सूरह अल-क़मर سورة القمر
मक्की 55 आयतें
नाम का मतलब
चांद (चांद के दो टुकड़े होने के मोजिज़े के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-क़मर में चांद के दो टुकड़े होने के मशहूर मोजिज़े और पिछली कौमों (नूह, आद, समूद, लूत, फिरऔन) के अंजाम का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में नबी ﷺ के सबसे बड़े मोजिज़ों में से एक — चांद का दो टुकड़े होना — का ज़िक्र है, जो मक्का के मुशरिकों ने खुद अपनी आंखों से देखा था।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱقْتَرَبَتِ ٱلسَّاعَةُ وَٱنشَقَّ ٱلْقَمَرُ
ٱقْتَرَبَتِ
क़रीब आ गई
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
وَٱنشَقَّ
और शक़ हो गया
ٱلْقَمَرُ
चाँद
वह घड़ी निकट और लगी और चाँद फट गया;
तफ़्सीर:
क़ियामत का आगमन निकट आ गया और चाँद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में फट गया। चाँद का फटना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हिस्सी निशानियों (चमत्कारों) में से था (जिनका बोध ज्ञानेंद्रियों से किया जा सकता है)।
आयत 2
وَإِن يَرَوْا۟ ءَايَةًۭ يُعْرِضُوا۟ وَيَقُولُوا۟ سِحْرٌۭ مُّسْتَمِرٌّۭ
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देख लें
ءَايَةًۭ
कोई भी निशानी
يُعْرِضُوا۟
वो मुँह मोड़ जाते हैं
وَيَقُولُوا۟
और वो कहते हैं
سِحْرٌۭ
एक जादू है
مُّسْتَمِرٌّۭ
जारी
किन्तु हाल यह है कि यदि वे कोई निशानी देख भी लें तो टाल जाएँगे और कहेंगे, "यह तो जादू है, पहले से चला आ रहा है!"
तफ़्सीर:
और यदि मुश्रिक लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सत्यता का कोई प्रमाण और संकेत देखते हैं, तो उसे स्वीकार करने से मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं : हमने जो प्रमाण और तर्क देखे हैं, वह सब झूठा जादू है।
आयत 3
وَكَذَّبُوا۟ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَهْوَآءَهُمْ ۚ وَكُلُّ أَمْرٍۢ مُّسْتَقِرٌّۭ
وَكَذَّبُوا۟
और उन्होंने झुठलाया
وَٱتَّبَعُوٓا۟
और उन्होंने पैरवी की
أَهْوَآءَهُمْ ۚ
अपनी ख़्वाहिशात की
وَكُلُّ
और हर
أَمْرٍۢ
काम का
مُّسْتَقِرٌّۭ
वक़्त मुक़र्रर है
उन्होंने झुठलाया और अपनी इच्छाओं का अनुसरण किया; किन्तु हर मामले के लिए एक नियत अवधि है।
तफ़्सीर:
और उन्होंने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए सत्य को झुठला दिया और इस झुठलाने में उन्होंने अपनी इच्छाओं का पालन किया। और हर चीज़ (चाहे अच्छी हो या बुरी) क़ियामत के दिन उसके हक़दार को मिलकर रहेगी।
आयत 4
وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّنَ ٱلْأَنۢبَآءِ مَا فِيهِ مُزْدَجَرٌ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَهُم
आईं उनके पास
مِّنَ
of
ٱلْأَنۢبَآءِ
कई ख़बरें
مَا
wherein
فِيهِ
जिनमें
مُزْدَجَرٌ
काफ़ी तंबीह है
उनके पास अतीत को ऐसी खबरें आ चुकी है, जिनमें ताड़ना अर्थात पूर्णतः तत्वदर्शीता है।
तफ़्सीर:
और उनके पास उन समुदायों की, जिन्हें अल्लाह ने उनके कुफ़्र एवं अत्याचार के कारण नष्ट कर दिया, ऐसी सूचनाएँ आ चुकी हैं, जो उन्हें कुफ़्र एवं अत्याचार से दूर रखने के लिए काफ़ी हैं।
आयत 5
حِكْمَةٌۢ بَـٰلِغَةٌۭ ۖ فَمَا تُغْنِ ٱلنُّذُرُ
حِكْمَةٌۢ
हिकमत है
بَـٰلِغَةٌۭ ۖ
कामिल
فَمَا
तो ना
تُغْنِ
काम आए
ٱلنُّذُرُ
डरावे
किन्तु चेतावनियाँ उनके कुछ काम नहीं आ रही है! -
तफ़्सीर:
उनके पास जो कुछ आया, वह पूर्णतया हिकमत है, ताकि उनके खिलाफ तर्क स्थापित हो जाए। परंतु चेतावनियाँ उन लोगों को लाभ नहीं पहुँचातीं, जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते हैं।
आयत 6
فَتَوَلَّ عَنْهُمْ ۘ يَوْمَ يَدْعُ ٱلدَّاعِ إِلَىٰ شَىْءٍۢ نُّكُرٍ
فَتَوَلَّ
तो मुँह फेर लीजिए
عَنْهُمْ ۘ
उनसे
يَوْمَ
जिस दिन
يَدْعُ
पुकारेगा
ٱلدَّاعِ
पुकारने वाला
إِلَىٰ
to
شَىْءٍۢ
तरफ़ एक चीज़
نُّكُرٍ
नागवार के
अतः उनसे रुख़ फेर लो - जिस दिन पुकारनेवाला एक अत्यन्त अप्रिय चीज़ की ओर पुकारेगा;
तफ़्सीर:
जब उन्होंने मार्गदर्शन स्वीकार नहीं किया, तो (ऐ रसूल!) आप उन्हें छोड़ दें और उनसे मुँह फेर लें, उस दिन की प्रतीक्षा करते हुए, जिस दिन सूर फूँकने के कार्य पर नियुक्त फ़रिश्ता एक ऐसी भयानक वस्तु की ओर बुलाएगा, जिस तरह की वस्तु के बारे में प्राणी पहले नहीं जानते थे।
आयत 7
خُشَّعًا أَبْصَـٰرُهُمْ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ كَأَنَّهُمْ جَرَادٌۭ مُّنتَشِرٌۭ
خُشَّعًا
झुकी हुई होंगी
أَبْصَـٰرُهُمْ
निगाहें उनकी
يَخْرُجُونَ
वो निकलेंगे
مِنَ
from
ٱلْأَجْدَاثِ
क़ब्रों से
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
جَرَادٌۭ
टिड्डियाँ हैं
مُّنتَشِرٌۭ
फैली हुईं
वे अपनी झुकी हुई निगाहों के साथ अपनी क्रबों से निकल रहे होंगे, मानो वे बिखरी हुई टिड्डियाँ है;
तफ़्सीर:
उनकी निगाहें झुकी होंगी। वे क़ब्रों से निकलकर हिसाब के स्थान की ओर ऐसे भाग रहे होंगे, जैसे बिखरी हुई टिड्डियाँ हों।
आयत 8
مُّهْطِعِينَ إِلَى ٱلدَّاعِ ۖ يَقُولُ ٱلْكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا يَوْمٌ عَسِرٌۭ
مُّهْطِعِينَ
दौड़ते होंगे
إِلَى
towards
ٱلدَّاعِ ۖ
तरफ़ पुकारने वाले के
يَقُولُ
कहेंगे
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िर
هَـٰذَا
ये
يَوْمٌ
दिन है
عَسِرٌۭ
बड़ा सख़्त
दौड़ पड़ने को पुकारनेवाले की ओर। इनकार करनेवाले कहेंगे, "यह तो एक कठिन दिन है!"
तफ़्सीर:
वे हिसाब के स्थान की ओर बुलाने वाले की तरफ़ तेज़ी से भाग रहे होंगे। काफ़िर लोग कहेंगे : यह बहुत कठिन दिन है; उस दिन की गंभीरता और भयावहता के कारण।
आयत 9
۞ كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍۢ فَكَذَّبُوا۟ عَبْدَنَا وَقَالُوا۟ مَجْنُونٌۭ وَٱزْدُجِرَ
۞ كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَبْلَهُمْ
उनसे पहले
قَوْمُ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह ने
فَكَذَّبُوا۟
तो उन्होंने झुठलाया
عَبْدَنَا
हमारे बन्दे को
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
مَجْنُونٌۭ
मजनून है
وَٱزْدُجِرَ
और वो झिड़क दिया गया
उनसे पहले नूह की क़ौम ने भी झुठलाया। उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और वह बुरी तरह झिड़का गया
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपके आह्वान को झुठलाने वाले इन लोगों से पहले नूह अलैहिस्सलाम की जाति ने भी झुठलाया। जब हमने अपने बंदे नूह अलैहिस्सलाम को उनकी ओर भेजा, तो उन्होंने उन्हें झुठला दिया और उनके बारे में कहा कि वह पागल हैं। तथा उन्हें बुरा-भला और अपशब्द कहते हुए झिड़क दिया और धमकियाँ दीं अगर वह उन्हें अल्लाह की ओर बुलाने से बाज़ नहीं आए।
आयत 10
فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنِّى مَغْلُوبٌۭ فَٱنتَصِرْ
فَدَعَا
तो उसने पुकारा
رَبَّهُۥٓ
अपने रब को
أَنِّى
बेशक मैं
مَغْلُوبٌۭ
मग़लूब हूँ
فَٱنتَصِرْ
पस तू इन्तिक़ाम ले
अन्त में उसने अपने रब को पुकारा कि "मैं दबा हुआ हूँ। अब तू बदला ले।"
तफ़्सीर:
तो नूह अलैहिस्सलाम ने अपने पालनहार से प्रार्थना करते हुए कहा : मेरी जाति के लोग मुझपर हावी हो गए और मेरे आह्वान को स्वीकार नहीं किए। अतः तू उनपर सज़ा उतारकर मेरा बदला ले।
आज की ज़िंदगी में सबक़
चांद के फटने के मोजिज़े और नूह अलैहिस्सलाम की कौम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बड़े से बड़ा मोजिज़ा देखकर भी इनकार करने वाले नसीहत नहीं पकड़ते, दिल का खुला होना ज़रूरी है।
आयत 11
فَفَتَحْنَآ أَبْوَٰبَ ٱلسَّمَآءِ بِمَآءٍۢ مُّنْهَمِرٍۢ
فَفَتَحْنَآ
तो खोल दिए हमने
أَبْوَٰبَ
दरवाज़े
ٱلسَّمَآءِ
आसमान के
بِمَآءٍۢ
साथ एक पानी
مُّنْهَمِرٍۢ
ख़ूब बरसने वाले के
तब हमने मूसलाधार बरसते हुए पानी से आकाश के द्वार खोल दिए;
तफ़्सीर:
तो हमने निरंतर बरसने वाले पानी (मूसलाधार बारिश) के साथ आकाश के द्वार खोल दिए।
आयत 12
وَفَجَّرْنَا ٱلْأَرْضَ عُيُونًۭا فَٱلْتَقَى ٱلْمَآءُ عَلَىٰٓ أَمْرٍۢ قَدْ قُدِرَ
وَفَجَّرْنَا
और फाड़ दिया हमने
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन से
عُيُونًۭا
चश्मों को
فَٱلْتَقَى
पस मिल गया
ٱلْمَآءُ
पानी
عَلَىٰٓ
for
أَمْرٍۢ
एक काम पर
قَدْ
तहक़ीक़
قُدِرَ
जो मुक़द्दर हो चुका था
और धरती को प्रवाहित स्रोतों में परिवर्तित कर दिया, और सारा पानी उस काम के लिए मिल गया जो नियत हो चुका था
तफ़्सीर:
तथा हमने धरती को फाड़ दिया, तो वह ऐसे सोते बन गई, जिनसे पानी निकल रहा था। चुनाँचे आकाश से उतरने वाला पानी धरती से निकलने वाले पानी के साथ, अल्लाह के अनादिकाल में नियत किए हुए कार्य के लिए मिल गया, और सब को डुबो दिया, सिवाय उन लोगों के जिन्हें अल्लाह ने बचा लिया।
आयत 13
وَحَمَلْنَـٰهُ عَلَىٰ ذَاتِ أَلْوَٰحٍۢ وَدُسُرٍۢ
وَحَمَلْنَـٰهُ
और सवार किया हमने उसे
عَلَىٰ
on
ذَاتِ
(ark) made of planks
أَلْوَٰحٍۢ
ऊपर तख़्तों वाली के
وَدُسُرٍۢ
और मेख़ों वाली के
और हमने उसे एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार किया,
तफ़्सीर:
और हमने नूह (अलैहिस्सलाम) को तख़्तों और कीलों वाली नाव पर सवार कर दिया और उन्हें तथा उनके साथियों को डूबने से बचा लिया।
आयत 14
تَجْرِى بِأَعْيُنِنَا جَزَآءًۭ لِّمَن كَانَ كُفِرَ
تَجْرِى
जो चल रही थी
بِأَعْيُنِنَا
हमारी निगाहों के सामने
جَزَآءًۭ
बदला था
لِّمَن
उसका जिसका
كَانَ
था
كُفِرَ
इन्कार किया गया
जो हमारी निगाहों के सामने चल रही थी - यह बदला था उस व्यक्ति के लिए जिसकी क़द्र नहीं की गई।
तफ़्सीर:
यह नाव हमारी दृष्टि और संरक्षण में पानी की परस्पर थपेड़े मारने वाली लहरों के बीच चल रही थी। यह नूह का बदला लेने के तौर पर था, जिन्हें उनकी जाति के लोगों ने झुठला दिया था और वह अल्लाह की ओर से उनके पास जो कुछ लाए थे, उसका इनकार कर दिया था।
आयत 15
وَلَقَد تَّرَكْنَـٰهَآ ءَايَةًۭ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَد
और अलबत्ता तहक़ीक़
تَّرَكْنَـٰهَآ
छोड़ दिया हमने उसे
ءَايَةًۭ
एक निशानी (बनाकर)
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
हमने उसे एक निशानी बनाकर छोड़ दिया; फिर क्या कोई नसीहत हासिल करनेवाला?
तफ़्सीर:
और हमने इस सज़ा को, जिसके साथ हमने उन्हें दंडित किया था, एक सीख और उपदेश बनाकर छोड़ा। तो क्या है कोई उपदेश ग्रहण करने वाला, जो इससे उपदेश ग्रहण करे?!
आयत 16
فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ
فَكَيْفَ
तो कैसा
كَانَ
था
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
फिर कैसी रही मेरी यातना और मेरे डरावे?
तफ़्सीर:
फिर झुठलाने वालों के लिए मेरी यातना कैसी थी?! तथा मेरी यह चेतावनी कैसी थी कि मैं उन्हें नष्ट कर दूंगा?!
आयत 17
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
يَسَّرْنَا
आसान कर दिया हमने
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरान को
لِلذِّكْرِ
नसीहत के लिए
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
और हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए अनुकूल और सहज बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत करनेवाला?
तफ़्सीर:
और हमने क़ुरआन को याद रखने और उपदेश ग्रहण करने के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई इसके पाठों और उपदेशों को ग्रहण करने वाला है?!
आयत 18
كَذَّبَتْ عَادٌۭ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
عَادٌۭ
आद ने
فَكَيْفَ
तो कैसा
كَانَ
था
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
आद ने भी झुठलाया, फिर कैसी रही मेरी यातना और मेरा डराना?
तफ़्सीर:
आद' ने अपने नबी हूद अलैहिस्सलाम को झुठलाया। तो (ऐ मक्का वालो!) ग़ौर करो कि उनके लिए मेरी यातना कैसी थी?! और मेरा उनकी यातना से दूसरों लोगों को डराना कैसा था?!
आयत 19
إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًۭا صَرْصَرًۭا فِى يَوْمِ نَحْسٍۢ مُّسْتَمِرٍّۢ
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
رِيحًۭا
एक हवा
صَرْصَرًۭا
तुंद व तेज़ को
فِى
on
يَوْمِ
एक दिन में
نَحْسٍۢ
(of) misfortune
مُّسْتَمِرٍّۢ
मुसलसल नहूसत वाले
निश्चय ही हमने एक निरन्तर अशुभ दिन में तेज़ प्रचंड ठंडी हवा भेजी, उसे उनपर मुसल्लत कर दिया, तो वह लोगों को उखाड़ फेंक रही थी
तफ़्सीर:
हमने उनपर एक बुरे और अशुभ दिन में एक तेज़, ठंडी हवा भेजी, जिसकी नहूसत (दुर्भाग्य) उनके जहन्नम में जाने तक उनके साथ लगी रहेगी।
आयत 20
تَنزِعُ ٱلنَّاسَ كَأَنَّهُمْ أَعْجَازُ نَخْلٍۢ مُّنقَعِرٍۢ
تَنزِعُ
उखाड़ कर फेंक रही थी
ٱلنَّاسَ
लोगों को
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
أَعْجَازُ
तने थे
نَخْلٍۢ
खजूर के
مُّنقَعِرٍۢ
जड़ से उखड़े हुए
मानो वे उखड़े खजूर के तने हो
तफ़्सीर:
जो लोगों को धरती से उखाड़ रही थी और उन्हें उनके सिर के बल ऐसे फेंक रही थी, जैसे कि वे जड़ से उखड़े हुए खजूर के तने हों।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती और आद कौम की तबाही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह पर भरोसा रखने वाले मुश्किल तूफान में भी महफूज़ रहते हैं।
आयत 21
فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ
فَكَيْفَ
तो कैसा
كَانَ
था
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
फिर कैसी रही मेरी यातना और मेरे डरावे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ मक्का के लोगो!) ग़ौर करो कि उनके लिए मेरी यातना कैसी थी?! और मेरा उनकी यातना से अन्य लोगों को सावधान करना कैसा था?!
आयत 22
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
يَسَّرْنَا
आसान कर दिया हमने
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
لِلذِّكْرِ
नसीहत के लिए
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
और हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए अनुकूल और सहज बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला?
तफ़्सीर:
और हमने क़ुरआन को याद रखने और उपदेश ग्रहण करने के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई इसके पाठों और उपदेशों को ग्रहण करने वाला है?!
आयत 23
كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِٱلنُّذُرِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
ثَمُودُ
समूद ने
بِٱلنُّذُرِ
डराने वालों को
समूद ने चेतावनियों को झुठलाया;
तफ़्सीर:
समूद के लोगों ने उस चीज़ को झुठला दिया जिससे उनके रसूल सालेह अलैहिस्सलाम ने उन्हें डराया था।
आयत 24
فَقَالُوٓا۟ أَبَشَرًۭا مِّنَّا وَٰحِدًۭا نَّتَّبِعُهُۥٓ إِنَّآ إِذًۭا لَّفِى ضَلَـٰلٍۢ وَسُعُرٍ
فَقَالُوٓا۟
तो उन्होंने कहा
أَبَشَرًۭا
क्या एक आदमी
مِّنَّا
हम में से
وَٰحِدًۭا
अकेला
نَّتَّبِعُهُۥٓ
हम पैरवी करें उसकी
إِنَّآ
बेशक हम
إِذًۭا
तब
لَّفِى
(will be) surely in
ضَلَـٰلٍۢ
अलबत्ता गुमराही में होंगे
وَسُعُرٍ
और जुनून में
और कहने लगे, "एक अकेला आदमी, जो हम ही में से है, क्या हम उसके पीछे चलेंगे? तब तो वास्तव में हम गुमराही और दीवानापन में पड़ गए!
तफ़्सीर:
तो उन्होंने नकारते हुए कहा : क्या हम अपनी ही तरह के एक अकेले इनसान का अनुसरण करें?! अगर हमने इस स्थिति में उसका अनुसरण किया, तो हम सत्य से बहुत दूर हो जाएँगे और कष्ट में होंगे।
आयत 25
أَءُلْقِىَ ٱلذِّكْرُ عَلَيْهِ مِنۢ بَيْنِنَا بَلْ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٌۭ
أَءُلْقِىَ
क्या डाला गया
ٱلذِّكْرُ
ज़िक्र /नसीहत
عَلَيْهِ
उस पर
مِنۢ
from
بَيْنِنَا
हमारे दर्मियान से
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो है
كَذَّابٌ
सख़्त झूठा
أَشِرٌۭ
बहुत इतराने वाला
"क्या हमारे बीच उसी पर अनुस्मृति उतारी है? नहीं, बल्कि वह तो परले दरजे का झूठा, बड़ा आत्मश्लाघी है।"
तफ़्सीर:
क्या उसपर वह़्य उतारी गई है, जबकि वह एक है, और हम सभी के बीच इसके लिए केवल उसी को चुना गया है?! नहीं, बल्कि वह बहुत झूठा और अहंकारी है।
आयत 26
سَيَعْلَمُونَ غَدًۭا مَّنِ ٱلْكَذَّابُ ٱلْأَشِرُ
سَيَعْلَمُونَ
अनक़रीब वो जान लोंगे
غَدًۭا
कल
مَّنِ
कौन है
ٱلْكَذَّابُ
सख़्त झूठा
ٱلْأَشِرُ
बहुत इतराने वाला
"कल को ही वे जान लेंगे कि कौन परले दरजे का झूठा, बड़ा आत्मश्लाघी है।
तफ़्सीर:
वे क़ियामत के दिन जान लेंगे कि बहुत झूठा और अहंकारी कौन है, सालेह अलैहिस्सलाम या खुद वे?
आयत 27
إِنَّا مُرْسِلُوا۟ ٱلنَّاقَةِ فِتْنَةًۭ لَّهُمْ فَٱرْتَقِبْهُمْ وَٱصْطَبِرْ
إِنَّا
बेशक हम
مُرْسِلُوا۟
भेजने वाले हैं
ٱلنَّاقَةِ
ऊँटनी को
فِتْنَةًۭ
बतौर आज़माइश
لَّهُمْ
उनके लिए
فَٱرْتَقِبْهُمْ
पस इन्तिज़ार करो उनका
وَٱصْطَبِرْ
और सब्र करो
हम ऊँटनी को उनके लिए परीक्षा के रूप में भेज रहे है। अतः तुम उन्हें देखते जाओ और धैर्य से काम लो
तफ़्सीर:
हम चट्टान से ऊँटनी निकालने वाले हैं और उसे उनकी परीक्षा के लिए भेजने वाले हैं। अतः (ऐ सालेह!) आप प्रतीक्षा करें और देखें कि वे उसके साथ क्या करते हैं और उनके साथ क्या किया जाता है, तथा उनकी ओर से आने वाले कष्ट पर धैर्य रखें।
आयत 28
وَنَبِّئْهُمْ أَنَّ ٱلْمَآءَ قِسْمَةٌۢ بَيْنَهُمْ ۖ كُلُّ شِرْبٍۢ مُّحْتَضَرٌۭ
وَنَبِّئْهُمْ
और आगाह कर दो उन्हें
أَنَّ
बेशक
ٱلْمَآءَ
पानी
قِسْمَةٌۢ
तक़सीम करदा है
بَيْنَهُمْ ۖ
दर्मियान उनके
كُلُّ
हर एक के
شِرْبٍۢ
पानी की बारी
مُّحْتَضَرٌۭ
हाज़िर की गई है
"और उन्हें सूचित कर दो कि पानी उनके बीच बाँट दिया गया है। हर एक पीने की बारी पर बारीवाला उपस्थित होगा।"
तफ़्सीर:
और उन्हें बता दें कि उनके कुएँ का पानी उनके और ऊँटनी के बीच बाँट दिया गया है; एक दिन ऊँटनी के लिए, और एक दिन उन लोगों के लिए। प्रत्येक हिस्से पर अकेला उसका मालिक अपने निर्दिष्ट दिन में उपस्थित होगा।
आयत 29
فَنَادَوْا۟ صَاحِبَهُمْ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ
فَنَادَوْا۟
तो उन्होंने पुकारा
صَاحِبَهُمْ
अपने साथी को
فَتَعَاطَىٰ
तो उसने पकड़ा
فَعَقَرَ
फिर उसने कूँचें काट डालीं
अन्ततः उन्होंने अपने साथी को पुकारा, तो उसने ज़िम्मा लिया फिर उसने उसकी कूचें काट दी
तफ़्सीर:
अंततः उन्होंने ऊँटनी को क़त्ल करने के लिए अपने साथी को पुकारा। चुनाँचे उसने अपनी जाति के आदेश का पालन करते हुए तलवार उठाई और उसे क़त्ल कर दिया।
आयत 30
فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ
فَكَيْفَ
फिर कैसा
كَانَ
था
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
फिर कैसी रही मेरी यातना और मेरे डरावे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ मक्का वालो!) ग़ौर करो कि उनके लिए मेरी यातना कैसी थी?! और मेरा उनकी यातना से अन्य लोगों को सावधान करना कैसा था?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
समूद कौम और ऊंटनी के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की दी निशानी की नाकद्री करना कौम की तबाही का सबब बनी।
आयत 31
إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَكَانُوا۟ كَهَشِيمِ ٱلْمُحْتَظِرِ
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَا
भेजी हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
صَيْحَةًۭ
चिंघाड़
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
فَكَانُوا۟
तो हो गए वो
كَهَشِيمِ
मानिन्द रौंदी हुई बाड़ के
ٱلْمُحْتَظِرِ
बाड़ लगाने वाले की
हमने उनपर एक धमाका छोड़ा, फिर वे बाड़ लगानेवाले की रौंदी हुई बाड़ की तरह चूरा होकर रह गए
तफ़्सीर:
हमने उनपर एक चिंघाड़ भेजी, जिसने उन्हें नष्ट कर दिया। तो वे सूखे वृक्षों के समान हो गए, जिनसे बाड़ लगाने वाला अपनी बकरियों के लिए बाड़ा बनाता है।
आयत 32
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
يَسَّرْنَا
आसान कर दिया हमने
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
لِلذِّكْرِ
नसीहत के लिए
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए अनुकूल और सहज बना दिया है। फिर क्या कोई नसीहत हासिल करनेवाला?
तफ़्सीर:
और हमने क़ुरआन को याद रखने और उपदेश ग्रहण करने के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई इसके पाठों और उपदेशों को ग्रहण करने वाला है?!
आयत 33
كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍۭ بِٱلنُّذُرِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَوْمُ
क़ौमे
لُوطٍۭ
लूत ने
بِٱلنُّذُرِ
डराने वालों को
लूत की क़ौम ने भी चेतावनियों को झुठलाया
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम की जाति ने उस चीज़ को झुठला दिया जिसकी उनके रसूल लूत अलैहिस्सलाम ने उन्हें चेतावनी दी थी।
आयत 34
إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّآ ءَالَ لُوطٍۢ ۖ نَّجَّيْنَـٰهُم بِسَحَرٍۢ
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَا
भेजी हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَاصِبًا
पत्थरों की आँधी
إِلَّآ
सिवाए
ءَالَ
(the) family
لُوطٍۢ ۖ
आले लूत के
نَّجَّيْنَـٰهُم
निजात दी हमने उन्हें
بِسَحَرٍۢ
सहर के वक़्त
हमने लूत के घरवालों के सिवा उनपर पथराव करनेवाली तेज़ वायु भेजी।
तफ़्सीर:
हमने उनपर एक ऐसी हवा भेजी, जो उनपर पत्थर बरसा रही थी, सिवाय लूत अलैहिस्सलाम के घर वालों के, उन्हें अज़ाब ने नहीं छुआ। हमने उन्हें बचा लिया; क्योंकि लूत अलैहिस्सलाम रात के अंत में यातना आने से पहले ही उन्हें लेकर चले गए।
आयत 35
نِّعْمَةًۭ مِّنْ عِندِنَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى مَن شَكَرَ
نِّعْمَةًۭ
बतौर इनआम
مِّنْ
from
عِندِنَا ۚ
हमारे पास से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
مَن
उसे जो
شَكَرَ
शुक्र अदा करे
हमने अपनी विशेष अनुकम्पा से प्रातःकाल उन्हें बचा लिया। हम इसी तरह उस व्यक्ति को बदला देते है जो कृतज्ञता दिखाए
तफ़्सीर:
हमने अपनी ओर से उनपर अनुग्रह करते हुए उन्हें यातना से बचा लिया। इसी तरह का बदला, जो हमने लूत अलैहिस्सलाम को दिया, हम उन लोगों को देते हैं, जो अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करते हों।
आयत 36
وَلَقَدْ أَنذَرَهُم بَطْشَتَنَا فَتَمَارَوْا۟ بِٱلنُّذُرِ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَنذَرَهُم
उसने डराया उन्हें
بَطْشَتَنَا
हमारी पकड़ से
فَتَمَارَوْا۟
तो उन्होंने शक किया
بِٱلنُّذُرِ
डरावों पर
उसने जो उन्हें हमारी पकड़ से सावधान कर दिया था। किन्तु वे चेतावनियों के विषय में संदेह करते रहे
तफ़्सीर:
निश्चय लूत अलैहिस्सलाम ने उन्हें हमारी यातना से डराया, पर उन्होंने उनकी चेतावनी के विषय में वाद-विवाद किया और उसे झुठला दिया।
आयत 37
وَلَقَدْ رَٰوَدُوهُ عَن ضَيْفِهِۦ فَطَمَسْنَآ أَعْيُنَهُمْ فَذُوقُوا۟ عَذَابِى وَنُذُرِ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
رَٰوَدُوهُ
उन्होंने फुसलाना चाहा उसे
عَن
they demanded from him
ضَيْفِهِۦ
उसके मेहमानों के बारे में
فَطَمَسْنَآ
तो मिटा दीं हमने
أَعْيُنَهُمْ
आँखें उनकी
فَذُوقُوا۟
तो चखो
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
उन्होंने उसे फुसलाकर उसके पास से उसके अतिथियों को बलाना चाहा। अन्ततः हमने उसकी आँखें मेट दीं, "लो, अब चखो मज़ा मेरी यातना और चेतावनियों का!"
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम को उनकी जाति के लोगों ने बहकाना चाहा कि वह उन्हें और अपने मेहमान फ़रिश्तों को अनैतिक काम करने के मक़सद से अलग कर दें। तो हमने उनकी आँखों को मिटा दिया, सो उन्होंने उन्हें नहीं देखा। और हमने उनसे कहा : मेरी यातना का स्वाद तथा मेरे डराने का परिणाम चखो।
आयत 38
وَلَقَدْ صَبَّحَهُم بُكْرَةً عَذَابٌۭ مُّسْتَقِرٌّۭ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَبَّحَهُم
सुबह की उन पर
بُكْرَةً
सुबह सवेरे
عَذَابٌۭ
एक अज़ाब
مُّسْتَقِرٌّۭ
मुसलसल ने
सुबह सवेरे ही एक अटल यातना उनपर आ पहुँची,
तफ़्सीर:
निश्चय सुबह के समय उनपर ऐसी यातना आई, जो उनके साथ निरंतर लगी रहेगी, यहाँ तक कि वे आख़िरत में पहुँच जाएँ और उनपर उसकी यातना आ जाए।
आयत 39
فَذُوقُوا۟ عَذَابِى وَنُذُرِ
فَذُوقُوا۟
तो चखो
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
وَنُذُرِ
और डराना मेरा
"लो, अब चखो मज़ा मेरी यातना और चेतावनियों का!"
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा : मेरी उस यातना का स्वाद चखो, जो मैंने तुमपर उतारी है, तथा लूत अलैहिस्सलाम के तुम्हें डराने के परिणाम का सामना करो।
आयत 40
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
يَسَّرْنَا
आसान कर दिया हमने
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
لِلذِّكْرِ
नसीहत के लिए
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
और हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए अनुकूल और सहज बना दिया है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला?
तफ़्सीर:
और हमने क़ुरआन को याद रखने और उपदेश ग्रहण करने के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई इसके पाठों और उपदेशों को ग्रहण करने वाला है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत की कौम की तबाही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बेहयाई फैलाने वाले समाज का अंजाम हमेशा इबरतनाक रहा है।
आयत 41
وَلَقَدْ جَآءَ ءَالَ فِرْعَوْنَ ٱلنُّذُرُ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَ
आए
ءَالَ
(to the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन के पास
ٱلنُّذُرُ
डराने वाले
और फ़िरऔनियों के पास चेतावनियाँ आई;
तफ़्सीर:
निश्चय फिरऔनियों के पास मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम के माध्यम से हमारा डरावा आया।
आयत 42
كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذْنَـٰهُمْ أَخْذَ عَزِيزٍۢ مُّقْتَدِرٍ
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
كُلِّهَا
सब के सब
فَأَخَذْنَـٰهُمْ
तो पकड़ लिया हमने उन्हें
أَخْذَ
पकड़ना
عَزِيزٍۢ
बहुत ज़बरदस्त
مُّقْتَدِرٍ
इक़्तिदार वाले का
उन्होंने हमारी सारी निशानियों को झुठला दिया। अन्ततः हमने उन्हें पकड़ लिया, जिस प्रकार एक ज़बरदस्त प्रभुत्वशाली पकड़ता है
तफ़्सीर:
उन्होंने हमारी ओर से आने वाले सभी प्रमाणों और तर्कों को झुठला दिया। तो हमने उन्हें उनके झुठलाने की ऐसी सज़ा दी, जैसे वह प्रभुत्वशाली सज़ा देता है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, जो शक्तिशाली है, किसी चीज़ के करने में असमर्थ नहीं है।
आयत 43
أَكُفَّارُكُمْ خَيْرٌۭ مِّنْ أُو۟لَـٰٓئِكُمْ أَمْ لَكُم بَرَآءَةٌۭ فِى ٱلزُّبُرِ
أَكُفَّارُكُمْ
क्या क़ुफ़्फ़ार तुम्हारे
خَيْرٌۭ
बेहतर हैं
مِّنْ
than
أُو۟لَـٰٓئِكُمْ
उन लोगों से
أَمْ
या
لَكُم
तुम्हारे लिए
بَرَآءَةٌۭ
कोई छुटकारा पाना है
فِى
in
ٱلزُّبُرِ
(पहली) किताबों में
क्या तुम्हारे काफ़िर कुछ उन लोगो से अच्छे है या किताबों में तुम्हारे लिए कोई छुटकारा लिखा हुआ है?
तफ़्सीर:
क्या (ऐ मक्का वालो!) तुम्हारे काफ़िर उन उपर्युक्त काफ़िरों : नूह अलैहिस्सलाम की जाति, आद, समूद, लूत अलैहिस्सलाम की जाति तथा फ़िरऔन और उसकी जाति से बेहतर हैं?! या तुम्हें अल्लाह की यातना से मुक्ति प्राप्त है, जिसकी घोषणा आसमानी किताबों में कर दी गई है?!
आयत 44
أَمْ يَقُولُونَ نَحْنُ جَمِيعٌۭ مُّنتَصِرٌۭ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
نَحْنُ
हम हैं
جَمِيعٌۭ
एक जमाअत
مُّنتَصِرٌۭ
बदला लेने वाले
या वे कहते है, "और हम मुक़ाबले की शक्ति रखनेवाले एक जत्था है?"
तफ़्सीर:
बल्कि, क्या मक्का के ये काफ़िर कहते हैं कि हम एक ऐसा जत्था हैं, जो उससे बदले लेकर रहने वाले हैं, जो हमारा बुरा चाहता है और हमारे जत्थे को तितर-बितर करना चाहता है?!
आयत 45
سَيُهْزَمُ ٱلْجَمْعُ وَيُوَلُّونَ ٱلدُّبُرَ
سَيُهْزَمُ
अनक़रीब शिकस्त खा जाएगा
ٱلْجَمْعُ
जत्था
وَيُوَلُّونَ
और वो फेर लेंगे
ٱلدُّبُرَ
पुश्तें
शीघ्र ही वह जत्था पराजित होकर रहेगा और वे पीठ दिखा जाएँगे
तफ़्सीर:
शीघ्र ही इन काफ़िरों का जत्था पराजित कर दिया जाएगा और ये लोग ईमान वालों के सामने पीठ फेरकर भाग जाएँगे। ज्ञात होना चाहिए कि बद्र के युद्ध के दिन यह घटित हो चुका है।
आयत 46
بَلِ ٱلسَّاعَةُ مَوْعِدُهُمْ وَٱلسَّاعَةُ أَدْهَىٰ وَأَمَرُّ
بَلِ
बल्कि
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
مَوْعِدُهُمْ
उनके वादे का वक़्त है
وَٱلسَّاعَةُ
और क़यामत
أَدْهَىٰ
बहुत सख़्त है
وَأَمَرُّ
और बहुत कड़वी
नहीं, बल्कि वह घड़ी है, जिसका समय उनके लिए नियत है और वह बड़ी आपदावाली और कटु घड़ी है!
तफ़्सीर:
बल्कि क़ियामत, जिसे ये लोग झुठलाते हैं, इनके वादे का समय है, जिसमें इन्हें यातना दी जाएगी। और क़ियामत दुनिया की उस यातना से कहीं अधिक भयानक और कठोर है, जिसका सामना उन्होंने बद्र के दिन किया है।
आयत 47
إِنَّ ٱلْمُجْرِمِينَ فِى ضَلَـٰلٍۢ وَسُعُرٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिम लोग
فِى
(are) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में हैं
وَسُعُرٍۢ
और जुनून में
निस्संदेह, अपराधी लोग गुमराही और दीवानेपन में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
निश्चय कुफ़्र और पाप करने वाले अपराधी सत्य से भटके हुए, तथा यातना और कष्ट में हैं।
आयत 48
يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِى ٱلنَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا۟ مَسَّ سَقَرَ
يَوْمَ
जिस दिन
يُسْحَبُونَ
वो घसीटे जाऐंगे
فِى
into
ٱلنَّارِ
आग में
عَلَىٰ
on
وُجُوهِهِمْ
अपने चेहरों के बल
ذُوقُوا۟
चखो
مَسَّ
छूना
سَقَرَ
दोज़ख़ का
जिस दिन वे अपने मुँह के बल आग में घसीटे जाएँगे, "चखो मज़ा आग की लपट का!"
तफ़्सीर:
जिस दिन वे अपने मुँह के बल आग में घसीटे जाएँगे, और उनसे फटकार के रूप में कहा जाएगा : आग की यातना का स्वाद चखो।
आयत 49
إِنَّا كُلَّ شَىْءٍ خَلَقْنَـٰهُ بِقَدَرٍۢ
إِنَّا
बेशक हमने
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
خَلَقْنَـٰهُ
पैदा किया हमने उसे
بِقَدَرٍۢ
साथ एक अंदाज़े के
निश्चय ही हमने हर चीज़ एक अंदाज़े के साथ पैदा की है
तफ़्सीर:
हमने ब्रह्मांड में हर चीज़ को अपने पूर्व अनुमान के साथ, अपने ज्ञान और अपनी इच्छा तथा उसके अनुसार बनाया है, जो हमने 'लौहे महफ़ूज़' में लिखा है।
आयत 50
وَمَآ أَمْرُنَآ إِلَّا وَٰحِدَةٌۭ كَلَمْحٍۭ بِٱلْبَصَرِ
وَمَآ
और नहीं
أَمْرُنَآ
हुक्म हमारा
إِلَّا
मगर
وَٰحِدَةٌۭ
एक ही बार
كَلَمْحٍۭ
मानिन्द झपकने के
بِٱلْبَصَرِ
निगाह को
और हमारा आदेश (और काम) तो बस एक दम की बात होती है जैसे आँख का झपकना
तफ़्सीर:
जब हम किसी चीज़ का इरादा करते हैं, तो हमारा आदेश केवल एक शब्द कहना होता है, कि : "हो जा", तो जो हम चाहते हैं वह पलक झपकते ही तेज़ी से हो जाती है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन की कौम की तबाही और कुरआन को आसान बनाए जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन को नसीहत के लिए आसान बनाया गया है, इससे फायदा उठाना चाहिए।
आयत 51
وَلَقَدْ أَهْلَكْنَآ أَشْيَاعَكُمْ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَهْلَكْنَآ
हलाक किया हमने
أَشْيَاعَكُمْ
तुम्हारे गिरोहों को
فَهَلْ
तो क्या है
مِن
any
مُّدَّكِرٍۢ
कोई नसीहत पकड़ने वाला
और हम तुम्हारे जैसे लोगों को विनष्ट कर चुके है। फिर क्या है कोई नसीहत हासिल करनेवाला?
तफ़्सीर:
निश्चय हमने पिछले समुदायों में से तुम्हारे जैसे (बहुत-से) कुफ़्र करने वालों को विनष्ट कर दिया, तो क्या है कोई नसीहत हासिल करने वाला, जो इससे नसीहत लेते हुए अपने कुफ़्र से बाज़ आ जाए?!
आयत 52
وَكُلُّ شَىْءٍۢ فَعَلُوهُ فِى ٱلزُّبُرِ
وَكُلُّ
और हर
شَىْءٍۢ
चीज़
فَعَلُوهُ
उन्होंने किया जिसे
فِى
(is) in
ٱلزُّبُرِ
सहीफ़ों में है
जो कुछ उन्होंने किया है, वह पन्नों में अंकित है
तफ़्सीर:
और जो कुछ बंदों ने किया, वह बंदों के कार्य लिखने पर नियुक्त फ़रिश्तों की पुस्तकों में लिखा है, उनसे उसमें से कुछ भी नहीं छूटता।
आयत 53
وَكُلُّ صَغِيرٍۢ وَكَبِيرٍۢ مُّسْتَطَرٌ
وَكُلُّ
और हर
صَغِيرٍۢ
छोटा
وَكَبِيرٍۢ
और बड़ा
مُّسْتَطَرٌ
लिखा हुआ है
और हर छोटी और बड़ी चीज़ लिखित है
तफ़्सीर:
हर छोटा और बड़ा कार्य एवं कथन कर्मपत्रों और 'लौहे महफूज़' में लिखा है। और लोगों को उसका बदला दिया जाएगा।
आयत 54
إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍۢ وَنَهَرٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोग
فِى
(will be) in
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में होंगे
وَنَهَرٍۢ
और नहरों में
निश्चय ही डर रखनेवाले बाग़ो और नहरों के बीच होंगे,
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर अपने पालनहार से डरने वाले लोग, बागों में आनंद ले रहे होंगे और बहती नहरों में होंगे।
आयत 55
فِى مَقْعَدِ صِدْقٍ عِندَ مَلِيكٍۢ مُّقْتَدِرٍۭ
فِى
In
مَقْعَدِ
जगह में
صِدْقٍ
सच्चाई की
عِندَ
near
مَلِيكٍۢ
बादशाह के पास
مُّقْتَدِرٍۭ
जो इक़्तिदार वाला है
प्रतिष्ठित स्थान पर, प्रभुत्वशाली सम्राट के निकट
तफ़्सीर:
सत्य की मजलिस में होंगे, जिसमें न व्यर्थ बात होगी, न पाप। ऐसे बादशाह के पास, जो हर चीज़ का मालिक है। शक्तिशाली है, कोई भी चीज़ करने में असमर्थ नहीं है।अतः उन्हें उसकी ओर से प्राप्त होने वाली स्थायी नेमतों के बारे में मत पूछो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हर चीज़ का हिसाब लिखे जाने और मुत्तकीन के बुलंद मुकाम के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर छोटी-बड़ी बात लिखी जा रही है, इसलिए ज़िम्मेदारी से ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए।
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