्सीर:
और यह सांसारिक जीवन (जिसमें उसकी मनपसंद चीज़ें और लाभ के सामान शामिल हैं) उन लोगों के दिलों के लिए, जो इससे चिपके हुए हैं, केवल मनोरंजन और खेल है, जो जल्द ही समाप्त हो जाता है। और निश्चित रूप से आखिरत का घर ही वास्तविक जीवन है, क्योंकि वही बाक़ी रहने वाला है। अगर वे इस तथ्य से अवगत होते, तो नाश होने वाले को बाक़ी रहने वाले पर प्राथमिकता न देते।
आयत 65
فَإِذَا رَكِبُوا۟ فِى ٱلْفُلْكِ دَعَوُا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمْ إِلَى ٱلْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ
فَإِذَا
फिर जब
رَكِبُوا۟
वो सवार होते हैं
فِى
[in]
ٱلْفُلْكِ
कश्ती में
دَعَوُا۟
वो पुकारते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
مُخْلِصِينَ
ख़ालिस करने वाले हो कर
لَهُ
उसके लिए
ٱلدِّينَ
दीन को
فَلَمَّا
तो जब
نَجَّىٰهُمْ
वो निजात देता है उन्हें
إِلَى
to
ٱلْبَرِّ
तरफ़ ख़ुश्की के
إِذَا
यकायक
هُمْ
वो
يُشْرِكُونَ
वो शिर्क करने लगते हैं
जब वे नौका में सवार होते है तो वे अल्लाह को उसके दीन (आज्ञापालन) के लिए निष्ठा वान होकर पुकारते है। किन्तु जब वह उन्हें बचाकर शु्ष्क भूमि तक ले आता है तो क्या देखते है कि वे लगे (अल्लाह का साथ) साझी ठहराने
तफ़्सीर:
जब मुश्रिक लोग समुद्र में नौकाओं पर सवार होते हैं, तो निष्ठापूर्वक अकेले अल्लाह ही को पुकारते हैं कि उन्हें डूबने से बचा ले। फिर जब वह उन्हें डूबने से बचा लेता है, तो वे बहुदेववादी हो जाते हैं उसके साथ अपने देवताओं को पुकारने लगते हैं।
आयत 66
لِيَكْفُرُوا۟ بِمَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا۟ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
لِيَكْفُرُوا۟
ताकि वो नाशुक्री करें
بِمَآ
उसकी जो
ءَاتَيْنَـٰهُمْ
दिया हमने उन्हें
وَلِيَتَمَتَّعُوا۟ ۖ
और ताकि वो फ़ायदा उठा लें
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
ताकि जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसके प्रति वे इस तरह कृतघ्नता दिखाएँ, और ताकि इस तरह से मज़े उड़ा ले। अच्छा तो वे शीघ्र ही जान लेंगे
तफ़्सीर:
वे बहुदेववादी हो जाते हैं, ताकि हमारी दी हुई नेमतों की नाशुक्री करें और सांसारिक जीवन की शोभा का आनंद लें। अतः जब वे मरेंगे तो अपने बुरे परिणाम को जान लेंगे।
आयत 67
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا ءَامِنًۭا وَيُتَخَطَّفُ ٱلنَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْ ۚ أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ ٱللَّهِ يَكْفُرُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَا
बनाया हमने
حَرَمًا
हरम को
ءَامِنًۭا
अमन वाला
وَيُتَخَطَّفُ
और उचक लिए जाते हैं
ٱلنَّاسُ
लोग
مِنْ
around them
حَوْلِهِمْ ۚ
उनके इर्द-गिर्द से
أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ
क्या फिर बातिल पर
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
وَبِنِعْمَةِ
और नेअमत का
ٱللَّهِ
अल्लाह की
يَكْفُرُونَ
वो इन्कार करते हैं
क्या उन्होंने देखा नही कि हमने एक शान्तिमय हरम बनाया, हालाँकि उनके आसपास से लोग उचक लिए जाते है, तो क्या फिर भी वे असत्य पर ईमान रखते है और अल्लाह की अनुकम्पा के प्रति कृतघ्नता दिखलाते है?
तफ़्सीर:
क्या अपने ऊपर अल्लाह की नेमत का इनकार करने वाले इन लोगों ने, जब अल्लाह ने उन्हें डूबने से बचाया था, उसकी एक और नेमत को नहीं देखा; जो यह है कि हमने उनके लिए एक हरम बनाया है, जिसमें उनके रक्त और धन सुरक्षित रहते हैं, जबकि उनके अलावा दूसरे लोगों पर हमले किए जाते हैं, फिर उन्हें मार दिया जाता है, तथा उन्हें पकड़ लिया जाता है और उनकी पत्नियों और बच्चों को बंदी बना लिया जाता है और उनके धनों को लूट लिया जाता है। क्या (फिर भी) वे अपने तथाकथित असत्य पूज्यों पर ईमान रखते हैं और अपने ऊपर अल्लाह की नेमत (कृपा) का इनकार करते हैं, इसलिए उसपर अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं करते हैं?!
आयत 68
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِٱلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُۥٓ ۚ أَلَيْسَ فِى جَهَنَّمَ مَثْوًۭى لِّلْكَـٰفِرِينَ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَوْ
या
كَذَّبَ
वो झुठलाए
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
لَمَّا
जब कि
جَآءَهُۥٓ ۚ
वो आ जाए उसके पास
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
فِى
in
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
مَثْوًۭى
ठिकाना
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या सत्य को झुठलाए, जबकि वह उसके पास आ चुका हो? क्या इनकार करनेवालों का ठौर-ठिकाना जहन्नम नें नहीं होगा?
तफ़्सीर:
उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कोई नहीं है, जिसने अल्लाह पर झूठ गढ़कर उसके लिए साझीदार ठहराया, या उस सत्य को झुठला दिया जो उसका रसूल लेकर आया है। इसमें कोई शक नहीं है कि जहन्नम में काफ़िरों और उन जैसे लोगों के लिए एक निवास स्थान है।
आयत 69
وَٱلَّذِينَ جَـٰهَدُوا۟ فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَمَعَ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
جَـٰهَدُوا۟
जद्दो जहद की
فِينَا
हमारी (राह) में
لَنَهْدِيَنَّهُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर हिदायत देंगे उन्हें
سُبُلَنَا ۚ
अपने रास्तों की
وَإِنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَمَعَ
अलबत्ता साथ है
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों के
रहे वे लोग जिन्होंने हमारे मार्ग में मिलकर प्रयास किया, हम उन्हें अवश्य अपने मार्ग दिखाएँगे। निस्संदेह अल्लाह सुकर्मियों के साथ है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने हमारी प्रसन्नता की खोज में अपने आपसे संघर्ष किया, हम उन्हें सीधे रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करेंगे। और निःसंदेह अल्लाह सहायता, समर्थन और मार्गदर्शन के साथ नेकी करने वालों के साथ है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की राह में कोशिश करने वालों की हिदायत के वादे के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि जो अल्लाह की राह में सच्चे दिल से कोशिश करता है, अल्लाह उसे सही रास्ता ज़रूर दिखाता है।
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